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समर नीति : अमेरिकी सनक पर रोक कैसे लगे

ट्रंप और हसन रूहानी

ईरान में  हमने अमेरिकी राष्ट्रपति की सनक की एक बानगी देखी है। किसी राष्ट्रनेता की निजी सनक और आदतों की वजह से दुनिया की राजनीति किस कदर प्रभावित होती है यह हम देख रहे हैं। ईऱान के आला जनरल  कासिम सुलेमानी को ड्रोन- मिसाइल हमले में मार कर अमेरिकी सेना ने अपनी ताकत का चमत्कार तो दिखाया है लेकिन इससे यह भी उजागर हुआ है कि अमेरिका के राष्ट्रपति को यदि खुली छूट दी जाए तो वह पूरी दुनिया को तबाह कर सकता है। अमेरिका की इतनी ताकत है कि दूसरी बडी ताकतें जैसे चीन या रूस भी अमेरिका को सनकीपन भरे कदम उठाने से नहीं रोक  सकते।  इसीलिये 1973 मे  अमेरिकी कांग्रेस ने सर्वसम्मति से वार पावर्स एक्ट तैयार किया था जिसे अब अमेरिकी जन प्रतिनिधि व्यवहार में लाने के लिये कदम उठा चुके हैं लेकिन चूंकि अमेरिकी सेनेट में सत्तारुढ़ रिपब्लिकन पार्टी का बहुमत है इसलिये वहां इस कानून के तहत राष्ट्रपति की शक्ति को सीमित करने की  उम्मीद कम ही है।





 अमेरिका में यह सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या उसके राष्ट्रपति को इतनी ताकत मिले जाए  कि वह अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये किसी देश के खिलाफ युद्ध छेडने जैसा  कदम उठा ले। ईऱान तो अमेरिका के सामने सैनिक तौर पर बौना देश है लेकिन उसके पास भी इतनी सैन्य ताकत है कि वह किसी युद्ध में अमेरिका को लहुलूहान कर सके। भले ही अमेरिका ईऱान से भौगोलिक तौर पर काफी दूर स्थित है और ईऱान उसकी सीमा के भीतर अमेरिका का बालबांका नहीं कर सकता लेकिन दुनिया भऱ में खासकर खाडी के देशों में ही अमेरिका के इतने सैनिक अड्डे  हैं जहां हजारों सैनिक तैनात हैं कि उऩ पर मिसाइलें चला कर सैंकडों की जान ले सकता है।

 ईऱान औऱ अमेरिका के बीच युद्ध में अमेरिका तो निश्चय ही विजयी होगा लेकिन इससे पूरा खाड़ी का इलाका धू धू कर जलने लगेगा। इससे सबसे बड़ी चिंता भारत के सामने  पैदा हो गई है। हालांकि राष्ट्रपति ट्रम्प ने बुधवार को ईऱान के नाम शांति का पैगाम भेजकर युद्ध का तापमान गिरा  दिया है लेकिन खतरा टला नहीं है। अमेरिका ने ईऱान की आत्मा झकझोरी है जिससे वह तिलमिलाया हुआ है । ईरान ने अमेरिका और विश्व समुदाय के साथ सौहार्दपूर्ण तरीके से रहने के लिये ही 2015 में  यूरोपीय देशों औऱ चीन के साथ समझौता किया था कि वह अपने परमाणु संयंत्रों में यूरेनियम का इतना संवर्द्धन नहीं करेगा जिससे परमाणु हथियार बनाए जा सकें। ईऱान ने इस समझौते का पालन भी करना शुरू किया था लेकिन राष्ट्रपति ट्रम्प ने सत्ता सम्भालते ही ईऱान के खिलाफ अपशब्द कहने शुरू किये  और अंततः 2018 में ईरान के साथ छह जिम्मेदार देशों के हुए समझौते को तोडने का ऐलान कर दिया। ईरान  ने इस समझौते के पालन के लिये अंतरराष्ट्रीय समुदाय को हर सम्भव तरीके से भरोसे में लिया था लेकिन अमेरिका ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए परमाणु समझौते को न केवल तोड़ा बल्कि उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करने के बहाने ढूंढ़ने लगा।  इसी के तहत ईऱानी जनरल सुलेमानी  की हत्या करवाई गई।

 यह वही जनरल सुलेमानी हैं जिन्होंने 2001 में अफगानिस्तान में तालिबान को उखाड़ फेंकने में अहम भूमिका निभाई । जनरल सुलेमानी इस्लामिक स्टेट के सबसे बड़े दुश्मन माने जाते हैं। वह अल कायदा के भी घोर दुश्मन रहे हैं। होना तो यह चाहिये था कि जनरल सुलेमानी का इस्तेमाल अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी के प्रयासों को विफल करने में  किया जाता। जनरल सुलेमानी का साथ लेकर इस्लामिक स्टेट से भी प्रभावी तरीके से लड़ा जा सकता था लेकिन अमेरिकी समर नीति के कर्णधार  हमेशा अल्पकालिक नजरिये से ही सोचते  हैं। यही वजह है कि जिस अमेरिका के सैकंडों सैनिकों को तालिबान ने मौत के घाट उतारा औऱ जिस पाकिस्तान  ने तालिबान को हर तरह की मदद देकर अपने यहां शरण दी हुई है उसी तालिबान और इसके संरक्षक पाकिस्तान की अमेरिका चिरौरी कर रहा है।

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