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समर नीति: अरिहंत- भारत अब ब्लैकेमेल नहीं हो सकता

आईएनएस अरिहंत

पांच  नवम्बर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय नौसेना को स्वदेशी  मिसाइलों से लैस स्वदेशी परमाणु त्रिकोण क्षमता प्रदान करने का औपचारिक ऐलान कर भारत को सही मायनों  में एक परमाणु ताकत बनाने की हुंकार  भरी।  नौसेना को यह  परमाणु पनडुब्बी  सामरिक दुनिया में भारत का कद ऊंचा करेगी। भारतीय नौसेना  ने अब तक दो परमाणु पनडुब्बियों  का संचालन किया है जिन्हें रूस से  लीज पर हासिल किया गया था। पहली बार परमाणु पनडुब्बी चक्र  नब्बे के दशक के शुरू में तीन साल के लीज पर हासिल की गई थी और इसके बाद अकुला वर्ग की एक और परमाणु पनडुब्बी दस साल के लीज पर हासिल की गई। रूस ने ये पनडुब्बियां दे कर भारत पर काफी बड़ा एहसान किया  क्योंकि परमाणु अप्रसार संधियों के युग में किसी देश को अपने मित्र देश को परमाणु पनडुब्बी देना आसान नहीं था। लेकिन रूस ने भारत से अपनी दोस्ती को भरोसेमंद साबित करते हुए भारतीय नौसैनिकों को परमाणु  बिजली से चलने वाली पनडुब्बी चलाने का अनोखा अनुभव दिया। इसी की बदौलत आज भारतीय नौसेना अब स्वतंत्र तौर पर एक परमाणु पनडुब्बी के संचालन के लायक बन सकी है।





एक ऐसे दौर  में जब  भारतीय नौसेना की परमाणु पनडुब्बियों की संख्या  घट कर  14-15  के करीब चल रही थी  एक स्वदेशी परमाणु पनडुब्बी को सक्रिय करना  भारतीय रक्षा कर्णधारों को सुकून देगा। हालांकि  आने वाले सालों में कुछ नई डीजल पनडुब्बियां तो मिलने लगेंगी लेकिन कुछ पुरानी पनडु्ब्बियों  को रिटायर करने का भी सिलसिला शुरु करना होगा क्योंकि भारतीय नौसेना के पास जर्मन  एचडीडब्ल्यू पनडु्ब्बियां नब्बे के दशक में ही  मिल गई थीं। फिलहाल नौसेना के लिये भारत में ही फ्रांस के सहयोग से स्कार्पीन पनडुब्बियां बन रही हैं लेकिन इसके बाद जो छह नई डीजल पनडुब्बियां देश में ही विदेशी सहयोग से बनाने की योजना कब जमीन पर उतारी जाएगी कहा नहीं जा सकता। लेकिन इस बीच  अरिहंत परमाणु पनडुब्बी के बाद दूसरी परमाणु पनडुब्बी अरिहंत को लांच किया जा चुका है और उम्मीद है कि  दो साल बाद इसे भी भारतीय नौसेना को सौंप दिया जाएगा। इसके बाद तीसरी परमाणु पनडुब्बी अरिदमन को भी बनाया जा रहा है।

पिछली सदी के शुरु में ही यह तय किया गया था कि 2030  तक भारतीय नौसेना के पास 24 पनडुब्बियां होंगी। लेकिन जिस मंथर गति से पनडुब्बियों को हासिल करने का काम चल रहा है उसे देखते हुए शक होता है कि भारतीय नौसेना यह क्षमता हासिल कर पाएगी।

चूकि एक परमाणु पनडुब्बी तीन चार पनडुब्बिबों की एकजुट क्षमता के बराबर करी जा सकती है इसलिये अरिहंत परमाणु पनडुब्बी को नौसेना में सक्रिय तौर पर संचालित करने का ऐलान कर भारत ने अपने सामरिक मंसूबे पूरी दुनिया को बता दिये हैं। परमाणु पनडब्बी की बदौलत ही भारतीय सेना का वह परमाणु त्रिकोण पूरा बन सका है जो भारत की सेकं स्ट्राइक परमाणु अवधारणा को लागू कर सकेगी।  इस अवधारणा का मतलब है कि भारत किसी दूसरे देश पर कभी भी प्रथाम परमाणु आक्रमण नहीं करेगा लेकिन जब भारत पर पहला हमला हो जाएगा तो  भारत इसका जवाब उसी क्षण देने के लिये कटिबद्द है। इसकी परिकल्पना यह है कि यदि जमीन और आसमान के जरिये दुश्मन देश पर परमाणु हमला करने की भारत की क्षमता को निष्क्रिय किया जाता है तो कम से कम समुद्र के भीतर छिपी  अपनी परमाणु पनडुब्बी के जरिये दुश्मन हमलावर देश पर हमला करने में भारत  सक्षम रहेगा।

इस तरह जमीन पर परमाणु बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि, आसमान से सुखोई- 30  या मिराज- 2000  लड़ाकू विमानों के जरिये  भारत परमाणु हमला करने की क्षमता से लैस होने के बाद एक बड़ी खाई बची थी जिसे अऱिहंत के जरिये भारत ने भरने का सामरिक लक्ष्य हासिल कर लिया है। अब भारत अमेरिका, चीन , रूस,  फ्रांस और ब्रिटेन के बाद परमाणु त्रिकोण  की क्षमता हासिल करने वाले चुनिंदा देशों में शामिल होकर भारत से सामरिक प्रतिद्वंदिता रखने वाले देशों को एक संदेश दे चुका है कि भारत को परमाणु हमले की धमकी दे कर ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता।

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