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समर नीति: राष्ट्रपति शी के गर्म तेवर

राष्ट्रपति शी जिनपिंग

 





चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने अपने बाकी बचे जीवन का राष्ट्रपतीय कार्यकाल युद्ध की धमकी से शुरू किया है। उनका यह आक्रामक तेवर आने वाले वर्षों में भारत के लिये चिंताजनक तो है ही बाकी दुनिया के लिये भी शीतयुद्ध के नये दौर की शुरुआत की चेतावनी दे रहा है। इसके मद्देनजर भारत को भी अपनी राष्ट्रीय रक्षा तैयारी में तेजी लानी होगी और अपने सामरिक समीकरणों में भी जरूरी बदलाव करने होंगे।

उम्मीद की जा रही थी कि पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद आगे का कार्यकाल हासिल करने के लिये उन्होंने जो अतिराष्ट्रवादी तेवर अपनाया था उसे वह छोड़ देंगे लेकिन राष्ट्रपति शी ने अपनी सैनिक ताकत की जो धौंस दिखाई है उससे अमेरिका से लेकर भारत तक सिहरन पैदा हुई है।

उन्होंने धमकी भरे लहजे में अपने सभी दुश्मनों को चेतावनी दी है कि चीन अपने भूभाग की रक्षा के लिये खूनी लड़ाई लड़ने को तैयार है। उन्होंने साफ किया कि वह अपनी एक इंच भी जमीन किसी कीमत पर भी नहीं छोड़ेंगे। हालांकि उन्होंने भारत या किसी दूसरे देश का नाम नहीं लिया है लेकिन उनका इशाऱा साफ है। पूर्व और दक्षिण चीन सागर के तटीय देशों के साथ समुद्री इलाके पर सम्प्रभुता को लेकर विवाद और तनाव तो चल ही रहा है भारत के साथ भी चार हजार किलोमीटर लम्बी अनिर्धारित जमीनी सीमा पर भी तनाव का माहौल चीन ने बनाया हुआ है।

चीन में राष्ट्रपति का कार्यकाल पांच साल की दो अवधि के लिये सीमित कर दिया गया था लेकिन शी चिन फिंग ने चीन के संविधान में ऐसे संशोधन करवाए हैं कि वह अब आजीवन राष्ट्रपति बने रहेंगे। भारत ने उम्मीद की थी कि राष्ट्रपति शी के नये आजीवन कार्यकाल के दौरान दोस्ती की बातें करेंगे और आपसी तनाव घटाने की कोशिश करेंगे। इसी इरादे से इस महीने विदेश सचिव विजय गोखले को चीन भेजा गया था और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण को अगले महीने के अंतिम सप्ताह में चीन भेजा जा रहा है। इसके बाद जून के अंत में शांघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक के लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चीन जाने का कार्यक्रम बनाया जा रहा है। इसके साथ ही भारत ने तिब्बती निष्कासित धार्मिक नेता दलाई लामा के साथ उच्चस्तर का सरकारी सम्पर्क कम करने का निर्देश जारी किया है।

इन सबके जरिये भारत चीन को यह संदेश देना चाहता है कि वह चीन के साथ रिश्तों को सौहार्दपूर्ण दिशा में आगे बढ़ाना चाहता है। लेकिन चीन का पलट संदेश साफ है कि वह अपनी ही शर्तों पर भारत और अन्य “दुश्मनों” के साथ रिश्ते बेहतर करेगा। वह दुश्मन के प्रादेशिक इलाके पर कब्जा जमा कर बैठा रहेगा और उसे अपना बताकर अपने राष्ट्रीय हितों और सम्प्रभुता की किसी भी कीमत पर रक्षा करने की चेतावनी दुनिया को देगा। जब भारत और चीन के बीच सीधे टकराव की नौबत आएगी तो भारत को इस भ्रम में नहीं रहना होगा कि उसका कोई साथी देश (चर्तुपक्षीय गुटः अमेरिका, जापान , आस्ट्रेलिया और भारत) भारत की प्रत्यक्ष मदद को सामने आएगा। सामरिक गठ़जो़ड़ों के बहाने भारत अपनी़ सामूहिक ताकत तो दिखा सकता है लेकिन चीन से मुकाबला करने के लिये भारत को न केवल अपनी सैनिक ताकत में आपात स्तर पर भारी इजाफा करने की तैयारी शुरू करनी होगी अपनी समग्र आर्थिक ताकत को भी इतना मजबूत बनाना होगा कि चीन सहित दूसरे देश भारत को नजरअंदाज नहीं कर सकें।

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