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समर नीति: रक्षा सौदों पर हो विपक्ष से सलाह

राफेल-विमान
प्रतीकात्मक फोटो

फ्रांस से राफेल लडाकू विमानों के सौदे पर हो रही राजनीति का एक बड़ा खतरा यही लग रहा है कि कहीं यह बोफोर्स तोपों की राह पर नहीं चली जाए। 1986 में जब स्वीडन की बोफोर्स कम्पनी से चार सौ होवित्जर तोपों का सौदा हुआ था तब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर इसमें दलाली खाने का आरोप लगा था। तब बोफोर्स का सौदा महज 12 सौ करो़ड़ रुपये का था औऱ इसमें 62 करोड़ रुपये की दलाली के आरोप लगे थे। इसका प्रतिकूल असर भारत की रक्षा तैयारी पर इतना गहरा पड़ा कि भारत अगले तीन दशक तक होवित्जर तोपों का कोई सौदा नहीं कर पाया। इस वजह से 1999 के करगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना को पाकिस्तानी सेना ने काफी परेशान किया था। बोफोर्स तोप सौदों में सीधे प्रधानमंत्री राजीव गांधी के फंसे होने के आरोप की वजह से अगले दो दशक तक भारतीय सेनाओं के लिये भारत के रक्षा कर्णधर कोई बड़ा रक्षा सौदा करने से कतराते रहे।





अब भी फ्रांस की दासो कम्पनी से 36 राफेल विमानों के करीब 59 हजार करोड रुपये के सौदे में पक्षपात के आरोप विपक्षी कांग्रेस पार्टी सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर लगा रही है। भारत की यह विडम्बना ही कही जा सकती है कि कोई भी रक्षा सौदा भ्रष्टाचार के आरोपों से बच नहीं पाता। चाहे वह अस्सी के दशक में जर्मनी से चार पनडुब्बियों की खरीद का मसला हो या फिर कुछ साल पहले यूपीए सरकार के दौरान सम्पन्न हुआ वीवीआईपी हेलीकाप्टरों का सौदा हो। भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से अक्सर राजनेता .या नौकरशाह सेनाओं के लिये कोई बडा सौदा करने से घबराने लगे हैं।

भ्रष्टाचार के आरोपों की वजह से ईमानदार नेता या नौकरशाह कोई बडा फैसला नहीं लेते या फिर निजी हितों में सौदा कर लेते हैं तो उन्हें रद्द करने की वैसी नौबत आती है जैसा कि हमने देखा है कि किस तरह वायुसेना के लिये वीवीआईपी हेलीकाप्टरों की खरीद का सौदा लागू हो जाने के बाद भी उन्हें रद्द करने तक की कार्रवाई कर दी गई । इस बार भी राफेल लडा़कू विमानों का सौदा रद्द करने की मांग राजनीतिक हलकों में की जाने लगी है। यदि ऐसा होता हो तो इससे भारतीय सेनांओं के मनोबल पर काफी प्रतिकूल असर पडेगा। इससे सैन्य तैयारी पर भी काफी प्रतिकूल असर पड़े बिना नहीं रह सकता।

भारतीय सेना के लिये यह निहायत ही दुर्भाग्यपूर्ण होगा कि भ्रष्टाचार के आरोपों के दलदल में बड़़े रक्षा सौदे फंसते जाने की वजह से सेनाओं को नवीनतम तकनीक वाले संहारक हथियारों को मुहैया नहीं कराया जा सका है। थलसेना को होवित्जर तोपों की तीन दशक बाद पहली खरीद अमेरिका की एम-777 तोपों के तौर पर हुई औऱ इसके बाद स्वदेशी बोफोर्स तोपों के सफल विकास के बाद उन्हें सेना को सौंपने का फैसला लिया गया। लेकिन भारत की सैन्य तैयारी अस्सी के दशक के बाद से ढुलमुल तरीके से ही चलती रही है जिससे भारत अपने पडोसी ताकतवर देश चीन से तो काफी पिछड़ ही गया है आनुपातिक हिसाब से देखें तो हमारी सेनाओं के पास उस क्षमता और संख्या में नये हथियार नहीं दिये गए जैसी कि हमारे पड़ोसी प्रतिदंवद्वी देशों के पास मुहैया हो रहे हैं। यहां तक कि पड़ोसी पाकिस्तान जिस तरह से चीन से आधुनिक ल़ड़ाकू विमान , मिसाइलें औऱ ड्रोन खरीद रहा है उससे भारतीय रक्षा कर्णधरों के कान खड़़े होने चाहिये लेकिन हमारे राजनीतिक दल इसकी चिंता करने के बगैर अपनी राजनीतिक रोटी ही सेंकने में अधिक रुचि ले रहे हैं जिससे भारत की रक्षा तैयारी पर काफी प्रतिकूल असर पडने लगा है। चिंता इस बात की है कि जब हमारे पड़ोसी देश देखेंगे कि हमारी सैन्य तैयारी काफी कमजोर पड़ चुकी है तो वे भारत के खिलाफ कोई दुस्साहस करने से नहीं चूकेंगे। हमारा सुझाव है कि सेनाओं के लिये कोई बडा सौदा करने से पहले विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों का एक समूह उसकी जांच करे। तब वे दलाली के आरोपों से बचेंगे और सेनाओं को नये हथियार मिलते रहेंगे।

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