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समरनीतिः सम्राट शी चिन फिंग

चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग

चाहे वह स्टालिन हों या मुसोलिनी या हिटलर या माओ त्से तुंग। इनकी निजी महत्वाकांक्षाओं ने  इतिहास की धारा मोड़ दी। इसी तरह चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी चिन फिंग न केवल चीन का नया इतिहास लिखना चाहते हैं बल्कि पूरी दुनिया के इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ना चाहते हैं। शी चिन फिंग को लग रहा है कि 2013 में जो चीनी सपना (चाइनीज ड्रीम) उन्होंने देखा था उसे हासिल करने के लिये उनका आने वाले दशकों तक सत्ता में बना रहना जरुरी है। शायद इसीलिये उनके प्रभावशाली पार्टी गिरोह ने 1982 में नये लिखे गए चीन के संविधान में संशोधन करवाने का प्रस्ताव किया है कि राष्ट्रपति का कार्यकाल केवल पांच साल की दो अविध के लिये ही सीमित नहीं रहेगा। साफ है कि राष्ट्रपति शी चिन फिंग माओ त्से तुंग की तरह आजीवन राष्ट्रपति बने रहना चाहते हैं।





शी चिन फिंग ने चीन के लिये 2050 तक का एक दीर्घकालीन रोडमैप तैयार किया है जिसके जरिये वह वैश्विक और क्षेत्रीय मामलों में चीन को केन्द्रीय भूमिका निभाते हुए देखना चाहते हैं। वह यह सपना अपने वन बेल्ट वन रोड (OBOR) के जरिये पूरा होते देखना चाहते हैं ताकि पूरी पृथ्वी पर हर सड़क चीन चीन से जुडे औऱ जिसके जरिये चीन अपना आर्थिक व राजनीतिक प्रभाव का विस्तार करे। इसी रणनीति के तहत चीन ने दक्षिण चीन सागर के इलाके पर अपना आधिपत्य तो जताया ही है हिंद महासागर में भी अपनी दादागिरी स्थापित करना चाहता है।

शी चिन फिंग की चली तो दक्षिण चीन सागर पर चीन का प्रभुत्व होगा और हिंद महासागर में मालदीव, श्रीलंका, सेशल्स,  मारीशस औऱ बांग्लादेश चीन की गोद में बैठा होगा और उसके जमीनी पड़ोसी नेपाल और भूटान पर भी वह इसी तरह अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है। शी चिन फिंग भारत को चारों ओर से घेर कर इतना दबाव बनाना चाहते हैं कि भारत चीन की दादागिरी को स्वीकार करने लगे और चीन के साथ सीमा समझौता करने को बाध्य हो जाए।

2012 में चीन के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही चीन ने न केवल एशिया प्रशांत इलाके में अपने प्रादेशिक, आर्थिक औऱ राजनीतिक प्रभाव के विस्तार की कोशिश की है बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने का सपना देख रहा है। शी चिन फिंग की इस महत्वाकांक्षा की वजह से आने वाले सालों में एशिया प्रशांत इलाके में शीत युद्ध का मौहाल उग्र होगा। इससे निबटने के लिये ही भारत, अमरिका, जापान और आस्ट्रेलिया ने सामूहिक एकजुटता दिखाई है। चीन के आक्रामक रूख से भारत का चिंतित होना स्वाभाविक है और आने वाले वर्षों में भारत के लिये नई चुनौतियां पेश होंगी।

लेकिन शी चिन फिंग की इस महत्वाकांक्षा को घरेलू चुनौती मिलनी शुरु हो गई है। चीनी सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति शी को लेकर तंज कसे जा रहे हैं जिसे चीनी अधिकारी सख्ती से मिटा रहे हैं। साफ है कि आज का चीन वैसा नहीं है जैसा कि माओ के जमाने में था जब सांस्कृतिक क्रांति के जरिये माओ   लाखों लोगों को मरवा कर सत्ता पर जमे रहे। आज का चीनी मध्य वर्ग बाकी दुनिया से जुड़ा हुआ है और वह आर्थिक आजादी के साथ राजनीतिक आजादी भी चाहने लगा है। चीनी लोग नहीं चाहेंगे कि चीन में फिर से सम्राट युग वापस लौट आए। राष्ट्रपति शी ने यदि चीनी आम आदमी की राजनीतिक आकांक्षाओं को कुचला तो हो सकता है कि उनका चीनी सपना ही चकनाचूर हो जाए।

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