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समर नीति: विदेशी नीति की घरेलू चुनौतियां

पीएम मोदी और शी जिनपिंग
फाइल फोटो

नई सरकार को अब घरेलू के अलावा विदेशी मोर्चे पर भी भारी चुनौती से रुबरु होना पड़ेगा। भारत राष्ट्रराज्य को सफल बनाने के लिये जितना घरेलू मोर्चे को सम्भालने की जरूरत है उतना ही विदेशी मोर्चा भी देखना होगा। विदेशी मोर्चे पर किसी देश को इज्जत तभी मिलती है जब उसकी घरेलू ताकत ऐसी हो जहां से विदेशी ताकतों को आर्थिक फायदा मिल सके। यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना धौंस जमाने के लिये अपनी आर्थिक ताकत का झंडा गाड़ना होगा। इसके अलावा यह अहसास भी देना होगा कि हमारा देश और इसका समाज शांति से रहता है जहां अफ्रीका या लातिन अमेरिकी देशों या कुछ खाड़ी के देशों की तरह सड़कों पर मारकाट नहीं होती रहती हो। आज की आधुनिक दुनिया चूंकि कई मायनों में सीमाविहीन हो चुकी है इसलिये अंतरराष्ट्रीय मसलों में भारत को बाकी दुनिया से अलग नहीं सोचना होगा। चाहे वह पर्यावरण का मसला हो या व्यापारिक आदान-प्रदान का। सभी देशों को दूसरे देश के साथ मिल कर चलना होता है। यह तभी मुमकिन हो  सकता है जब आपका देश दूसरे के साथ चलने के काबिल हो। पाकिस्तान की ही मिसाल लीजिये। आतंकवाद का गढ़ बन चुका पाकिस्तान विदेशी निवेशकों के लिये अछूत बना रहता है। खुद पाकिस्तानी लोग भी अपने देश में निवेश नहीं करते क्योंकि उनके समाज में हमेशा मारकाट मची रहती है।





भारत में भी आतंकवाद अपना जहर फैला रहा है। चाहे वह पाकिस्तान समर्थित इस्लामी आतंकवाद हो  उग्र वामपंथी  आतंकवाद हो या फिर उत्तर पूर्वी राज्यों का अलगाववादी आतंकवाद हो। भारत के एक बड़े हिस्से में घरेलू हिंसा का माहौल विदेशी निवेशकों के लिये ठीक नहीं है। विदेशी निवेशक उसी देश को पसंद करते हैं जहां  सामाजिक शांति व समरसता हो औऱ जहां राह चलते लोगों को लूटा नहीं जाता हो। चीन ने अपने देश को जब खोला तो कम्युनिस्ट देश होने के बावजूद वहां पूंजीवादी देशों औऱ चीन के दुश्मन माने जाने वाले देशों के निवेशकों ने भी  धड़ल्ले से निवेश किया औऱ वहां के उभरते बाजार से फायदा उठाने के लिये अपने निर्माण कारखाने लगाए। विदेशी निवेशकों को चीन इसलिये पसंद आया कि वहां जनजीवन काफी सुचारू तरीके से चलता है औऱ आये दिन जुलूस प्रदर्शन आदि नहीं होते रहते  है। इस वजह से यातायात औऱ आवाजाही पर प्रतिकूल असर पड़ता है जिससे आर्थिक गतिविघियों को भारी नुकसान होता  है। चीन की सड़कों पर अपराध नहीं के बराबर होते हैं। महिलाओं का जीवन वहां काफी सुरक्षित माना जाता है। राह चलते वहां आपका बैग कोई नहीं छीनता। चीन में यह सब नहीं होता इसलिये  विदेशी निवेशकों के लिये आकर्षक स्थल बन गया।

चीन इस तरह  11 ट्रिलियन डॉलर वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया और चीन की यह आर्थिक ताकत राजनयिक और सामरिक मोर्चे पर भी झलकने लगी। लोग चीन से बेहतर सम्बन्ध बनाने के लिये चीन की नाराजगी मोल लेने से बचने लगे। ऑस्ट्रेलिया इसकी सबसे बड़ी मिसाल  है। ऑस्ट्रेलिया का  निर्यात बड़े पैमाने पर चीन के बाजार पर निर्भर है इसलिये कुछ साल पहले तक ऑस्ट्रेलिया को सोचना पड़ता था कि उसकी विदेश नीतियों की वजह से चीन के साथ रिश्ते खराब नहीं हो जाएं। इसी तरह भारत में भी अगले पांच साल के लिये जो सरकार आई है उसे यह देखना होगा कि अपने देश के भीतर विदेशी और घरेलू निवेश का माहौल  इस तरह बनाए कि  बाकी दुनिय़ा भारत के बाजार में कदम रखने को लालायित हो। तभी वे संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतररराष्ट्रीय मंचों पर भारत की चिरौरी करते नजर आएंगे। कुछ हद तक  मसदू अजहर के मामले में हमने देखा है कि किस तरह दुनिया की तीन बड़ी आर्थिक ताकतें भारत के पक्ष में खड़ी नजर आईं। वे चीन के बाजार से ऊब चुके हैं और भारत को भविष्य का अपना बाजार मानते हैं। यह तभी मुमकिन हो सकता है जब देश की नई सरकार घरेलू स्तर पर सामाजिक शांति व समरसता का माहौल पैदा कर देशी- विदेशी निवेशकों के लिये अनुकूल माहौल पैदा करे।

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