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समर नीति: 2019 की कूटनीतिक चुनौतियां

प्रधानमंत्री मोदी

साल 2019 भारतीय कूटनीति के लिये नई चुनौतियां लेकर आएगा जिसकी बुनियाद साल 2018 में पड़ चुकी है। अगले साल भारत के सामने एक बड़़ी चुनौती होगी कि अमेरिका, रूस औऱ चीन के बीच अपने रिश्तों को किस तरह संतुलन प्रदान करे। तीनों बड़ी ताकतों की कोशिश है कि भारत को अपने पाले में रखें तो उनका पलड़ा भारी हो जाएगा। 2018 के दौरान जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग से अप्रैल माह में चीन के वूहान शहर में अनौपचारिक शिखर बैठक कर रिश्तों की नई बुनियाद रखी वहीं रूस के शोची शहर में राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन के साथ भी अनौपचारिक शिखर बैठक की। केवल अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ स्वतंत्र तौर पर प्रधानमंत्री मोदी की शिखर बैठक नहीं हो पाई। लेकिन इसकी कमी काफी हद तक अमेरिका ने भारत के साथ टू प्लस टू डायलॉग कर पूरी कर दी। इस डायलाग के तहत दोनों देशों के रक्षा व विदेश मंत्रियों ने साझा तौर पर बातचीत की और साझा मसलों को निबटाने की कोशिश की। लेकिन इसके बावजूद अमेरिका भारत को सार्वजनिक तौर पर यह भरोसा नहीं दे पाया है कि रूस पर प्रतिबंध लगाने वाला उसका कैटसा कानून भारत पर लागू होगा या नहीं।





कैटसा कानून के तहत राष्ट्रपति ट्रम्प सहित अमेरिकी नेताओं ने भारत को धमकी दी कि रूस से सैनिक साज सामान खरीदा तो भारत पर प्रतिबंध लगा दिये जाएंगे। हालांकि इस दौरान भारत ने रूस से सवा पांच अरब डॉलर का एस- 400 एंटी मिसाइल प्रणाली का सौदा सम्पन्न कर लिया लेकिन इसकी पहली किस्त का भुगतान इसलिये नहीं किया जा सका है कि अमेरिकी डालर में इसे किस बैंक में जमा किया जाए। रूस को अमेरिकी डॉलर में भुगतान करने पर पाबंदी लगा दी गई है। इसलिये भारत के सामने संकट है कि अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करते रहने के लिये रूस से खरीदे गए सैनिक साज सामान का भुगतान किस विदेशी मुद्रा में करे।

इन्हीं सब मजबूरियों के बीच भारत सोच रहा है कि चार देशों के गुट क्वाट्रीलेटरल ग्रुप का सदस्य बनने के बाद भी यदि एक शक्तिशाली देश अमेरिका भारत को धमकियां देता रहे और प्रतिबंध की चेतावनी देता रहे तो भारत यह कैसे तय कर सकेगा कि चार देशों के गुट में होने के बावजूद उसे तंग करने की शीतयुद्ध की मानसिकता अमेरिका और उसके साथी देशों में बनी रहने से भारत के राष्ट्रीय हितों को लाभ होगा या नहीं।

इसलिये साल 2019 में भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के मद्देनजर शक्तिशाली देशों से दोस्ती की दिशा तय करनी होगी। जहां एक ओर भारत की सीमाओं पर चीन की ‘गिद्ध नजर’ है और वह भारत पर सैनिक दबाव बनाए हुए है वहीं चीन ने हिंद महासागर के द्वीप देशों मालदीव, सेशल्स और श्रीलंका में हस्तक्षेप जारी रखा हुआ है। भारतीय कूटनीति के सामने अगले साल एक बड़ी चुनौती होगी कि अपने पड़ोसी द्वीपीय देशों के साथ किस तरह का रिश्ता विकसित करे। क्या भारत यह मौन हो कर देखता रहे कि उसके पड़ोस के इलाके में चीन का वर्चस्व बढ़ता रहेगा?

साफ है कि पड़ोसी जमीनी और सागरीय द्वीप देशों पर भारत को अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिये एक सुनियोजित रणनीति से काम करना होगा। हिंद महासागर के नजदीकी समुद्री इलाकों और प्रशांत सागर के दूसरे समुद्री इलाके में भारत को अपने समुद्री औऱ आर्थिक हितों की रक्ष के लिये अपनी समुद्री ताकत को भी हमेशा बढ़ाते रहना होगा।

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