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समर नीति: चीन, उत्तर कोरिया से सबक ले पाकिस्तान

पाक पीएम अब्बासी
शाहिद खाकान अब्बासी (प्रतीकात्मक)

पिछले महीने के अंत में भारत– चीन और उत्तर व दक्षिण कोरिया की दो शिखर बैठकें हुईं जिन पर अंतरराष्ट्रीय सामरिक जगत की गहरी नजर रही। इनके नतीजों से दुनिया की दो तनावग्रस्त सीमाओं पर शांति बहाली की उम्मीदें पैदा हुई हैं। इसी तर्ज पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भारत और पाकिस्तान के बीच भी शिखर बैठकों की अपेक्षा करता है लेकिन पाकिस्तान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा। उत्तर कोरिया की तरह पाकिस्तान भी अपने परमाणु बमों का जखीरा बेतहाशा बढ़ाता जा रहा है और वहां यदि जेहादी तत्वों को मौजूदा की तरह ही बढ़ावा दिया जाता रहा तो एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब उसके परमाणु बमों के भंडार पर आतंकवादी संगठनों का कब्जा होगा। यह स्थिति उत्तर कोरिया से भी अधिक भयावह साबित हो सकती है।





उत्तर कोरिया के तानाशाह ने समझ लिया कि उसकी जनता परमाणु बम नहीं रोटी-चावल की मोहताज है, पाकिस्तान के सैन्य हुक्मरानों को भी जल्द यह समझ आना चाहिये कि पाकिस्तान की जनता को परमाणु बम और आतंकवाद की ताकत पर हमेशा के लिये बरगलाया नहीं जा सकता। पाकिस्तान के नागरिक समाज में पहले ही इस बात की मांग तेज हो रही है कि पाकिस्तान को भारत के साथ बातचीत करनी चाहिये। दिसम्बर, 2015 में प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अचानक लाहौर दौरा कर यह पहल की थी जिसके जवाब में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को भी भारत आ कर शांति की बातें करनी चाहिये थीं लेकिन  इसके बदले पाकिस्तान की ओऱ से भारत पर एक बड़ा आतंकवादी प्रहार किया गया।

वास्तव में पाकिस्तान को दक्षिण एशिया का उत्तर कोरिया कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु बमों की धौंस दिखा कर अमेरिका से लेकर पड़ोसी जापान और दक्षिण कोरिया को धमकाया है तो पाकिस्तान भी अपने परमाणु बमों की ताकत पर पड़ोसी भारत और अफगानिस्तान में  आतंकवाद को हर तरह की मदद दे रहा है और इसके जरिये अपने सामरिक हितों की पूर्ति करना चाहता है।

जिस तरह उत्तर कोरिया ने समझ लिया कि केवल परमाणु बम की बदौलत ही वह अपने देश को दुनिया की मुख्यधारा में शामिल नहीं कर सकता और अपना समग्र विकास नहीं कर सकता उसी तरह पाकिस्तान को भी यह समझना होगा कि परमाणु बम और आतंकवाद के मिश्रण वाली समर नीति की बदौलत वह अपने देश को ऐसे नरक में भेज रहा है जहां कोई भी विदेशी निवेशक अपना धन नहीं लगाना चाहता। स्वाभाविक है कि पाकिस्तान की जनता को इसका खामियाजा भुगतना होगा लेकिन पाकिस्तानी अवाम को जिस तरह जेहाद की घुट्टी पिलाई जा रही है वह पूरे दक्षिण एशिया को झुलसा सकती है जिसकी आंच पूरे एशिया पर पड़े बिना नहीं रह सकती। उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु हथियारों का जखीरा समाप्त करने का ऐतिहासिक फैसला शायद अंतरराष्ट्रीय औऱ अमेरिकी दवाब में लिया कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इसी तरह पाकिस्तान पर भी अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय दबाव पड़ना दक्षिण एशिया में शांति और आर्थिक विकास की राह खोलने के लिये जरूरी माना जा रहा है। विश्व समुदाय को पाकिस्तान को बताना होगा कि जिस तरह उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु भंडार को समाप्त कर दक्षिण कोरिया के साथ दोस्ती का संकल्प लिया है पाकिस्तान को भी उसी तरह भारत के साथ दोस्ती के गम्भीर प्रस्ताव रखने होंगे।

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