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समर नीति: भारत की विदेश नीति के लिये चुनौती बना अमेरिका

ऱाष्ट्रपति ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल फोटो)

ईऱान को परमाणु शस्त्र कार्यक्रम जारी रखने से रोकने के लिये ईऱान और अमेरिका, यूरोप, चीन और रूस सहित छह पक्षों के बीच हुए 2015 के समझौते से गत मई में अमेरिका ने अलग होने की न केवल घोषणा की है बल्कि दुनिया के सभी देशों को चेतावनी दी है कि ईरान से तेल खरीदना बंद करे। भारत के सामरिक साझेदार अमेरिका के इस एलान ने भारत की विदेश नीति के लिये गम्भीर चुनौतियां पेश की हैं।





भारत यदि अमेरिकी आदेश को मानता है तो ईरान से भारत के रिश्ते खराब होंगे और ईरान से रिश्ते बना कर भारत मध्य एशिया और रूस के साथ आर्थिक रिश्ते गहरे करने के जो सपने देख रहा है उस पर आंच आएगी। भारत यदि अमेरिकी प्रतिबंधों की अवहेलना करता है तो ईरान से सम्बन्ध रखने वाली भारतीय कम्पनियों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार से हाथ धोना पड़ सकता है।

सवाल उठता है कि क्या विश्व बिरादरी अमेरिका के प्रतिबंधों के खिलाफ एकजुट होकर अमेरिकी कदम का बहिष्कार कर सकती है?  कई वर्षों के अथक कूटनीतिक प्रयासों के बाद 2015 में ईरान और छह देशों के बीच एक ऐतिहासिक साझा समग्र कार्ययोजना (जेसीपीओए) की घोषणा की गई थी जिसके तहत ईऱान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को केवल शांतिपूर्ण इऱादों के लिये ही चलाने का वचन दिया था और बदले में अमेरिका ने ईऱान से बाकी दुनिया के आर्थिक सम्बन्ध सामान्य बनाने देने के लिये अपनी प्रतिबंधात्मक कार्रवाई रोकने का ऐलान किया था।

बराक ओबामा के कार्यकाल में ईऱान पर जब प्रतिबंध लगा था तब भारत ने उससे किसी तरह निबट लिया था लेकिन इस बार राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कुछ ज्यादा ही गुस्से में नजर आ रहे हैं। वास्तव में  ईरान में शाह रजा पहलवी की सत्ता उखाड़ फेंकने के बाद तेहरान में ईऱान के रेवोल्युशनरी गार्ड ने अमेरिकी दूतावास को 1979 में चार नवम्बर को जला दिया था। इसलिये यह माना जा रहा है कि डोनाल्ड ट्रम्प ने चार नवम्बर की अंतिम तारीख की सीमा इसी वजह से तय की है और कहा है कि तब तक सारी दुनिया ईऱान से तेल खरीदना बंद कर दे। अमेरिका ईरान की इस कार्रवाई का बदला लेना चाहता है। दूसरी ओर ईरान ने अमेरिकी धमकियों से बचने के लिये अपना परमाणु शस्त्र कार्यक्रम तेज करने का ऐलान किया।

अमेरिका ने ईऱान के साथ हुए छह देशों के परमाणु समझौते को तोड़ते हुए ईरान पर प्रतिबंध लगा कर उसे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार से अलग-थलग करने की रणनीति लागू करनी शुरू की है औऱ वह यह अपेक्षा कर रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी अमेरिकी कदम का समर्थन करे।

लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय में अमेरिकी कदम के खिलाफ किसी तरह की एकजुटता नहीं दिखने के मद्देनजर भारत के सामने दुविधा बढ़ती जा रही है कि ईऱान पर अमेरिकी प्रतिबंधों से कैसे निबटे। हालांकि ईऱान ने माना है कि वह भारत की मजबूरियां समझता है वहीं अमेरिका ने भी संकेत दिया है कि वह भारत को कुछ छूट दे सकता है क्योंकि ईऱान के जिस चाबाहार बंदरगाह के विकास में भारत की भूमिका है उससे अफगानिस्तान में अमेरिकी सामरिक हितों की भी पूर्ति होती है। भारत को अमेरिका यदि चाबाहार से हटने को मजबूर करता है तो वहां भारत की जगह चीन ले लेगा और इससे अमेरिका के सामरिक हितों पर और प्रतिकूल असर पडेगा। अमेरिका को समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय सामरिक औऱ आर्थिक रिश्ते इतने उलझे हुए हैं कि इस एक कदम का असर लक्ष्य के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी पड़ सकता है। इस कदम से खुद अमेरिका को तो भारी नुकसान होगा ही इससे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनयिक सम्बन्धों में भी भारी तबाही मच सकती है।

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