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समर नीति: परमाणु हथियारों की होड़ फिर तेज होगी

पाक के न्यूक्लियर वेपन
प्रतीकात्मक फोटो

अस्सी के दशक में जब शीतयुद्ध अपने चरम पर था, दोनों महाशक्तियों अमेरिका और सोवियत संघ ने परमाणु हथियारों की तैनाती और इसकी होड़ को सीमित करने के लिये एक महत्वपूर्ण पहल आईएनएफ  संधि (इंटरमीडियट रेंज न्युक्लियर फोर्सेज ट्रीटी) के जरिये की थी लेकिन अब जबकि आज की दुनिया परमाणु सैन्यीकरण को हिकारत की निगाह से देखने लगी है अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आईएनएफ ट्रीटी से बाहर निकलने का ऐलान कर दुनिया को न केवल चौंकाया है बल्कि इस शंका को बल दिया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का ऐलान दुनिया में फिर से परमाणु हथियारों के विकास औऱ इसकी तैनाती की एक नई होड़ शुरु करेगा।





हालांकि इस संधि में केवल दो ही भागीदार सोवियत संघ और अमेरिका थे इसलिये चीन, ईऱान और भारत जैसे देश इस संधि की परवाह नहीं करते हुए कम और मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात करने में कोई संकोच नहीं कर रहे थे। इसलिये अमेरिका यह कह सकता है कि केवल अमेरिका ही कम दूरी की मिसाइलों की तैनाती रोक दे और चीन, ईरान जैसे देश लगातार इसकी तैनाती करते रहें तो इससे अमेरिकी सुरक्षा को भारी खतरा पैदा हो सकता है।

आईएनएफ संधि में तत्कालीन सोवियत संघ और अमेरिका के बीच यह सहमति बनी थी कि वे 500 से 1000 किलोमीटर वाली शार्ट रेंज न्युक्लियर मिसाइलों, मझली दूरी की 1000 से 5500 किलोमीटर दूरी वाली मिसाइलों का न तो विकास करेंगे औऱ न ही इसकी तैनाती करेंगे। लेकिन गत 20 अक्टूबर को डोनाल्ड ट्रम्प ने रूस द्वारा इसका पालन न करने की शिकायत करते हुए आईएनएफ संधि से बाहर निकलने के फैसले का ऐलान किया। यूरोप की प्रमुख ताकत जर्मनी ने तो तुरंत डोनाल्ड ट्रम्प के इस फैसले पर एतराज जताया। 1987 की संधि के बाद यूरोप में इन मिसाइलों की तैनाती रुक गई थी इसलिये यूरोप के देश चिंतित हैं कि कहीं इसका खामियाजा यूरोपीय देश नहीं भुगतें। 1991 के बाद दोनों महाशक्तियों ने अपने भंडार से 2692 मिसाइलें निरस्त कर दी थीं।

हालांकि चीन आईएनएफ संधि में भागीदार नहीं था लेकिन उस पर यह नैतिक दबाव था कि वह कम दूरी की मिसाइलों की तैनाती औऱ विकास नहीं करे। अब चीन यह कह सकेगा कि जब अमेरिका और रूस इस संधि से बंधे नहीं रहेंगे तो चीन क्यों एकतरफा पहल करे। उसी तरह ईऱान पर तो किसी भी देश का दबाव नहीं पड़ सकता कि वह इन मिसाइलों की तैनाती रोक दे। पाकिस्तान और भारत तो कम दूरी वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की लगातार तैनाती करने लगे हैं।

इस परिप्रेक्षय में आईएऩएफ संधि के कोई व्यावहारिक मायने नहीं रह गये थे। पर इस संधि को खत्म करने का एक नतीजा यह होगा कि यूरोपीय देशों में फिर कम दूरी वाली मिसाइलें तैनात होने लगेंगी। इसका क्रमिक असर दुनिया का तेजी से परमाणुकरण होने पर पड़ेगा। जब अमेरिका और रूस खुलकर कम दूरी वाली मिसाइलों का विकास करने लगेंगे तो चीन, रूस, भारत, ईरान जैसे देशों पर किसी तरह का नैतिक दबाव नहीं डाला जा सकता। आईएनएफ संधि टूटने का एक असर परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर भी पड़ेगा जिसकी पहली गूंज 2020 में एनपीटी की समीक्षा बैठक के दौरान दिखाई देगी।  भारत औऱ पाकिस्तान तो इस संधि को नहीं मानते इसलिये परमाणु हथियारों की बेधड़क तैनाती करने से गुरेज नहीं कर रहे लेकिन अमेरिका, रूस औऱ भारत, पाकिस्तान का बहाना लेकर ईरान जैसे देश जब कम दूरी वाली परमाणु मिसाइलों की तैनाती करने लगेंगे तब इजराइल औऱ सऊदी अरब औऱ ख़ाड़ी के अन्य देश भी कम दूरी वाली परमाणु मिसाइलों की तैनाती से नहीं हिचकेंगे। इन सबका असर दक्षिण एशिया पर भी पड़ेगा। चीन के जवाब में भारत और भारत के जवाब में पाकिस्तान परमाणु हथियारों की तैनाती और तेज करने लगेंगे।

 

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