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समर नीति: परमाणु हथिय़ारों की होड़ कैसे रुके

न्यूक्लियर बम

शीतयुद्ध के दौर में अमेरिका और सोवियत संघ ने अपने परमाणु हथियारों और परमाणु बमों से लैस बैलिस्टिक मिसाइलों की बेतहाशा तैनाती की लेकिन शीतयुद्ध के समाप्त होते होते दोनों महाशक्तियों ने इन पर लगाम लगाने के लिये भी संधि की। पर गत जनवरी में अमेरिका ने जब 1987 में दस्तखत की गई इंटरमीडियट रेंज न्युक्लियर फोर्सेज ट्रीटी (आईएनएफ) को एकतरफा तोड़ने का ऐलान किया तो सामरिक हलकों में फिर से चिंताएं जाहिर की जाने लगी कि परमाणु हथियारों की नये सिरे से होड़ शुरू होगी जिससे इस पृथ्वी का भविष्य और अनिश्चित हो जाएगा।





अमेरिका ने आईएनएफ संधि यह बहाना लगाकर तोड़ने का ऐलान किया कि रूस इसकी अवहेलना कर रहा है और संधि की भावना को तोड़ते हुए नई किस्म की परमाणु मिसाइलों की तैनाती कर रहा है। हालांकि रूस ने इससे इनकार किया। एक और चिंता की बात यह थी कि चीन भी बैलिस्टिक मिसाइलों का धड़ल्ले से निर्माण और तैनाती करने लगा है औऱ यह कैसे हो सकता है कि अमेरिका और रूस तो अपनी बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती रोक दें और चीन नई  नई किस्म की मिसाइलों को तैनात करने लगे। इसलिये जरूरी हो गया है कि रूस, अमेरिका और चीन भविष्य में  हथियारों की तैनाती पर नियंत्रण लगाने वाली अंतरराष्ट्रीय संधि में साझेदार बनें।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का हाल का एक बयान राहत देने वाला है कि वह सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि( स्टार्ट ) का नवीनीकरण रूस के साथ करेंगे लेकिन उसमें चीन को भी भागीदार बनाया जाएगा। चीन ने भी इस पहल का स्वागत किया है औऱ वह भी भविष्य की शस्त्र परिसीमन संधि में भागीदार बनना  चाहता है।  मई के पहले सप्ताह में राष्ट्रपति ट्रम्प ने जब कहा कि परमाणु हथियारों को सीमित करने वाली नई संधि पर उन्होंने रूसी राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन से बात की है तो सामरिक हलकों में राहत की सांस ली गई कि अमेरिकी राजनीतिक नेतृत्व इस आशय की  पहल कर रहा है। उन्होंने यह संकेत भी दिया कि इस संधि को त्रिपक्षीय बनाया जाएगा और इसमें चीन को भी शामिल किया जाएगा।

अमेरिका और रूस के बीच नई स्टार्ट संधि ( सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि ) पर 2011 में दस्तखत हुए थे और इसकी मियाद 2021 मे पूरी होने वाली है। यदि दोनों परमाणु ताकतें तैयार हो जाएं तो इसकी मियाद पांच साल के लिये बढ़ाई जा सकती है। यदि इस आशय की संधि दोनों पक्षों के बीच नहीं होगी तो दोनों देश एक दूसरे के इरादों पर शक करेंगे और एक दूसरे से छुपा कर नई मारक क्षमता वाली नई परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती करने लगेंगे । डोनाल्ड ट्रम्प इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि  परमाणु  बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती और रखऱखाव पर भारी खर्च करना होता है जो अनावश्यक  है।

 डोनाल्ड ट्रम्प का सोचना है कि नई स्टार्ट संधि पर पहले अमेरिका और रूस आपसी सहमति बनाएं और बाद में इसमें चीन को साथ लिया जाए। गौरतलब है कि चीन की परमाणु मिसाइलों की तैनाती अमेरिका और रूस की तुलना में काफी कम है लेकिन  वह खासकर अमेरिका के मुकाबले प्रतिरोधक ताकत हासिल करने के लिये नई नई मारक क्षमता वाली  बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती करता रहेगा तो इससे अमेरिका और रूस की परमाणु ताकत को बेअसर किया जा सकेगा। चीन की परमाणु तैनाती के जवाब में अमेरिका और रूस भी अपनी तैनाती  को गति देंगे औऱ इसका नतीजा होगा कि रूस, अमेरिका औऱ चीन तीनों ही एक दूसरे की ओऱ निशाना कर नई  बैलिस्टिक मिसाइलों की तैनाती बढ़ाने लगेंगे जिससे इस पृथ्वी पर परमाणु हथियारों के गलती से चलने का खतरा बढ़ सकता है और तीनों देश जब एक दूसरे की क्षमताओ और नई योजनाओं पर शक करने लगेंगे तो भारत, पाकिस्तान, ईरान, इजराइल , सऊदी अरब जैसे देश भी नई किस्मों की मिसाइलों की तैनाती करने लगेंगे। यह स्थिति भयावह होगी।

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