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समर नीतिः पाक आतंकवाद छोड़े तो आर्थिक हालात सुधरेंगे

Pakistan's-Terror

आतंकवाद को अपनी समर नीति का हिस्सा बनाने का खामियाजा पाकिस्तान कई सालों से भुगत रहा है लेकिन अब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था संकट के जिस मुहाने पर पहुंच चुकी है वह पाकिस्तान को भीतर से खोखला करता हुआ दिखा रही है। पाकिस्तान के पास देश चलाने के लिये करीब दो महीने का विदेशी मुद्रा भंडार बचा है। केवल नौ अरब डालर के भंडार से पाकिस्तान अपनी जनता के लिये जरूरी चीजें मुहैया नहीं करा सकता। संकट की इस घड़ी में पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा निधि ( आईएमएफ) की तरफ एक बार फिर कटोरा लेकर खड़ा है लेकिन आईएमएफ ने कहा है कि करीब पांच अरब डालर का जो पिछला कर्ज दिया था पाकिस्तान उसे ही लौटाने की स्थिति में नहीं है तो अगला कर्ज कैसे चुकाएगा।  आईएमएफ ने कर्ज देने के लिये रुपये के अवमूल्यन की शर्त रखी है जिसे पाकिस्तान मानने को तैयार नहीं क्योंकि उसकी मुद्रा पहले ही 121 रुपये प्रति डालर तक गिर गई है। संकट के ऐसे वक्त पाकिस्तान का हर मौसम के सदाबहार दोस्त चीन ने एक अरब डालर मुहैया कराया है लेकिन पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चलाने वालों को पता है कि यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है। केवल कुछ दिनों का पाकिस्तान सरकार का खर्च इस एक अरब डालर से नहीं चल पाएगा। पिछले साल भी चीन के बैंकों ने पाकिस्तान को एक अरब डालर का कर्ज दिया था। चीन तो यही चाहता है कि पाकिस्तान किसी तरह उसके कर्ज के जाल में फंस जाए औऱ फिर पाकिस्तान पर उसका शिकंजा और कस जाए।





इसके बावजूद पाकिस्तान को चीन से अपेक्षित मदद नहीं मिली। आतंकवादी तत्वों को शरण देने वाले पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन संरक्षण देता रहा है लेकिन पाकिस्तान का पेट आतंकवाद के नाम पर कमाए गए पैसे से ही नहीं भर सकता। पाकिस्तान अपना खजाना तालिबान और लश्कर ए तैयबा जैसे आतंकवादी तत्वों को वित्तीय मदद देने में खाली करता रहा है और यही वजह है कि  आतंकवाद को वित्तीय मदद देने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने पाकिस्तान को ग्रे- लिस्ट में डालकर चेतावनी दी है कि आतंकवादी तत्वों को वित्तीय मदद रोकने  का  वादा करे।

वास्तव में जो देश आतंकवाद की शरणस्थली और उसे पैदा करने वाला देश बन चुका हो वहां कौन  निवेश करने जाएगा। खुद पाकिस्तान के उद्योगपति ही अपने देश में निवेश नहीं करते। दूसरी ओर पाकिस्तान की सेना इतनी खर्चीली है कि उस पर कोई लगाम नहीं लग सकती। पाकिस्तान की सेना ही आतंकवादी गुटों की संरक्षक बनी हुई है। आतंकवाद की वजह से चूंकि पाकिस्तान का उद्योग धंधा   चौपट हो चुका है इसलिये पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था प्रगति ही नहीं कर रही। अब तक पाकिस्तान को  आतंकवाद रोकने के नाम पर और अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में सहयोग देने के नाम पर अमेरिका ने पिछले देढ़ दशक में 30 अरब डालर की फिरौती दी लेकिन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यह मदद जारी रखने पर भी रोक लगा दी। आतंकवाद के नाम पर जो फिरौती पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय समुदाय से वसूल रहा था वह स्रोत अब सूख चुका है। पाकिस्तान का अधिकतर आयात चीन से होता है और चीन की कम्पनियां अपने निर्यात का धन वसूलने के लिये पाकिस्तान पर दबाव डाल रही हैं।

पाकिस्तान में इन दिनों चुनाव का माहौल है और वहां एक कार्यवाहक सरकार है जो बड़े फैसले नहीं ले सकती। लेकिन संकट से गुजर रही पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था को तत्काल ऐसी नीतियों की जरुरत है जो पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा पैदा कर सके। इसके लिये जरूरी सांकेतिक कदम उठा कर पाकिस्तान को यह संदेश देना होगा कि आतंकवाद अब उसकी समर नीति का हिस्सा नहीं रहा।

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