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समर नीति: पड़ोसी देशों से रिश्ते, चीन से होड़

मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग
पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग (फाइल फोटो)

एक कहावत है अपने रिश्तेदार से अधिक अपने पड़ोसी से अच्छे सम्बन्ध बना कर रखना चाहिये क्योंकि किसी संकट में सबसे पहले पड़ोसी ही मदद कर सकता है। इस कहावत के अनुरूप भारत को अपने पड़ोसी से अच्छे रिश्ते रखने चाहिये लेकिन यदि ऐसा नहीं हो सका है तो क्या इसके लिये भारत ही दोषी कहा जा सकता है?  प्राकृतिक आपदाओं के वक्त भारत तो इन देशों के काम आता है लेकिन ये पड़ोसी भारत के साथ कैसा बर्ताव करते हैं?   ताली दो हाथों से बजती है और पड़ोसी यदि भारत को नजरअंदाज कर दूसरे पड़ोसी से ही ताली बजाना चाहे तो क्या इसमें भारत को दोषी ठहराया जा सकता है? कुछ हद तक हम इसे सही भी कह सकते हैं क्योंकि आजादी के बाद से ही भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ गहरे रिश्ते बनाने में निवेश नहीं किया। अब इसका फायदा जब दूसरा पड़ोसी यानी चीन उठाने लगा है तो हमें पड़ोसी देशों के साथ गहरे आर्थिक और यातायात सम्पर्क बनाने की बात याद आने लगी है।





भारत के आठ पड़ोसी देश हैं– चीन, पाकिस्तान, भूटान, म्यांमार, नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और मालदीव। इन सबमें केवल भूटान और बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते सौहार्दपूर्ण कहे जा सकते हैं। इनमें चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के गहरे सीमा विवाद चल रहे हैं। श्रीलंका और मालदीव द्वीपीय देश हैं जिनके शासकों को लगता है कि भारत की उनकी कुर्सी पर तिरछी नजर रहती है। चूंकि इन देशों में लोकतंत्र के नाम पर तमाशा होता है इसलिये वे गैरलोकतांत्रिक तरीके से अपनी सत्ता पर बने रहना चाहते हैं और भारत जब लोकतंत्र का आदर करने की बात करता है तो उसे उनके देशों में अंदरुनी मामलों में हस्तक्षेप कहता है। सीमा और भूभाग के मसलों की वजह से रिश्तों में तनाव की बात तो समझ में आती है लेकिन दूसरे देशों के साथ रिश्तों में यदि तनाव है तो इन देशों के शासकों को हमेशा लगता है कि उनकी सत्ता भारत गिराना चाहता है जैसा कि हम श्रीलंका के राष्ट्रपति द्वारा भारत की खुफिया एजेंसी रॉ पर उनकी हत्या की साजिश के कथन से समझ सकते हैं, भले ही श्रीलंका के राष्ट्रपति ने इसका खंडन कर दिया हो। इससे इतना तो साफ होता ही है कि हमारे पडो़सी देशों के शासकों को भारत से दोस्ती पर इसलिये एतबार नहीं कि वह लोकतांत्रिक तरीके से चुने हुए शासकों को ही पंसद करता है। जबकि चीन को इस बात से कोई गुरेज नहीं कि वह मालदीव के तानाशाह राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन से कितना मीठा रिश्ता रखता है।

दूसरी ओर जब नेपाल के शासक भारत विरोध की राजनीति कर चुनाव मैदान में जाते हैं और भारत को नेपाल का दुश्मन बताकर वोट बटोरने की कोशिश करते हैं। भारत ने नेपाल के एक बड़े मधेसी समुदाय के हितों की बात की तो इसे नेपाल के अंदरुनी मामलों में हस्तक्षेप बताया गया। भारत को यह भी सोचना होगा कि यदि हमारे पडोसी के घर रोनाधोना मचा रहता है तो उसके कोलाहल से भारत भी बचा नहीं रह सकता।

लेकिन भारत क्या करे। भारत की बड़ी दुविधा है। भारतके सामने ब़़ड़ी चुनौती है कि पड़ोसी देशों से बेहतर रिश्ते बनाने में चीन से कैसे होड़ करे। क्या चीन की तरह भारत भी पडोसी देशों के सत्ता और विपक्ष के नेताओं को खरीदना शुरू करे जैसा कि हम श्रीलंका, नेपाल और मालदीव में देख रहे हैं। भूटान पर भी चीन की गिद्ध दृष्टि लगी है। म्यांमार में लोकतांत्रिक सरकार आने के बाद उसकी नीति में कुछ संतुलन देखा जा रहा है लेकिन म्यांमार का चीन के प्रति रुझान कुछ कम नहीं हआ है क्योंकि चीन ने रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर म्यांमार की सरकार का साथ ही दिया है।

 

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