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समर नीति:  वायुसेना के लिये लड़ाकू विमान

सुखोई- 30

भारतीय वायुसेना के लडाकू स्क्वाड्रनों की संख्या 31 पर टिके रहने को लेकर भारतीय सामरिक हलकों में चिंता बढ़ती जा रही है। भारतीय वायुसेना ने अर्सा पहले यह तय किया था कि उसके पास कम से कम 42 स्क्वाड्रन और आदर्श तौर पर 45 स्क्वाड्रन (एक स्क्वाड्रन में 18 विमान) होने चाहिये। लेकिन पिछले दो दशकों के दौरान भारतीय वायुसेना में सुखोई-30 एमकेआई (Su-30 MKI) ल़ड़ाकू विमानों के अलावा कोई दूसरा विमान शामिल नहीं किया गया। पिछले दशक के शुरू में ही रक्षा मंत्रालय ने वायुसेना की इस योजना पर मुहर लगा दी थी कि Su-30 MKI के अलावा 126 लड़ाकू विमानों का अतिरिक्त सौदा किया जाए। पांच साल की कागजी और परीक्षण की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद 2012 के फरवरी माह में वायुसेना ने दुनिया के छह चुनिंदा विमानों में से राफेल को पहली पसंद बता कर रक्षा मंत्रालय से सौदा पूरा करने की सिफारिश की थी लेकिन पिछली सरकार ने अपने कार्यकाल में इस सिफारिश पर अमल नहीं किया। मौजूदा सरकार ने भी इसे लागू नहीं किया और 126 के बदले केवल 36 राफेल विमान फ्रांस से हासिल करने का सौदा किया।





इस बीच वायुसेना के पुराने लड़ाकू विमानों का बेड़ा रिटायर होता रहा और स्क्वाड्रनों की संख्या बढ़ने के बजाय घटती रही। अब जबकि उत्तरी और पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध का खतरा मुंह बाए खड़ा है भारतीय रक्षा महकमों में अफरातफरी मची है लेकिन कोई फैसला नहीं हो रहा है। चर्चा है कि जल्द ही 120 लड़ाकू विमानों का टेंडर जारी हो सकता है जिसमें एक या दो इंजन वाले विमान भाग ले सकते हैं। योजना है कि ये विमान मेक इन इंडिया के तहत देश में ही बनाए जाएं। लेकिन सब को पता है कि टेंडर जारी होने और वास्तविक तौर पर लड़ाकू विमान जैसे किसी हथियार को शामिल करने में चार-पांच साल लग जाते हैं। इस बीच वायुसेना को देश में ही बने तेजस लाइट कम्बैट एयरक्राफ्ट मिलेंगे लेकिन ये केवल खानापूर्ति के लिये ही होंगे। वायुसेना को इन पर पूरा भरोसा नहीं है। वे दुनिया की अत्याधुनिक लड़ाकू क्षमताओं वाले विमान चाहते हैं ताकि चीन और पाकिस्तान की ओर से एक साथ हुए हमले को न केवल झेल सकें बल्कि उनके इलाके में जाकर उनकी कमर भी मरोड़ सकें।

भविष्य के किसी भी युद्ध में वायुसेना की अहम भूमिका होगी और इसलिये जरूरी है कि भारतीय वायुसेना को हमेशा चुस्त-दुरुस्त हालत में रखा जाए। लेकिन भारतीय वायुसेना की हालत आज अत्यधिक चिंताजनक हालत में है। जहां भारतीय वायुसेना के पास करीब छह सौ ल़ड़ाकू विमान ही बचे हैं वहीं चीन की वायुसेना के पास तीन हजार से अधिक लड़ाकू विमान हैं। हम कल्पना कर सकते हैं कि चीन से लड़ाई छिड़ी तो हमारी क्या हालत होगी।

दुश्मन को जब पता होता है कि उसका प्रतिद्वंद्वी अत्याधुनिक संहारक हथियारों से लैस है तब वह हमला करने की जुर्रत नहीं करता लेकिन जब वह देखता है कि प्रतिद्वंद्वी देश के पास आधुनिक हथियारों की भारी कमी है तब वह तनाव भड़काने को प्रेरित होता है। वह ब्लैकमेल करने की भी कोशिश करता है जैसा कि हमने पिछले साल चीन भूटान सीमा पर डोकलाम इलाके में देखा। डोकलाम हमारे लिये एक बड़ी चेतावनी था। हमें इससे सबक लेते हुए जल्द से जल्द अपनी सेनाओं की मारक क्षमता में भारी इजाफा करने के कार्यक्रम पर अमल करना होगा।

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