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समर नीति: चीन ने मसूद को दिया चीनी रक्षा कवच

शी जिनपिंग और मसूद अजहर

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जैश ए मोहम्मद का सरगना मसूद अजहर के खिलाफ प्रस्ताव को चीन ने चौथी बार वीटो लगाकर फिर दिखाया है कि उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भावनाओं की कोई चिंता नहीं। वह केवल अपने राष्ट्रीय हितों की बात सोचता है और इसकी रक्षा के लिये कोई भी अनैतिक कदम उठा सकता है। चीन ने सुरक्षा परिषद में प्रतिबंध समिति 1267 के तहत पेश प्रस्ताव को तकनीकी आधार पर वीटो लगाकर यह कहा है कि मसूद अजहर को लेकर कोई आम राय नहीं बनी थी। लेकिन यह कहा जाए कि आम राय तो उसकी वजह से नहीं बनी तो गलत नहीं होगा। आम राय की बात कहें तो सुरक्षा परिषद के 15 में से 14 सदस्यों ने मसूद अजहर के खिलाफ वीटो लगाने वाले प्रस्ताव को पुरजोर समर्थन दिया। केवल चीन ही इसके खिलाफ खड़ा दिखा।





साफ है कि चीन ने आतंकवाद को चीनी रक्षा कवच प्रदान किया है जिसे भेदना पूरी दुनिया के लिये मुश्किल होगा। चीन का यह कदम आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला साबित होगा। पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन अब यह मान कर चलेंगे कि उन्हें चीन जैसी बड़ी ताकत का समर्थन हासिल है इसलिये अब दुनिया की कोई भी ताकत उनका कुछ नहीं बिग़ाड़ सकती। चीन के इस रवैये से न केवल मसूद अजहर और इसके साथी उत्साहित होंगे बल्कि पाकिस्तान स्थित बाकी आतंकवादी तंजीमों को भी भारत विरोधी आतंकवादी हरकतें करने के लिये प्रोत्साहन मिलेगा। उन्हें लगेगा कि न केवल पाकिस्तान सरकार उन्हें आधिकारिक मदद दे रही है बल्कि उनके खिलाफ जब कोई अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई का प्रस्ताव आता है तो चीन उसे निरस्त करने के लिये हमेशा तैयार बैठा है।

सच पूछा जाए तो चीन ने मसूद अजहर को बचाकर उसे चीनी सुरक्षा कवच इसलिये प्रदान किया है कि जैश ए मोहम्मद के गुर्गे पाकिस्तान में काम कर रहे हजारों चीनी कामगारों के लिये सुरत्रा खतरा नहीं बनें। गौरतलब है कि चीन पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से होकर बलुचिस्तान के ग्वादार तक 60 अरब डालर से अधिक के निवेश वाला चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) बना रहा है जिसे पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों से खतरा महसूस होता है। ये आतंकवादी चीनी कामगारों को अपह़ृत कर फिरौती वसूलते हैं। इनसे बचाव के लिये पाकिस्तान के सुरक्षा बल तैनात रहते हैं लेकिन उनके बावजूद वे चीनियों को रक्षा की गारंटी नहीं दे पाते। वास्तव में अगले कुछ सालों के भीतर जब सीपीईसी परियोजना लागू हो जाएगी और ग्वादार बंदरगाह और हवाई अड्डा के साथ वहां चीनी उद्योगों और व्यापार घंधों का जाल बिछ जाएगा तो वहां चीन के पांच लाख से अधिक कामगार रहने लगेंगे। चीन को लगता है कि इनकी सुरक्षा के लिये जरूरी है कि इस इलाके में सक्रिय आतंकवादी संगठनों से सीधा तालमेल रखा जाना चाहिये।

सीपीईसी प्रोजेक्ट को लागू करने में चीन के दीर्घकालीन सामरिक हित हैं। इस प्रोजेक्ट के जरिये चीन अरब सागर तक सीधा जमीनी सम्पर्क बनाना चाहता है ताकि उसे ऊर्जा सप्लाई का एक और वैकल्पिक मार्ग हासिल हो सके। चीन मलक्का जलडमरूमध्य समुद्री इलाके के अलावा ग्वादार बंदरगाह से होकर जमीनी व्यापार मार्ग इसलिये खड़ा करना चाह रहा है कि भविष्य में मलक्का का समुद्री व्यापारिक मार्ग कोई देश बंद नहीं कर सके। चीन एक महाशक्ति के तौर पर उभर चुका है औऱ वह अपने सामरिक हितों की सुरक्षा के लिये अगले कई दशकों तक की योजनाएं लागू कर रहा है। चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इसी समर नीति का हिस्सा है जिसे वह पाकिस्तान के आतंकवादी संगठनों से किसी भी कीमत पर बचा कर रखना चाहता है।

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