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समर नीति: अफ्रीका में भारत औऱ चीन के बीच होड़

पीएम मोदी

54 देशों वाले अफ्रीकी महाद्वीप की आबादी भारत की आबादी से मामूली कम है और इलाका भारत से करीब दस गुना अधिक। लेकिन जातीय संघर्ष, औपनिवेशिक शासन, अशिक्षा और गरीबी की वजह से यह महाद्वीप पृथ्वी पर सबसे पिछड़ा और गृहयुद्ध में उलझा इलाका रहा है। ऐसे महाद्वीप में अपना आर्थिक औऱ सामरिक पांव जमाने की होड़ भारत और चीन सहित कई देशों के बीच चल रही है। अमेरिका व यूरोप दवारा वहां से कदम हटाते जाने का तात्कालिक लाभ सबसे अधिक चीन ने उठाया है जिसने अपने सस्ते माल और ढांचागत निवेश के जरिये पूरे अफ्रीका पर अपना दबदबा स्थापित कर लिया लगता है।





इसी अफ्रीकी महाद्वीप के कुछ देशों का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग ने जब एक साथ दौरा किया तो सारी दुनिया का ध्यान आकर्षित हुआ। दक्षिण अफ्रीका में जोहानीसबर्ग में  25 व 26 जुलाई को पांच देशों के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बहाने प्रधानमंत्री मोदी ने रवांडा और युगांडा को भी अपने दौरे में शामिल किया तो चीनी राष्ट्रपति भी तीन अफ्रीकी देशों में गए।

यह महाद्वीप सदियों से विकसित औपनिवेशिक देशों के शोषण का शिकार रहा है और वहां की अकूत सम्पत्ति उन विकसित देशों के बडे सम्राटों और उद्योगपतियों के खजाने भरने में ही काम आती रही है।  अफ्रीका को गुलामी की जंजीरों से छुड़वाने में भारत का भी ऐतिहासिक योगदान रहा है औऱ वहां गांधी व नेहरू के बाद अब शाहरुख खान व अमिताभ बच्चन को बच्चा-बच्चा जानता है। अफ्रीका में युद्धरत कबीलों के बीच शांति स्थापित करवाने में भारत ने भी अपने शांतिरक्षक बलों के जरिये असीम योगदान दिया है। इन सबके जरिये भारत ने अफ्रीका में भारी लोकप्रियता अर्जित की लेकिन भारत ने इस दोस्ती औऱ त्याग का व्यावसायिक दोहन करने की कोई रणनीति पिछले दशक के मध्य तक नहीं अपनाई थी।

इस बीच चीन ने वहां काफी देर से कदम रखे और लम्बी-लम्बी छलांगें मारते हुए वहां के तानाशाह शासकों से दोस्ती की और अपने ढांचागत निर्माणों, औद्योगिक उत्पादों और रक्षा साज सामान से भर दिया है। इसका नतीजा है कि अफ्रीकी देशों के साथ चीन का दिवपक्षीय व्यापार अढ़ाई सौ अरब डालर से अधिक पहुंच गया है जबकि भारत का व्यापार करीब 80 अरब डालर के आसपास ही है।

पिछली सदी में गुलामी के युग से बाहर निकलने के बाद अफ्रीका के कई देश जनतांत्रिक शासन के अधीन आ गए हैं और वहां विकास के गम्भीर कदम उठाए जाने लगे हैं। इसी वजह से पूरा अफ्रीका महाद्वीप आर्थिक सम्भावनाओं वाला इलाका बन गया है जहां के उभरते बाजार से लाभ उठाने की होड़ कई देशों के बीच चल रही है। अफ्रीका पर जो देश आर्थिक दबदबा स्थापित करेगा वह वहां अपना सामरिक दबदबा भी स्थापित करना चाहेगा।

भारत की भी यही कोशिश है कि अफ्रीकी महादवीप के 54 देशों के बीच ऐसी मजबूत लॉबी बने जो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के अलावा अहम अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भारत के साथ खड़ा दिखें। अफ्रीका असीम सम्भावनाओं वाले इलाके के तौर पर उभर रहा है जहां खेती के ब़ड़े इलाके का दोहन भारतीय व्यावसायिक किसान कर सकते हैं और उद्योग जगत भी अफ्रीका को अपने उत्पादन का आधार बना कर वहां अपने माल को बेच सकता है। इसके अलावा अफ्रीका के कई द्वीप देशों पर अपना सैनिक अड्डा बनाने की होड़ भी भारत और चीन के बीच तेज हो गई है। आर्थिक और सामरिक नजरिये से भारत को अपने सामरिक दांव एक दीर्घकालीन समर नीति बना कर चलना होगा ताकि भारत और अफ्रीका के बीच गहरे आर्थिक औऱ सामरिक रिश्ते बन सकें।

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