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समर नीति: अब चीन के गले में मोतियों का हार

पीएम मोदी और शी जिन फिंग

भारत के पड़ोसी देशों के साथ चीन ने जिस तरह रक्षा सम्बन्ध गहरे कर वहां के बंदरगाहों का विकास और उन्हें नौसैनिक इस्तेमाल के लायक बनाने की कोशिश की है भारत भी कुछ उसी तरह की गतिविधियां पिछले कुछ सालों से चीन के इर्द-गिर्द करने में जुटा है। भारत को घेरने की चीन की रणनीति को भारत के गले में मोतियों का हार (स्ट्रिंग आफ पर्ल्स) डालने के समान बताया गया था। भारत ने भी हाल में चीन के पड़ोसी देशों के साथ रक्षा और समुद्री सम्बन्ध विकसित कर चीन के गले  में मोतियों का हार डालने की उसी रणनीति को अब जमीन पर लागू करना शुरू कर दिया है।





प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 30 मई से दो जून तक दक्षिण पूर्व एशिया के तीन प्रमुख देशों का दौरा कर कुछ अहम समझौते किये जिससे इस बात के पूरे संकेत मिलते हैं कि भारत भी चीन के इर्द-गिर्द मोतियों का हार डालने में जुट गया है। जिस तरह चीन ने श्रीलंका,  बांग्लादेश औऱ म्यांमार के अलावा द्वीपीय देशों मालदीव और सेशल्स के साथ अपने रक्षा सम्बन्ध गहरे कर भारत के चारों ओर अपनी मौजूदगी बना ली है उसी तरह भारत ने भी चीन के पड़ोसी समुद्री देशों वियतनाम, सिंगापुर,  इंडोनेशिया, मलयेशिया के साथ रक्षा और नौसैनिक रिश्ते गहरे कर मोतियों का हार पिरोना शुरू कर दिया है।

दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ रिश्ते गहरे करने के लिये भारत ने अपनी लुक ईस्ट नीति को एक्ट ईस्ट नीति में तब्दील कर इसे अधिक जीवंत बनाने के संकेत दिये। इसी के तहत जहां भारत ने सिंगापुर के चांगी नौसैनिक अड्डे पर अपने नौसैनिक पोतों के ठहरने और वहां जरूरी साज-सामान हासिल करने की सुविधा हासिल करने का समझौता पिछले साल किया वहीं इंडोनेशिया के साबांग बंदरगाह पर नौसैनिक अड्डे में तब्दील करने में सहयोग का समझौता किया। वियतनाम के काम रान्ह नौसैनिक अड्डे पर भारतीय पोत पिछले कुछ वर्षों से ठहरने ही लगे हैं। अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सिंगापुर दौरे में लाजिस्टिक्स सप्लाई का जो समझौता किया गया है उससे दक्षिण चीन सागर के इलाके में जा रहे भारतीय युद्धपोतों को जरूरी ईंधन और साज-सामान रास्ते में ही मुहैया हो सकेगा।

इंडोनेशिया का साबांग बंदरगाह मलक्का जलडमरूमध्य के मुहाने पर है जो दक्षिण चीन सागर का प्रवेश द्वार है। इस इलाके में भारतीय पोतों को यदि दीर्घकालीन पड़ाव डालने का मौका मिला तो चीन के लिये जरूर चिंता की बात होगी। वियतनाम के साथ भारतीय नौसेना के गहराते रिश्तों पर चीन के सामरिक हलकों में पहले ही चिंता जाहिर की जाती रही है। चीन के चारों और भारतीय नौसेना द्वारा अपनी मौजूदगी बनाने की अहमियत इस बात में है कि दक्षिण चीन सागर के इलाके में भारतीय व्यापारिक पोतों को किसी तरह के संकट में बचाने के लिये भेजा जा सकेगा। इस इलाके में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बनाने के बाद स्वाभाविक तौर पर भारतीय पोत दक्षिण चीन सागर के इलाके में विचरण करते रहेंगे जिससे भारत वहां से गुजरने का अपना अधिकार जताता रहेगा। चीन का इरादा है कि वह दक्षिण चीन सागर के पूरे इलाके पर अपना प्रादेशिक अधिकार जताए। ऐसा होता है तो वहां से गुजरने वाले भारत सहित सभी देशों के व्यापारिक और नौसैनिक पोतों को चीन की अनुमति लेनी होगी जबकि वह इलाका एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री इलाका है। चीन ने इस इलाके से गुजरने पर किसी तरह की बंदिश लगाई तो दक्षिण चीन सागर के इलाके में सभी देशों को चीन से टकराने की नौबत आ जाएगी। भारत को भी इसके लिये तैयार रहना होगा।

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