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समर नीति: श्रीलंका पर अच्छी पहल

राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे
फोटो सौजन्य- गूगल

चीन से नजदीकी रखने वाले  श्रीलंका के नये राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे के सत्ता सम्भालने के पहले ही विदेश मंत्री एस जयशंकर का कोलम्बो जाना और गोतबाया राजपक्षे से मुलाकात करना भारत की ओर से श्रीलंका के साथ रिश्ते पटरी पर से नहीं उतरने देने की एक अच्छी राजनयिक पहल थी जिसका भारतीय सामरिक हलकों में स्वागत किया गया है। गत रविवार को जब यह साफ हो गया कि गोतबाया राजपक्षे श्रीलंका  के राष्ट्रपति बनने जा रहे हैं भारतीय विदेश मंत्रालय ने तुरंत राजपक्षे के कार्यालय  से सम्पर्क किया औऱ  विदेश मंत्री जयशंकर को कोलम्बो भेजा जिन्होंने  राजपक्षे से मुलाकात तय की।





इस बीच प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गोतबाया राजपक्षे को फोन कर बधाई दी और उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया जिसे उन्होंने तुरंत स्वीकार कर लिया। चीन से विशेष रिश्ते विकसित करने औऱ अपना  हमबनटोटा बंदरगाह चीन को सौंप देने का सौदा करने वाले गोतबाया राजपक्षे को लेकर  भारत में शंका जाहिर की जा रही थी जिसे भांपते हुए गोतबाया राजपक्षे ने सबसे पहले भारत दौरा करने का  फैसला लिया। गोतबाया राजपक्षे पर भारत में आऱोप लगाया जाता रहा है कि जब वह साल 2009 से साल 2015 के दौरान अपने बड़े भाई और राष्ट्रपति महीन्दा राजपक्षे के  शासन के दौरान देश के रक्षा सचिव थे और वहां के सुरक्षा बलों के प्रभारी थे तब उन्होंने चीन के साथ रिश्ते इतने गहरे कर लिये कि भारत के सामरिक हलकों में चिंता जाहिर की जाने लगी। गोतबाया भारत की चिंताओं को लेकर सचेत हैं और अब जब कि वह खुद राष्ट्रपति के पद पर बैठ चुके हैं वे भारत के पड़ोसी द्वीपीय देश होने के नाते   इतना जरूर ध्यान रखेंगे कि  भारत के लिये सामरिक दिक्कतें नहीं पैदा करें।

राजपक्षे को पता है कि भारत में उन्हें लेकर क्या शंकाएं हैं। इसलिये वह  भारत से अपने रिश्ते संतुलित करने के लिये कह चुके हैं कि भारत श्रीलंका का रिश्तेदार है तो चीन व्यापारिक साझेदार।  जब वह विपक्ष में थे तब भी उन्हें जब भारत सरकार ने आमंत्रित किया तो वे नई दिल्ली आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिले। साफ है कि भारत सरकार ने श्रीलंकाई नेता के साथ पहले से ही  मधुर रिश्ते विकसित करने की कोशिश की है जो अब उनके राष्ट्रपति बनने के बाद फल देने की उम्मीदें पैदा करता है। भारत श्रीलंका से यही उम्मीद करता है कि वह चीन के साथ दोस्ती भारत के सामरिक हितों की कीमत पर नहीं विकसित करे। श्रीलंका ने जब चीन को अपना  हमबनटोटा बंदरगाह सौंप दिया और वहां चीन की परमाणु और डीजल पनडुब्बियां आने लगीं तो भारत के कान खड़े हुए। भारत के इतना नजदीक जब चीन के नौसैनिक पोत ठहरने की सुविधा हासिल कर लेंगे तो भारत के माथे पर चिंता की लकीरे खिंचनी स्वाभाविक है।

इसलिये जरूरी था कि भारत श्रीलंका के नेताओं को आगाह करे कि वह चीन के साथ इस तरह के रिश्ते नहीं विकसित कर सकता जिससे भारत के सामरिक हितों पर चोट पहुंचे। यह सब को पता है कि चीन भारत के इर्द गिर्द मोतियों की माला पिरोने की कोशिश कर रहा है और इसमें श्रीलंका एक बेशकीमती मोती साबित होगा। चीन इस तरह भारत के पड़ोसी देशों के साथ अपने सैनिक  और आर्थिक रिश्ते विकसित कर पिछले कई सालों से  भारत की घेराबंदी की रणनीति लागू करना चाह रहा है जिसे लेकर भारत के सामरिक हलकों में गहरी चिंताएं रही हैं।  इन्हीं चिंताओं को दूर करने के लिये भारत अपने अन्य पडोसी देशों के साथ भी  रिश्ते बेहतर करने की विशेष पहल कर रहा है। उम्मीद की जा रही है कि श्रीलंका के नये राष्ट्रपति गोतबाया राजपक्षे 29 नवम्बर को जब भारत दौरे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलेंगे तो चीन के मुकाबले भारत से नजदीकी बढ़ाने की जरुरत समझेगे।

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