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समर नीति: पाकिस्तान चौतरफा घिरा

पाक पीएम इमरान खान

पुलवामा में 14 फरवरी को आतंकवादी हमले में सीआरपीएफ  के 40 जवानों की शहादत के बाद पाकिस्तान  चौतरफा घिर गया है।  न केवल आर्थिक  और सैनिक मोर्चे पर बल्कि राजनयिक मोर्च पर भी पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलालत झेलनी पड़ी है। लेकिन पाकिस्तानी ऐसे हैं जो जेहादी सोच से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। जैश ए मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के हमले की जिम्मेदारी लेने वाले बयान के बावजूद पाकिस्तान सरकार ने कहा है कि जैश ए मोहम्मद निर्दोष है।





आतंकवाद को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थन देने के लिये पाकिस्तान को भारत ने 26 फरवरी को  जो सबक सिखाया उससे तिलमिला कर अगले दिन पाकिस्तानी वायुसेना ने अपने करीब दस लड़ाकू विमानों का बेड़ा जम्मू कश्मीर के इलाके में भेजा लेकिन उसे लेने के देने पड़ गए।  भारतीय वायुसेना  ने 26 फरवरी की सुबह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के  बालाकोट पहाड़ी इलाके पर जैश ए मोहम्मद  द्वारा चलाए जा रहे आतंकी प्रशिक्षण शिविर पर हवाई हमला कर उसे जिस तरह तबाह किया उससे पाकिस्तान के पांवों तले जमीन खिसक गई थी । पाकिस्तानी सैन्य हुक्मरानों ने कभी भी नहीं सोचा होगा कि भारत 2011 में ओसामा बिन लादेन को निकालने की अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जैसा कोई सैन्य कदम पाकिस्तान की धरती के भीतर उठाएगा।

 27 फरवरी को पाकिस्तान ने अपनी झेंप मिटाने के लिये जवाबी  कार्रवाई की क्योंकि उसे अपनी जनता को यह दिखाना था कि उसने  भारतीय हमले का जवाब दिया है। पर पाकिस्तान की इस कार्रवाई के बाद सारी दुनिया ने पाकिस्तान को नसीहत दी कि अपने यहां आतंकवादी ढांचे को नष्ट करे। यहां तक कि उसके भ्राता संगठन इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) ने भी पाकिस्तान को भारत के सामने उसकी औकात बता दी। जम्मू कश्मीर मसले पर लगातार भारत विरोधी प्रस्ताव पारित करवाने वाले पाकिस्तान के लिये उसके इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा सदमा था लेकिन पाकिस्तान में चमचागिरी की हद देखिये कि उसकी राष्ट्रीय असेम्बली में  प्रधानमंत्री इमरान खान को  भारतीय लड़ाकू पायलट विंग कमांडर अभिनंदन को भारत के लौटाने का फैसला करने के लिये नोबेल शांति पुरस्कार देने का प्रस्ताव रखा गया।

इस्लामी सहयोग संगठन को पाकिस्तानी लोग अपना ही मंच समझते रहे हैं क्योंकि इसके जरिये वह अब तक भारत के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित करवा लेता था । लेकिन एक मार्च को आबू धाबी में जिस तरह भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने  आतंकवाद को समर्थन देने के लिये पाकिस्तान को फटकारा वह पाकिस्तानियों को लम्बे वक्त तक याद रहेगा। बौखलाए पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने इस पूरे सम्मेलन का पहले ही बहिष्कार करने का  ऐलान कर दिया था ।

 अंतरराष्ट्रीय राजनयिक धरातल पर पाकिस्तान  के लिये यही एक मंच बचा था जिसके जरिये वह भारत को लताड़ा करता था लेकिन इस बार ओआईसी ने खुद पाकिस्तान को ही यह मंच छोड़ने को बाध्य कर दिया। इसके पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जैश ए मुहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन ने लाने का फैसला किया जिसे पाकिस्तान के सदाबहार दोस्त चीन का भी समर्थन मिलने की पूरी उम्मीद की जा रही है।

 साफ है कि आतंकवाद को समर्थन देने वाले देश को अब अपने खास दोस्त देशों से भी मदद नहीं मिल रही है क्योंकि कोई भी देश भले ही वह इस्लामी मुल्क हो आतंकवाद को परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन देता हुआ नहीं दिखना चाहता। आतंकवाद को राज्य की नीति बनाने वाला पाकिस्तान यदि अपनी जिद पर अड़ा रहा तो वह दिन दूर नहीं जब उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय आतंकवाद समर्थक देश घोषित कर दे।

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