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समर नीति: नौसेना के लिए नई पनडुब्बियां

पनडुब्बी-शिशुमार
फाइल फोटो

भारतीय नौसेना के लिये छह नई पनडुब्बियों को हासिल करने की प्रक्रिया अपेक्षित वक्त से काफी बाद शुरु की गई है। भारतीय नौसेना के पास फिलहाल जर्मनी की चार एचडीडब्लू पनडुब्बियां, और रूस की नौ किलो वर्ग की पनडुब्बियों के अलावा फ्रांस की स्कारपीन वर्ग की दो पनडुब्बियां हैं जो हाल में ही नौसेना को सौंपी गई हैं। बाकी चार और पनडुब्बियों का निर्माण चल रहा है। इसके साथ ही एक परमाणु पनडुब्बी अरिहंत भी सौंपी गई है और एक और जल्द सौंपने की तैयारी चल रही है।





हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की बढ़ती जिम्मेदारी के मद्देनजर भारतीय नौसेना को नई ताकत से लैस करने की जरूरत लम्बे अरसे से महसूस की जाती रही है लेकिन लगता है सरकारी प्रक्रियाएं अपने हिसाब से ही चलती है। अन्यथा छह  नई पनडुब्बियो को हासिल  करने का फैसला छह सात साल पहले लिया जाना चाहिये था। ऐसा होता तो अब तक भारतीय नौसेना को नई पनडुब्बियों को मिलने का सिलसिला शुरु हो जाता।

भारतीय नौसेना के दृष्टि पत्र में दो दशक पहले ही कहा गया था कि सन् 2030 तक भारतीय नौसेना के पास कम से कम 24 पनडुब्बियां होनी चाहिये लेकिन जिस गति से नई पनडुब्बियां हासिल की जा रही हैं और जिस गति से पुरानी पनडुब्बियां रिटायर करती जाएंगी उससे नहीं लगता कि पनडुब्बियों की निर्धारित लक्षित  संख्या हासिल की जा सकेगी।  हिंद महासागर में चीनी नौसैनिक पनडुब्बियों के अक्सर विचरण करने की खबरें भारतीय सामरिक हलकों को चिंतित करती हैं । इसे दूर करने के लिये ही हिंद महासागर के इलाके में पनडुब्बियों की टोही क्षमता में भारी बढ़ोतरी की मांग नौसैनिक अधिकारियों द्वारा लम्बे अर्से से की जाती रही लेकिन अब जा कर मौजूदा सरकार ने अपने कार्यकाल के अंत  में छह नई पनडुब्बियों को टेंडर जारी करने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू करने से सामरिक हलकों में राहत की सांस ही ली जाएंगी।  इन नई पनडुब्बियों को भारत के  प्राइवेट सेक्टर की कम्पनियो की साझेदारी से विदेशी कम्पनियों द्वारा भारत में ही बनाने का प्रस्ताव है। पिछली बार फ्रांस से जिन छह स्कारपीन पनडुब्बियों को खऱीदने का फैसला 2006 में लिया गया वे मुम्बई स्थित मझगांव  गोदी पर बनने लगी हैं।

नौसैनिक अधिकारियों के मुताबिक प्रोजेक्ट- 75 के तहत इन पनडुब्बियों के स्वदेशी साझेदारों के साथ मिलकर विदेशी कम्पनियों को बनाने का ठेका दिया जाएगा। इन छह पनडुब्बियों को हासिल करने पर 50, 000 करोड़ रुपये  की लागत आ सकती है।

भारतीय नौसेना ने अपने घटते पनडुब्बी बेड़े की भरपाई के लिये करीब एक दशक  पहले रक्षा मंत्रालय से इनकी सप्लाई के लिये आग्रह किया था। पिछली बार 2006 में फ्रांस से छह स्कारपीन पनडुब्बियों को खरीदने का आर्डर दिया गया था और इसके तीन साल बाद ही नौसेना ने   सरकार को आगाह किया था कि नौसेना का पनड़ुब्बी बेडा पुराना पड़ता जा रहा है जिनकी भरपाई के लिये सरकार को जल्द फैसले करने होंगे। अब 06 नई पनडुब्बयों  के स्वदेशी विकास के लिये नौसेना ने दुनिया की अग्रणी कम्पनियों को एक्सप्रेशन आफ इंटेरेस्ट (EOI) जारी कर दिया है। प्रोजेक्ट- 75 इंडिया के तहत नौसेना छह डीजल इलेक्ट्रिक पनडुब्बी हासिल करना चाहती है।

नौसेना चाहती है कि  छह नई पनडुब्बियां स्कारपीन की तुलना  में कम से कम आधी यानी 50 प्रतिशत बड़ी हों।  नौसेना चाहती है कि छह नई पनडुब्बियों पर 500 किलोमीटर दूर तक मार करने वाली  कम से कम 12 लैंड अटैक क्रूज मिसाइलों के अलावा एंटी शिप क्रूज मिसाइल तैनात करने की क्षमता हो। इनमें 18 भारी वजन वाले टारपीडो रखने की भी सुविधा देने का आग्रह किया गया है।

रक्षा मंत्रालय ने इन पनड़ुब्बियों को वक्त पर बना कर नौसेना को सौंपने के इरादे से नौसेना के एक अफसर को जिम्मेदारी सौंप कर सही फैसला लिया है। इन्हें  मदद देने के लिये  अलावा समुचित अधिकारों  वाली कमेटी का भी गठन कर दिया गया है। उम्मीद  की जानी चाहिये कि अगली सरकार छङ नई पनडुब्बियों के बेडे को वक्त पर नौसेना को सौंपने के लिये जरूरी फैसले लेती रहेगी।

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