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समर नीति: भारत के पड़ोसी- ताली एक हाथ से नहीं बजती !

पीएम मोदी और जिनपिंग
फाइल फोटो

भारत अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को विशेष अहमियत देता रहा है और इसी के अनुरुप प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पड़ोसी पहले की नीति पर अमल करना शुरू किया था लेकिन जैसा कि एक कहावत है ताली अकेले एक हाथ से नहीं बजती। इसके मद्देनजर यह जरूरी है कि भारत के पड़ोसी देश भी भारत की भावनाओं को समझें और भारत के हितों पर चोट पहुंचाने वाले कोई कदम नहीं उठाएं। बांग्लादेश ने भारत के साथ रिश्तों को गहरा करने के लिये भारत की इन भावनाओं को हमेशा ध्यान में रखा है। इसी के अनरुप बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार ने तीसरी बार सत्ता में आने के बाद अपने विदेश मंत्री को पहले विदेश दौरे पर भारत भेजा।





यह दर्शाता है कि बांग्लादेश भारत के साथ रिश्तों को विशेष अहमियत देता है और वह भारत के साथ रिश्तों को औऱ गहरा करने के लिये आपसी सहयोग और सद्भावना का माहौल बनाए रखेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने विदेश मंत्री मोमिन के साथ मुलाकात में ठीक ही कहा कि भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बाकी दुनिया के लिये माडल के तौर पर देखे जाने लगे हैं।

भारत की यही कोशिश रही है कि अपने छोटे पड़ोसी देशों की विकास जरूरतों को पूरा करते हुए  उसके हितों के अनुरुप दोस्ती और सहयोग का रिश्ता बनाए रखे। इसी तरह भारत ने अपने दूसरे पड़ोसी देशों भूटान, नेपाल, श्रीलंका, म्यांमार और मालदीव  के साथ भी रिश्ते गहरे करने की कोशिश की है। लेकिन  एक पाकिस्तान है जो भारत के खिलाफ हर तरह की दुश्मनी का रिश्ता निभा रहा है। यह न केवल पाकिस्तान के हितों के खिलाफ है बल्कि इससे क्षेत्रीय शांति व स्थिरता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है।

 दूसरी ओर चीन भारत के पड़ोसी देशों को लुभावने प्रस्ताव दे कर अपने पाले में करने की कोशिश करता रहा है। लेकिन शुक्र है कि मालदीव , श्रीलंका औऱ बांग्लादेश की जनता ने चीन के प्रभाव को धत्ता बताते हुए अपने मन के मुताबिक सरकार चुनी जो भारत के साथ सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाए रखने में यकीन रखती है। दक्षिण एशिया के ये देश यदि आपसी सौहार्दे से नहीं रहे तो उन्हें ही इसका खामियाजा भुगतान पड़ेगा। भारत के पड़ोसी देशों की भारत के साथ जो सांस्कृतिक समानता और आर्थिक आदान-प्रदान का रिश्ता रहा है।  वह इन देशों को भारत का स्वाभाविक दोस्त का दर्जा देता है। लेकिन पाकिस्तान सहयोग की इन बातों को नजरअंदाज करता है।  यही वजह है कि वह आर्थिक संकट के भीषण दौर से गुजर रहा है। भारत के साथ आर्थिक सहयोग का रिश्ता रखे तो पाकिस्तान के कई संकट दूर हो सकते हैं। पाकिस्तान के लिये इसका इलाज  भारत के साथ दोस्ती का रिश्ता ही है न कि दुश्मनी का रिश्ता। हमेशा दुश्मनी के माहौल में रहने से सबसे अधिक नुकसान पाकिस्तान के आम अवाम को ही हो रहा है लेकिन पाकिस्तान के सैनिक शासकों का निहित स्वार्थ आम आदमी के हितों की बात नहीं सोचना बल्कि सैन्य जनरलों की मूंछ उंची रखने से ही सधता है।

 पाकिस्तानी सोशल मीडिया और समाचार जगत में हाल में कुछ ऐसे विचार देखने को मिले हैं जिनसे लगता है कि पाकिस्तान के लोग अब भारत  के साथ दुश्मनी की कीमत औऱ अधिक चुकाने को नहीं तैयार है। अभी हाल में पाकिस्तान में कश्मीर सलिडेरिटी डे यानी कश्मीर एकता दिवस मनाया जसमें पाकिस्तान के नये  प्रधानमंत्री इमरान खान नहीं  शामिल हुए। ऐसा लगता है कि पाकिस्तान के नये  नेता ने यह समझ लिया है कि अपने लोगों की बेहतरी के लिये जरूरी है कि वह हमेशा भारत विरोधी तेवर में  नहीं दिखें। ऐसा दिखते रहने से पाकिस्तान का भारी नुकसान हो रहा है और अब वक्त आ गया है कि अन्य पड़ोसी देशों के साथ साथ पाकिस्तान भी भारत के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाए।

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