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समर नीति: नए रक्षा मंत्री के समक्ष चुनौतियां

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह

नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी की सरकार के दूसरे कार्यकाल में राजनाथ सिंह रक्षा मंत्री का दायित्व सम्भालेंगे। राजनाथ सिंह का केन्द्र और राज्य सरकार में मंत्री के तौर पर दशकों पुराना प्रशासनिक अनुभव रहा है इसलिये रक्षा हलकों में उनसे यही उम्मीद की जा रही है कि वह देश की रक्षा की बागडोर पूरी कुशलता से सम्भालेंगे। नये रक्षा मंत्री के समक्ष कई चुनौतियां हैं जिनसे उन्हें निबटना है। सबसे बड़ा मसला तीनों सेनाओं के तेजी से आधुनिकीकरण का है औऱ इसके बाद तीनों सेनाओं के सगठनात्मक ढांचे में जरूरी सुधार करने का है ताकि भारतीय सेनाएं अपना दायित्व बखूबी निभा सकें। हम सभी जानते हैं कि किसी भी मशीन के सक्षमतापूर्वक संचालन के लिये एक कुशल मानव की जरूरत होती है जिसके लिये उसे जरूरी कौशल से तो लैस करना ही होता है उसका मनोबल भी ऊंचा रखना होता है।





मनोबल ऊंचा रखने के लिये जरुरी है कि सैनिक की निजी, पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारी को निभाने में सरकार हमेशा उसके साथ खड़ा दिखे। सीमा पर अपनी कठिन जिम्मेदारी निभाने के लिये जरूरी है कि वह मानसिक तौर पर परेशान नहीं रहे। उसका मनोबल हमेशा ऐसा रहे कि वह हमेशा देश के लिये हर कुर्बानी करने को तैयार रहे। मानव संसाधन का कुशल प्रशासन करने से ही सैनिक के भीतर आत्मबल को मजबूत किया जा सकता है।

लेकिन आत्मबल के साथ जरूरी है कि उसके हाथ में एक सक्षम शस्त्र प्रणाली हो जिसपर उसे यह भरोसा हो कि उसकी बदौलत वह दुश्मन की सेना पर हावी हो सकता है। सेना का आधुनिकीकऱण दुश्मन की सैन्य ताकत को देखकर किया जाता है ताकि युद्द के दौरान उसे परास्त किया जा सके। भारतीय सेना पिछले कई दशकों की उपेक्षा का शिकार रही है। इससे सैन्य हलकों में निराशा की भावना पैदा होती है। भारत की तीनों सेनाएं जरुरी साज सामान की बाट जोह रही हैं। चाहे वह वायुसेना हो या थलसेना या नौसेना । भारत के रक्षा कर्णधारों को यह देखना होगा कि भारतीय सेनाओं के पास ऐसी शस्त्र प्रणालिया हों जो दुश्मन पर भारी पडे। इसके लिये जरुरी है कि पिछले दशकों के उपेक्षा भाव से सैनिकों को मुक्त किया जा सके।

मिसाल के तौर पर भारतीय वायुसेना के पास लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या कम से कम 42 होनी चाहिये लेकिन यह घटकर 31 पर आ गई है। दुश्मन पाकिस्तान के पास लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या 25 है औऱ चीन तो भारत से कई गुना बेहतर क्षमता रखता है। इसलिये नये रक्षा मंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि अपने पांच साल के भावी कार्यक्राल में देश की सेनाओं को एक ऐसा मजबूत आधार दे कर जाएं जिसे आने वाली पीढियां याद रखे। भारतीय सेनाओं के त्वरित आधुनिकीकरण के लिये नये रक्षा मंत्री को हथियारों की खरीद की प्रक्रियाओं को सरल बनाना होगा। इसके साथ यह भी देखना होगा कि हथियारों के सौदे भ्रष्टाचार के दलदल में नहीं फंस जाएं। भारतीय सेनाओं के आधुनिकीकरण की गति यदि धीमी चल रही है तो इसकी एक बड़ी वजह यही है कि हथियारों के सौदे भ्रष्ट्चार के दलदल से बाहर नहीं निकल पा रहे है और इस वजह से राजनेताओं और सेना के आला जनरलों को जो फजीहत होती है उससे डर कर वे कोई बडे फैसले लेने से भी हिचकने लगे हैं। नये रक्षा मंत्री को अपना पद भार सम्भालने के तुरंत बाद इन्हीं चुनौतियों से जूझने के लिये आला अधिकारियों से गहन चर्चा करनी होगी। उन्हें विपक्ष के नेताओं को भी भरोसा में लेना होगा ताकि बडे शस्त्र सौदे आरोपों के जंजाल में फंस कर सेनाओं की आधुनिकीकरण की गति को धीमी नहीं कर दें।

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