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समर नीति: पनडुब्बियों की कमी जल्द दूर हो

भारतीय नौसेना
भारतीय नौसेना (फाइल)

भारतीय वायुसेना को जिस तरह अपने लड़ाकू विमानों का बेड़ा जल्द से जल्द मजबूत करने की जरुरत है उसी तरह भारतीय नौसेना भी पनडुब्बियों की कमी के भारी संकट से जूझ रही है। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक जिस तरह चीन की नौसेना का दबदबा बढ़ता जा रहा है उसके मद्देनजर भारतीय नौसेना के सामने चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। लेकिन भारतीय रक्षा नेतृत्व इन चुनौतियों से मुकाबले के लिये केवल मंथन ही करता है और कुछ नीतिगत फैसले लेता है लेकिन उन्हें जमीन पर उतारने में खुद ही हिचक दिखाता है और अड़चनें खड़ी करता है। मिसाल के लिये एक दशक से अधिक हो गया जब भारतीय नौसेना के लिये छह नई पनडुब्बियों को हासिल करने का फैसला लिया गया था लेकिन इसके लिये केवल नीतिगत बहस ही चल रही है।





इस सदी के शुरू में ही यह तय किया गया था कि सन 2030  तक भारतीय नौसेना के पास देश में बनी 24 नई पनडुब्बियों का बेड़ा शामिल होगा लेकिन भारतीय नौसेना के पास फिलहाल 15 पनडुब्बियां ही हैं। इनमें से रूसी सिंधुघोष वर्ग की नौ पनडु्ब्बियां, शिशुमार वर्ग की चार जर्मन पनडुब्बियां, कलवरी वर्ग की एक फ्रांसीसी पनडुब्बी और रूसी परमाणु पनडुब्बी चक्र हैं। देश में बनी परमाणु पनडुब्बी अरिहंत के बारे में नौसेना की वेबसाइट मौन है। नौसेना ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर सक्रिय पनडुब्बियों की जानकारी दी है लेकिन अरिहंत का कोई जिक्र नहीं किया गया है। हालांकि इसके बारे में यही कहा जाता है कि अरिहंत को नौसेना ने अपने बेड़े में कमीशन कर लिया है पर इस बारे में रहस्यमय चुप्पी बरती हुई है।

फिलहाल भारतीय नौसेना के पास आधिकारिक तौर पर 15 सक्रिय पनडुब्बियां ही हैं जबकि चीन के पास 68 पनडुब्बियां हैं जिनमें से छह परमाणु पनडुब्बियां हैं। भारतीय नौसेना के सामने न केवल अपने आंगन कहे जाने वाले हिंद महासागर की निरंतर चौकसी की जरूरत है बल्कि दक्षिण चीन सागर में भी अपने हितों की रक्षा के लिये अपनी नौसैनिक ताकत दिखाने की जरूरत है। भारतीय नौसेना के बेड़े में फिलहाल जो 15 पनडुब्बियां हैं उनमें से आठ रूसी सिंधुघोष पनडुब्बियां तीन से अढ़ाई दशक पुरानी हो चुकी हैं और चूंकि पनडुब्बियों का जीवन करीब तीन दशक का ही होता है इसलिये उन्हें कुछ सालों के भीतर रिटायर करना होगा। इस बीच भारतीय नौसेना को फ्रांसीसी कलवरी वर्ग की पांच और पनडु्ब्बियां मिलेंगी। इस तरह भारतीय नौसेना के पास 15-16 पनडुब्बियों का बे़ड़ा यथावत बना रहेगा जबकि जरूरत इससे दोगुने बेड़े की है। नौसेना के लिये देश में ही पांच अतिरिक्त परमाणु पनडुब्बियों पर काम चल रहा है लेकिन इन्हें बनाने में एक से डेढ दशक का वक्त लग जाए तो हैरानी नहीं होगी। जिन छह पनडुब्बियों को विदेशी सहयोग से देश में बनाने के लिये फैसला रक्षा मंत्रालय के पास विचाराधीन है उन्हें भी फैसला लेने के एक दशक बाद ही नौसेना को सौंपा जा सकता है।

केवल 15 पनडुब्बियों की बदौलत ही हिंद महासागर से लेकर दक्षिण चीन सागर तक के इलाके में चौकसी और दुश्मन में डर पैदा करने की क्षमता नहीं पैदा हो सकती। जिस तरह चीन की परमाणु और डीजल पनडुब्बियां हिंद महासागर के इलाके में विचरण करती रहती हैं उसी तरह दक्षिण चीन सागर के इलाके में भी भारतीय नौसेना को अपनी पनडुब्बियां गश्त के लिये अक्सर तैनात रखना होगा। इसके लिये जरूरी है कि भारतीय नौसेना के पनडुब्बी बेड़े में सामरिक जरूरत के मुताबिक इजाफा किया जाए।

 

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