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समर नीति: पुलवामा- पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा

CRPF के काफिले पर हमला

पुलवामा में 14 फरवरी को पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठऩ जैश ए मुहम्मद द्वारा करवाए गए जघन्य आतंकवादी हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को पहली बड़ी शर्मिंदगी झेलनी पड़ी है। सुरक्षा परिषद में पुलवामा हमले की निंदा  और पाकिस्तान से संचालित भारत विरोधी आतंकवादी हरकतों की निंदा करने वाले प्रस्ताव में पहली बार चीन भी शामिल हुआ। लेकिन सुरक्षा परिषद के इस निंदा प्रस्ताव के पारित हो जाने से ही भारत को संतोष नहीं करना होगा।





भारत के सामने एक और बड़ा लक्ष्य बचा है संयुक्त राष्ट्र के आतंकवाद विरोधी कार्यदल फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स ( एफ ए टी एफ) की आतंकवाद समर्थक देशों की काली सूची में डलवाना। लेकिन इस कार्यबल ने पाकिस्तान को ग्रे लिस्ट में बरकरार रखा है और आगामी अक्टूबर तक का वक्त दिया है ताकि कार्यबल की सभी शर्तों को वह पूरा कर बताए कि क्या क्या कदम भरोसेमेंद तरीके से उठाए गए हैं। रोचक बात यह है कि पेरिस में कार्यबल की बैठक के एक दिन पहले ही पाकिस्तान सरकार ने जैश ए मुहम्मद के मुख्यालय जमात उद दावा और इसके कथित मानवीय सहायता संगठन फलाह-ए- इनसानियत फाउंडेशन  पर  प्रतिबंध लगाने का ऐलान पाकिस्तान सरकार ने किया। साफ है कि पाकिस्तान ने यह कदम अंतरराष्ट्रीय दबाव में प्रतिबंधो से बचने की शर्त पूरा करने के लिये उठाया है।

पाकिस्तान अब तक यही कहता रहा था कि जमात उद दावा एक शैक्षणिक, धार्मिक और सामाजिक संगठन है और फलाह ए इनसानियत के जरिये मानव सहायता कार्य किये जाते हैं। इनका आतंकवाद से कोई लेना देना नहीं है लेकिन पाकिस्तान सारी दुनिया को बेवकूफ नहीं बन सकता कि ये संगठन क्या करते हैं। ये संगठन वास्तव में जेहाद के कारखाने बन चुके हैं जहां से पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों के अलावा पड़ोसी देशों में जेहाद चलाने के लिये आतंकवादी तैयार किये जाते हैं।

फाइनेंसियल एक्शन टास्क फोर्स की बैठक के पहले पाकिस्तान ने आतंकवादी संगठऩ लश्कर ऐ तैयबा और इसके सरगना  हाफिज सईद द्वारा संचालित इन संगठनों पर प्रतिबंध लगाने का ऐलान कर दुनिया को यह बताने की कोशिश की है कि उसने आतंकवाद के खिलाफ कदम उठा लिया है। लेकिन  पाकिस्तान के इस कदम को तभी भरोसेमंद कहा जा सकेगा जब इन दोनों संगठनों के फाटकों पर ताले नहीं लगा दिये जाते हैं। इनके बैंक खाते बंद नहीं किये जाते हैं औऱ इनके काडरों की गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय निगाह में नहीं लाया जाता है।

भारतीय राजनयिकों के सामने अब दूसरी चुनती होगी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 कमेटी के जरिये पुलवामा और पहले के आतंकवादी  हमलों के लिये जिम्मेदार जैश ए मुहम्मद के सरगना मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंध लगवाना। पिछले तीन साल से चीन द्वारा सुरक्षा परिषद की बैठकों में लगाए गए वीटो की वजह से मसूद अजहर खुलेआम अपनी गतिविधियों का संचालन कर रहा है औऱ पाकिस्तान की धरती से भारत को तरह तरह की धमकियां दे रहा है। लेकिन चीन  मसूद अजहह की इन सार्वजनिक गतिविधियों को प्रतिबंध लगाने लायक नहीं मानता। चीन अब तक यही कहता रहा है कि मसूद अजहर के खिलाफ कोई आम राय नहीं बनी है। अब पुलवामा हमले के बाद सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव के साथ चीन खड़ा दिखा तो क्या यह माना जाए कि चीन  सुरक्षा परिषद की कमेटी 1267 के तहत मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने के कदम का समर्थन करने को मजबूर होगा। पुलवामा हमले के बाद अमेरिका, फ्रांस औऱ ब्रिटेन ने एक बार फिर कहा है कि वह मसूद अजहर के खिलाफ प्रस्ताव को पेश करेगा और इस बार देखना होगा कि चीन अपने सदाबहार दोस्त को बचाने के लिये पुलवामा के आतंकी हमलावरों का साथ देता है या अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ रहता है।

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