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समर नीति: चीन की गोद में मालदीव

अरब सागर में मालदीव

पांच साल पहले राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद की सत्ता पलट कर राष्ट्रपति बनने वाले राष्ट्रपति यामीन अब्दुल गयूम अपनी कुर्सी बचाने के लिये पूरी तरह चीन की गोद में चले गए लगते हैं। वजह यह है कि जनतांत्रिक भारत मालदीव के पहले जनतांत्रिक नेता मुहम्मद नशीद को जनतांत्रिक मूल्यों में भरोसा करने की वजह से समर्थन देता है। मौजूदा राष्ट्रपति यामीन को भारत ने हमेशा यही सलाह दी है कि अपने देश में स्वतंत्र चुनाव करवाए। यामीन को भरोसा नहीं कि वह चुनाव में जीतेंगे इसलिये वह भारत पर  अपनी घरेलू राजनिति में हस्तक्षेप  मानते हुए चीन की शरण  में चले गए हैं और इसकी कीमत के तौर पर उन्होंने अपने देश को चीन के हवाले कर  दिया है।





राष्ट्रपति की अपनी कुर्सी बचाने के लिये यामीन अब्दुल गयूम ने चीन को न केवल अपने द्वीप सौंपे हैं बल्कि चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता भी कर लिया है और अब राष्ट्रपति यामीन अपनी जनता को बरगलाने के लिये अपने सरकार नियंत्रित मीडिया में भारत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विरोधी जहर भी उगल रहे हैं। हद तो तब हो गई जब उन्होंने माले में भारतीय राजदूत की तौहीन भी करनी शुरू कर दी। पिछले महीने जब वह मालदीव के स्थानीय निकाय के तीन अधिकारियों से मिले तो उन्हें इसलिये मुअत्तल कर दिया कि सरकार से अनुमति लिये बिना क्यों भारतीय राजदूत से मिले। न केवल यही बल्कि भारतीय राजदूत के यहां-वहां जाने पर भी करीब निगाह रखी जा रही है।

पौने चार लाख आबादी वाला मालदीव केरल के समुद्र तट से केवल 300 किलोमीटर दूर स्थित है जहां चीन का दबदबा स्थापित होना निश्चय ही भारत के लिये गहन चिंता की बात है। इसके पहले केरल-तमिलनाडु के समुद्री इलाके में दूसरे द्वीप देश श्रीलंका पर चीन द्वारा अपना दबदबा जमाने से भारत के  माथे पर चिंता की लकीरें खिंची थीं। अब मालदीव का भी चीन की मुट्ठी में चला जाना भारत के सामरिक हलकों में भारी चिंता पैदा कर रहा है। भारत के गहरे एतराज के बाद श्रीलंका सरकार ने अब चीनी पनडुब्बियों को श्रीलंका के नौसैनिक अड्डों पर आना रोक दिया है लेकिन मालदीव ने जिस तरह अपने द्वीप ही चीन को पट्टे पर दे दिये हैं उससे वहां चीनी नौसैनिक पोतों को पड़ाव और रखरखाव के लिये आने से भारत रोक नहीं सकता।

भारत किंकर्तव्यविमूढ़ है। विदेश मंत्रालय मालदीव के घटनाक्रम पर पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है।  मालदीव में जब भारत को अपमानित करने का सिलसिला चल रहा था तब मालदीव के थलसैनिक भारतीय थलसैनिकों के साथ आतंकवाद विरोधी कार्रवाई का अभ्यास कर रहे थे। दो सप्ताह तक चलने वाला एक्सर्साइज एकुवेरिन ऐसे सम्पन्न हुआ जैसे भारत-मालदीव के रिश्ते सामान्य चल रहे हों। भारत यदि मालदीव के साथ एकुवेरिन साझा सैन्य अभ्यास रोक देता और मालदीव वापस भेज देता तो मालदीव की सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि चीन हमेशा ही उसे हर तरह की मदद देने को तैयार बैठा है। दिसम्बर के तीसरे सप्ताह में ही मालदीव के राष्ट्रपति ने चीन का दौरा किया है। जब कि सत्ता सम्भालने के बाद सभी पड़ोसी देशों और बीसियों अन्य देशों का दौरा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसलिये मालदीव का दौरा नहीं किया है कि राष्ट्रपति यामीन जनतांत्रिक मूल्यों का पालन नहीं कर रहे। साफ है कि अंतरराष्ट्रीय सामरिक समीकरण अपने देश के हितों को देख कर बनाये जाते हैं जैसा कि चीन कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में नैतिकता और जनतांत्रिक मूल्यों की बात करना अक्सर राष्ट्रीय हितों के लिये नुकसानदेह साबित होता है।

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