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समर नीति: साहसी फैसले के बाद सूझबूझ की जरूरत

जम्मू-कश्मीर
फाइल फोटो

जम्मू कश्मीर को दो केन्द्र शासित प्रदेशों में बांटकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐतिहासिक और साहसी फैसला लिया है लेकिन इस फैसले को  जम्मू कश्मीर के लोगों के गले उतारना एक बड़ी  सामरिक चुनौती के तौर  पर सरकार के सामने पेश होगा। एक ओर जहां भारत को कश्मीरी लोगों की भावनाओं को ख्याल रखना होगा वहीं भारत को देखना होगा कि अंतरराष्ट्रीय जनमत भारत के खिलाफ नहीं चला जाए।





जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में तीन भागों में बंटे कश्मीर के केवल एक भाग श्रीनगर और आसपास के इलाकों में ही केन्द्र सरकार के फैसले के व्यापक विरोध की आशंका जताई जा रही है। इस फैसले पर जहां लद्दाख में भारी जश्न का माहौल है वहीं जम्मू के इलाकों में भी लोग खुशियां मना रहे हैं। भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यही बताना होगा कि पूरा जम्मू-कश्मीर विद्रोह ग्रस्त नहीं है और यदि केवल श्रीनगर और आसपास के शहरों में लोग  विरोध की ज्वाला में जल रहे हैं तो इसके पीछे पाकिस्तान और उसके कुछ कश्मीरी पिट्ठू नेताओं का ही हाथ है। अब तक धारा- 370 की वजह से इन पिट्ठू नेताओं को काबू में रखना मुश्किल हो रहा था लेकिन अब जब कि धारा-370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया है श्रीनगर और कश्मीर घाटी के अन्य शहरों में विरोध को काबू में रखने के लिये  केन्द्रीय  सुरक्षा बलों को सूझबूझ से स्थानीय जनता के साथ पेश आना होगा।

 एक और जहां भारत को घरेलू विरोध से निबटने की चुनौती है वहीं भारत को अंतरराष्ट्रीय मोर्चे को भी सम्भालना होगा। फिलहाल भारत के फैसले पर  अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कुल मिलाकर सकारात्मक  प्रतिक्रिया दी है और रूस, मालदीव, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों ने तो खुलकर भारत के पक्ष में बयान दिये हैं। अमेरिका का रुख भी भारत का मनोबल बढ़ाने वाला है। पाकिस्तान ने धमकी दी है कि  वह संयुक्त राष्ट्र में इस मसले को उठाएगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह मुहम्मद कुरेशी ने तो सबसे पहले चीन की शरण ली और पेइचिंग जा कर चीनी नेताओं के समक्ष गिड़गिडाए कि भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए। लेकिन भारत को अपने सामरिक साझेदार रूस पर भरोसा है जो संयुक्त राष्ट्र में इस मसले को एक हद से आगे नहीं जाने देगा। चीन को पता है कि वह कश्मीर मसले पर अधिक नहीं बोल सकता क्योंकि तब उससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय यह पूछने लगेगा कि वह अपने गिरेबान में झांके और दुनिया को यह बताए कि अपने विद्रोह ग्रस्त प्रदेश शिनच्यांग और हांगकांग में क्या कर रहा है।

 कश्मीर का मसला एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मसला नहीं बने इसके लिये भारत सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कश्मीर घाटी के भीतर हालात काबू में रहे। फेक न्यूज और फेक वीडियो के इस जमाने में पाकिस्तान की ओर से भरसक कोशिश होगी कि भारत को बदनाम करने वाले झूठे वीडियो और समाचारों को फैलाए और यदि फैलता है तो इसके प्रतिवाद के लिये भारतीय सुरक्षा एजेंसियां तुरंत कार्रवाई करने के लिये मुस्तैद रहना होगा। निश्चय ही पाकिस्तान  आग में घी डालने से बाज नहीं आएगा इसलिये भारत सरकार को अपने सुरक्षा बलों को यह खास निर्देश देना होगा कि स्थानीय कश्मीरी लोगों के साथ मानवीय तरीके से पेश आएं। सरकार को यह भी देखना होगा कि जो हजारों कश्मीरी छात्र दूसरे राज्यों में पढाई कर रहे हैं या बिजनेस करने के लिये गए हैं उनके साथ किसी तरह की बदसलूकी नहीं की जाए। इस तरह की छोटी घटना का मीडिया में व्यापक प्रचार होता है और इसका इस्तेमाल घाटी में हिंसक माहौल को भड़काने के लिये किया जाता है।

मोदी सरकार को अपने साहसी फैसले का औचित्य ठहराने के लिये  हर मोर्चे पर मुस्तैद रहना होगा और सबसे अधिक इस बात का  ख्याल  रखना होगा कि आम कश्मीरी लोगों के साथ किसी तरह के अमानवीय व्यवहार सुरक्षा बल जाने अनजाने में नहीं करें। जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण एकीकरण के लिये  कश्मीरी लोगों के दिलो दिमाग को जीतने के लिये सुनियोजित रणनीति से काम करना  सबसे जरूरी होगा।

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