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समर नीति: ‘मेक इन इंडिया’ कैसे हो कामयाब !

आयुध कारखाना
फाइल फोटो

भारतीय सेनाओं के लिये  नये हथियारों की खरीद के लिये एक लाख करोड़ रुपये से भी अधिक का  प्रावधान  पिछले साल के आम बजट में किया गया है। इसमें से अधिकांश राशि का इस्तेमाल हथियारों के आयात पर ही होना  है। भारत में भले ही चालीस से अधिक आयुध कारखाने हों, सार्वजनिक क्षेत्र के 08 बड़े उपक्रम हों और 40 से अधिक रक्षा प्रयोगशालाओं वाला रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन हो भारतीय सेनाओं को दो तिहाई से अधिक आयात पर ही निर्भर करना पड़ता है। यह एक विडम्बना ही है कि जो देश चांद पर अपने उपग्रह भेजता हो, बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन स्वदेशी तकनीक से करता हो, अपनी तकनीकी क्षमता पर परमाणु पनडुब्बी का निर्माण करता हो, अपनी क्षमता से परमाणु हथियारों का उत्पादन करता हो वह देश लड़ाकू विमानों, पनडुब्बियों, हेलिकॉप्टरों आदि की जरूरतों को पूरा करने के लिये विदेशी कम्पनियों पर निर्भर करता है।





इसके लिये हम भारत के अब तक के राजनीतिक नेतृत्व को ही जिम्मेदार ठहरा  सकते हैं। हमारे देश में समुचित  कौशल वाले युवा उपलब्ध होने के बावजूद इनका इस्तेमाल देश को संवेदनशील तकनीक के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिये नहीं हो सका है। लेकिन आज का राजनीतिक नेतृत्व अब सचेत हो गया है औऱ लड़ाकू विमानों और पनडुब्बियों जैसे सैनिक मंचों का देश में ही उत्पादन करने के लिये मेक इन इंडिया की पहल की है। इसके तहत विदेशी हथियार कम्पनियों को भारतीय प्राइवेट औऱ सरकारी कम्पनियों के साथ साझेदारी कर शस्त्र प्रणालियों के भारत में ही उत्पादन की कोशिशों में भारी तेजी आई है।

इस इरादे से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने गम्भीर कोशिशें की हैं। वह विदेशी राजदूतों और रक्षा अताशे से मिल रहे हैं, विदेशी रक्षा कम्पनियों को भारत में ही अपनी  उत्पादन सुविधाएं लगाने को प्रेरित कर रहे हैं और विदेशी उद्योग प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कर रहे हैं। अक्टूबर के अंतिम सप्ताह में ही उन्होने विदेशी राजदूतों के साथ राउंड टेबल बैठक की।

संतोष की बात है कि इस सम्मेलन में 80 से अधिक देशों के रक्षा अताशे औऱ राजदूतों ने भाग लिया। सैनिक साज सामान बनाने  वाले विकसित देशों की हथियार कम्पनियां भारत को एक बडे रक्षा बाजार की तरह देखती हैं इसलिये उनकी भी रुचि है और अपने हित जुड़े हैं लेकिन  वे चाहती हैं कि उन्हें भारत में निवेश का समुचित माहौल मिले।  भारत में विदेशी कम्पनियों को निवेश के दौरान कई नीतिगत  और  जमीनी दिक्कतो का सामना करना पड़ता है। कई विदेशी कम्पनियों के भारत में निवेश  के अनुभव कड़वे रहे हैं इसलिये भारत सरकार को इन्हें दूर करना होगा।  उन्हें भरोसा दिलाना होगा कि उनकी कम्पनियों में काम करने वाले प्रबंधकों को सुरक्षित रिहाइश का  माहौल मिलेगा।

हालांकि भारत में नौकरशाही के अडंगों और चिकचिक करने वाले  रवैये के साथ  रहने की ढेर सारी दिक्कतों के बावजूद विदेशी कम्पनियां भारत में निवेश कर रही हैं लेकिन यदि उन दिक्कतों को दूर कर दिया जाए तो भारत निवेश के लिये दुनिया का सबसे अनुकूल देश माना जाएगा। वास्तव में अगले एक दशक के दौरान भारतीय सेनाओं के लिये 100 से 150 अरब डॉलर के सैनिक साज सामान खरीदे जाने हैं इसलिये यह सही वक्त है कि इतनी लागत के सैनिक साज सामान  देश में ही उत्पादित  करने के लिये  उन विदेशी कम्पनियों को भारत में ही  मौका दिया जाए। वे भारतीय सेनाओं के लिये तो उत्पादित करें ही उन्हें तीसरे देशों को भारत में बने सैनिक साज सामान के निर्यात के  लिये प्रोत्साहित किया जाए।

आगामी फरवरी माह में लखनऊ में आयोजित हो रही रक्षा प्रदर्शनी डेफ एक्सपो- 2020 के बहाने भारत को  रक्षा साज सामान बनाने वाले अग्रणी देश के तौर पर पेश करने की रणनीति तैयार करनी होगी।  विदेशी निर्माताओं को जब भरोसा होगा कि भारत में भारतीय कम्पनियों की साझेदारी से  जब संयुक्त उद्मम स्थापित होंगे औऱ उनके उत्पाद भारतीय सेनाएं इस्तेमाल में लाएंगी तो वे भारत को अपना उत्पादन आधार बनाने को तैयार होंगी।

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