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समर नीति: आतंकवाद पाकिस्तान का हथियार

आतंकी
प्रतीकात्मक फोटो

आतंकवाद को राज्य के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की पाकिस्तान की रणनीति पूरी दुनिया में अनोखी है। आतंकवाद के बल पर पाकिस्तान ने न केवल भारत को पिछले कई दशकों से तंग किया है बल्कि अमेरिका जैसी ताकत भी घुटने टेकने को मजबूर दिख रहा है। वास्तव में पाकिस्तान  अपनी  भू-राजनीतिक स्थिति का दोहन करने में कामयाब हो रहा है। दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और मध्य एशिया के बीच में स्थित पाकिस्तान को कोई बड़ा देश इसलिये नजरअंदाज नहीं कर सकता कि पाकिस्तान की धऱती का इस्तेमाल कर ही वह इन देशों तक अपनी पहुंच बनाता  है।





यही वजह है कि आतंकवादी तालिबान को वह दो दशक बाद फिर काबुल की सत्ता में लौटाने में कामयाब दिख रहा है। अफगानिस्तान से तालिबान को बेदखल करने में अमेरिका ने 2001 में कामयाबी तो पाई लेकिन वहां टिके रहने के लिये पाकिस्तान की मदद की जरूरत थी जिसे पाकिस्तान ने खूब भुनाया। पाकिस्तान ने इसके लिये अमेरिका से 30 अरब डॉलर से अधिक की राशि वसूली और आज भी वह अमेरिका को मजबूर करने में कामयाब हो चुका है कि अफगानिस्तान के शासक के तौर पर तालिबान को स्वीकार कर  ले।

 पाकिस्तान के  सैन्य रणनीतिज्ञ आतंकवाद को राज्य के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना इस तरह सीख चुके हैं कि वह कोई भी बड़ी आतंकवादी वारदात करवा दे अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसकी केवल कड़ी निंदा के अलावा कुछ नहीं कर सकता। वह समझता है कि यही वह हथियार है जिसे वह सस्ते में इस्तेमाल करते रह कर अपने सामरिक औऱ राष्ट्रीय  हितों की पूर्ति कर सकता है। पाकिस्तान इस आतंकवादी हथियार का इस्तेमाल अपने परमाणु बमों के भंडार की बदौलत करता है। वह दुनिया को डराता है कि यदि पाकिस्तान के प्रादेशिक हितों पर कोई आंच आई तो वह इसकी सुरक्षा के लिये परमाणु बम भी दुश्मन देश पर गिरा सकता है।

इसी रणनीति के तहत वह भारत में अक्सर बड़े आतंकवादी हमले करवाने की कामयाब साजिश रचता है। जम्मू कश्मीर के पुलवामा में  भारतीय सुरक्षा बलों पर पिछले दो दशक बाद सबसे बड़ा आतंकवादी  हमला कहा जा सकता है। भले ही इस हमले में एक स्थानीय कश्मीरी युवा का इस्तेमाल किया गया हो लेकिन अब  यह साफ हो चुका है कि इसका मास्टरमाइंड पाकिस्तान में ही है औऱ वह कोई और नहीं बल्कि जैश ए मोहम्मद का सरगना मौलाना मसूद अजहर ही है। यह वही मसूद अजहर है जिसे बचाने के लिये चीन ने अपना पूरा राजनयिक समर्थन दिया। जैश ए  मोहम्मद ने खुद इस हमले की जिम्मेदारी ली है इसलिये चीन कैसे इस सच्चाई से इनकार कर सकता है कि जैश ए मोहम्मद का सरगना एक आतंकवादी है जो क्षेत्रीय शांति व स्थिरता को भंग करने पर तुला हुआ है और जिसे पाकिस्तान सरकार औऱ सेना का पूरा शह हासिल है।

 26 नवम्बर, 2008 को जब लश्कर-ए-तैयबा के सरगना हाफिज सईद ने मुम्बई पर आतंकवादी हमला करवाया  था तब भी पाकिस्तान  ने इस सच्चाई से इनकार किया था कि वह हमला पाकिस्तान की धरती से ही संचालित हुआ। पिछली बार की तरह इस बार भी पाकिस्तान  वही राग अलाप रहा है।  वह सोचता है कि आतंकवाद के बल पर वह भारत को झुका सकेगा। वास्तव में पाकिस्तान आतंकवाद को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने की रणनीति के तहत अपने सामरिक और राष्ट्रीय हितों की पूर्ति करना चाहता है।  अंतरराष्ट्रीय समुदाय  ने पाकिस्तान के इस फरेब को समझ लिया है लेकिन वह पाकिस्तान पर समुचित दबाव इसलिये नहीं डालता कि  पाकिस्तान की बदमाशिय़ों से उसे डर लगता है। अंग्रेजी में इसे न्युसेंस वैल्यू कहते हैं जिसे पाकिस्तान ने  भुनाना सीख लिया है।

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