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समर नीति: मालदीव और भारत के रिश्ते फिर पटरी पर

पीएम मोदी मालदीव दौरे पर

मालदीव के सागर से जनतांत्रिक महक वाली ताजी हवा भारत के केरल समुद्र तट तक  पहुंचने  लगी  है और यही वजह है कि छह सालों में पहली बार भारत का कोई शिखर नेता मालदीव के नये राष्ट्रपति सोलेह के शपथग्रहण समारोह में भाग लेने गया। अब मालदीव के विदेश मंत्री के बाद वहां के राष्ट्रपति  सोलेह का भारत आने का कार्यक्रम बनाया गया है ।  गत 17 नवम्बर को प्रधानमंत्री मोदी का राजधानी माले का दौरा भारत और मालदीव के बीच ढहे रिश्तों की  नई इमारत की नींव  डालने वाला था। अब इसके फल दिखने लगे हैं। मालदीव की नई सरकार ने चीन की नाराजगी की परवाह नहीं करते हुए साफ कहा है कि उसकी विदेश नीति इंडिया फर्स्ट की होगी यानी वह भारत के साथ रिश्तों को प्राथमिकता देगा।  2012 में जिस राष्ट्रपति मुहम्मद नशीद की सत्ता अब्दुल्ला यामीन ने पलटी थी वह अब  फिर  से मालदीव की नई सरकार में प्रभावी भूमिका में लौट आए हैं।





चार लाख आबादी वाले द्वीप देश मालदीव के लिये भारतीय नेता का दौरा इस बात का सूचक था कि वह अब अपने  पुराने दोस्त के साथ फिर से दोस्ती की गांठें बांधना चाहता है। मालदीव के नये नेताओं के हाल में जो बयान आए हैं वे भारत का उत्साह बढ़ाने वाले हैं। एक के बाद एक भारत के पड़ोसी जिस तरह भारत से मुंह मोड़ने लगे थे वे भारत के लिये काफी चिंताजनक हो गए थे। इसलिये भी कि भारत के सभी पड़ोसी भारत को चिढ़ाते हुए चीन को अपने यहां अड्डेबाजी करने का निमंत्रण देने लगे थे।

लेकिन अब मालदीव की नई सरकार ने जिस तरह पांच सालों के भीतर चीन से हुए समझौतों की समीक्षा करने के संकेत दिये हैं  वे भारत को यह उम्मीद दिलाते हैं कि मालदीव चीन से दूरी बनाएगा और भारत के साथ  गहरे रिश्ते विकसित करेगा। मालदीव के नये नेताओं ने कहा भी है कि चीन मालदीव के भौगोलिक इलाके से काफी दूर है इसलिये उसे मालदीव के मामलों में दखल नहीं देना चाहिये।

मालदीव औऱ भारत के बीच गहरे रक्षा सम्बन्ध एक स्वाभाविक सामरिक साझेदार की हैसियत से विकसित हुए हैं जिन पर चीन की तिरछी नजर लम्बे अर्से से रही है। 2012  में जब चीन समर्थक यामीन सरकार सत्तारुढ़ हुई तो चीन के लिये अपना सामरिक एजेंडा लागू करना काफी आसान हो गया। चीन ने मालदीव के हवाई अड्डे  के निर्माण से लेकर कई अन्य अहम ढांचागत प्रोजेक्ट भारत से छीन लिये और अपनी गहरी मौजूदगी वहां बनानी शुरु की। मालदीव के कुछ द्वीपो को भी चीन ने पर्यटन के नाम पर हथियाने शुरू किये ताकि वहां बाद में अपनी नौसैना के पोतों को ठहरने की सुविधा हासिल कर सके। चीन और मालदीव के बीच तेजी से विकसित होते इस ‘नापाक’ रिश्तों पर भारत की चिंतित निगाह थी लेकिन बेबस भारत कुछ कर नहीं पा रहा था। अमेरिका औऱ यूरोपीय देशों ने भी  मालदीव के चीन परस्त नेताओं को समझाने की कोशिश की पर वे नहीं माने। पर मालदीव की जनता अपने नेताओं की इन हरकतों को देख रही थी और जनतांत्रिक चुनावों का पहला मौका मिलते ही उन्होंने अपने मताधिकार की  असीम ताकत का इस्तेमाल किया औऱ मालदीव को एक बार फिर  पुराने दोस्त भारत से गले मिलाने का मौका दिया।

 भारत के लिये यह एक भारी राहत की बात इसलिये है कि केरल के समुद्र तट से महज 500 किलोमीटर दूर  स्थित द्वीप देश में चीन की नापाक मौजूदगी को बेदखल किया जा सकेगा। भारत और मालदीव के बीच सैन्य सम्बन्ध अब पहले की तरह फिर बहाल होंगे।   इसके जरिये मालदीव  और भारत के बीच परस्पर विश्वास का रिश्ता विकसित होगा।

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