vishesh

समर नीति: जम्मू-कश्मीर में संघर्ष विराम-क्या पाक कामयाब होने देगा ?

सीमा पर भारतीय सेना

जम्मू-कश्मीर में संघर्ष विराम के केन्द्र सरकार द्वारा एकपक्षीय एलान के पहले दिन ही जम्मू-कश्मीर के विभिन्न हलकों में व्यापक स्वागत हुआ है। जम्मू-कश्मीर का शैक्षणिक और व्यापारिक समुदाय खासकर केन्द्र की इस पहल से काफी राहत की सांस ले रहा है। छात्र समुदाय को अच्छा लग रहा है कि अब उनके कालेज-स्कूल बंद नहीं हुआ करेंगे और व्यापारिक समुदाय को अपना धंधा चलाने के लिये सामान्य हालात चाहिये। पिछली बार सन 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने रमजान के पावन मौके पर संघर्ष विराम का एलान किया था तब वह सात महीने टिका था और इस वजह से राज्य में शांति का जो माहौल बनने लगा था उससे जम्मू-कश्मीर का जेहादी अलगाववादी तबका काफी विचलित हो उठा था। निहित स्वार्थों वाले इन गुटों के आका पाकिस्तान में बैठे हैं जो यह समझने लगे थे कि यदि जम्मू-कश्मीर में अमन चैन का माहौल बना रहा तो दुनिया को यह लगेगा कि राज्य में सब कुछ ठीक चल रहा है। इसलिये पाकिस्तान ने राज्य में अपने आतंकवादियों को फिर सक्रिय होने का निर्देश दिया लेकिन राज्य की जनता ने इस पाकिस्तानी फरमान को मंजूर नहीं किया। पिछले संघर्ष विराम के दौरान श्रीनगर हवाई अड्डे पर हुए भीषण हमले जैसी छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो राज्य में शांति बनी रही। केन्द्र में 2014 में एनडीए की अगुवाई वाली सरकार के दो वर्षों तक माहौल आमतौर पर शांत ही रहा लेकिन अचानक इसमें मोड़ तब आया जब पिछले साल आतंकवादी बुरहान वानी सुरक्षा बलों की गोलियों से मारा गया। तब से राज्य में घोर हिंसा का माहौल है और आतंकवादी तत्व आम लोगों को आतंकित कर उन्हें हिंसा के समर्थन में सड़कों पर उतरने को बाध्य कर रहे हैं। खून-खराबा बढ़ने के साथ जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने सर्वदलीय बैठक कर प्रधानमंत्री से अपील की कि एकतरफा संघर्ष विराम लागू करे।





केन्द्र सरकार पहले से ही आतंकवादी तत्वों के साथ बातचीत करने के लिये भारी दबाव में थी इसलिये उसने राज्य में संघर्ष विराम का ऐलान कर शांति बहाली का एक सुनहरा मौका प्रदान किया है। लेकिन पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ऐ-तैएबा और जैश-ए-मोहम्मद ने भारत के इस ऐलान को ठुकरा दिया है। साफ है कि जम्मू-कश्मीर का आम अवाम तो वहां शांति को मौका देना चाहता है लेकिन आतंकवादी संगठन ऐसा नहीं चाहते। आतंकवादी हिंसा के जरिये वे राज्य में खून-खराबा जारी रखने की साजिश पर चल रहे हैं ताकि विश्व समुदाय का ध्यान जम्मू-कश्मीर की ओऱ खिंच सके।

इन आतंकवादी संगठनों की डोर रावलपिंडी से बंधी है जिनके धन-बल की बदौलत वे राज्य को हमेशा अस्थिर रखना चाहते हैं। आतंकवादियों और सेना की लड़ाई के बीच आम जनता पिस रही है। और वे किसी भी हालत में अमन-चैन चाहते हैं। आतंकवादी गुट आम आदमी का भयादोहन कर उन्हें अपने साथ रहने को मजबूर कर रही हैं और इस दौरान सुरक्षा बलों से कोई गलती हो जाती है तो वे अपने लोगों को यह कह कर बरगलाते हैं कि भारतीय सेना कितनी आततायी हो चुकी है। राज्य की स्थिति निरंतर भयावह होती जा रही है जिसे काबू में पाने के लिये जरूरी होगा कि केन्द्र सरकार के नीति-निर्माता संघर्ष विराम के नतीजों की समीक्षा करे आगे की सुविचारित रणनीति तय करें जो साम दाम दंड भेद पर आधारित होनी चाहिये। कोशिश यह हो कि हर हालत में जम्मू-कश्मीर के आम अवाम को अपने साथ ला सकें।

 

Comments

Most Popular

To Top