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नक्सलवाद के खात्मे की ओर बढ़ते कदम

नक्सली
नक्सली (फाइल फोटो)

केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) की विशेष शाखा त्वरित कार्रवाई बल (RAF) के स्थापना दिवस पर यह कहना कि तीन साल में नक्सलवाद और माओवाद का देश से पूरी तरह सफाया हो जायेगा, केन्द्र सरकार की प्रतिबद्धता तथा गंभीरता को दर्शाता है। बीते बरसों में देश ने नक्सलियों के कारनामों को बखूबी देखा है और उनके खून-खराबे को भी स्थानीय लोगों और अर्धसैनिक बलों ने भी महसूस किया है। अधिकार हड़पने का जो रास्ता उन्होंने चुना उससे क्षेत्र विशेष के नागरिकों और स्वयं उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। माओवादियों का पूरा जोर रहा कि वे स्थानीय नागरिकों को अपनी मुहिम में शामिल कर उनके हाथों में बंदूक पकड़ाएं तथा जंगलों और पहाड़ियों के बीच अपना मुकाम बनाकर लोगों तथा शासन-प्रशासन तक दहशत का माहौल बनाएं। पर सच्चाई यह है कि गलत रास्ते पर चलकर कुछ भी हासिल नहीं होता।





हकीकत यह है कि केन्द्र व राज्य सरकारों की लगातार निगरानी, अर्धसैनिक बलों की मुस्तैदी तथा स्थानीय किशोरों-युवाओं को लिखा-पढ़ाकर बारोजगार करने की पहल से नक्सलियों का क्षेत्र लगातार सिमट गया। यह संतोष की बात है। ऐसे में केन्द्रीय गृहमंत्री की उक्ति इस बात को स्पष्ट करती है कि नक्सलवाद के खात्मे पर सरकार की नीति सीधी और सपाट है। नक्सली बंदूक छोड़ें, मुख्यधारा से जुड़ें। कभी 126 जिलों में फैला नक्सलवाद 10-12 जिलों में इसलिए सिमटकर रह गया है कि स्थानीय नागरिकों का उन्हें समर्थन नहीं मिल पा रहा और केन्द्रीय सुरक्षा बलों की वहां लगातार मौजूदगी से लोगों में दहशत और डर की बजाए सुरक्षा का माहौल बना है, विश्वास बढ़ा है। ऐसा ही विश्वास जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्यों में बढ़ाए जाने की जरूरत है।

जम्मू-कश्मीर में हाल ही में स्थानीय निकाय चुनाव में नागरिकों द्वारा कहीं कम कहीं ज्यादा घर से बाहर निकलकर लोकतंत्र को मजबूती देने के लिए उठे कदम भी इस बात की ओर इशारा करते हैं कि लोग आतंकवादियों और अलगाववादियों से किनारा करना चाहते हैं। यह सही है कि कश्मीर के तमाम इलाकों में संशकित मन और भय के साथ लोग बूथों तक गए। लेकिन फिर भी लोग चुनी हुई व्यवस्था चाहते हैं और विकास की ओर कदम बढ़ाना चाहते हैं। सीधे तौर पर कहा जा सकता है कि घाटी में आतंकवादियों और अलगाववादियों के चुनाव बहिष्कार के फरमान, पथराव व हड़ताल के बीच घर से बाहर मतदान केन्द्र तक जाना यह बताता है कि खून-खराबा बहुत हो चुका हमें विकास और समृद्धि चाहिए। अब यह काम स्थानीय निकाय, सूबे के नए राज्यपाल और केन्द्र सरकार का है कि वह घाटी के निवासियों की भावनाओं को समझकर सधे कदमों के साथ तेजी के साथ आगे बढ़ने का काम सुनियोजित तरीके से करें।

नक्सलवाद और आतंकवाद ने स्थानीय नागरिकों का हर तरह से नुकसान किया है। शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक और मानसिक तौर पर। कश्मीर में पिछले तीन दशक से लोग आतंकवाद की वजह से मानसिक रूप से अशांत हैं। साफ शब्दों में यह कहना ठीक होगा कि वह मनोरोग से पीड़ित हैं। एक पूरी की पूरी युवा पीढ़ी ने वहां सामान्य हालात नहीं देखे हैं। देखा है तो केवल डर, खौफ और खून का नजारा। क्या यह सामान्य जीवन जीने के लिए सही है? कश्मीर में इस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंसेज द्वारा करवाए गए एक सर्वे में पाया गया कि हर चार घरों में से एक घर में कोई न कोई दिमागी रूप से अस्वस्थ है। जब मन ही सेहतमंद नहीं है तो भला कोई कैसे स्वंय सामान्य जिंदगी तथा विकास की मुख्यधारा में कैसे जुड़ सकता है? यह सही है कि घाटी में हालात नक्सली इलाकों के मुकाबले थोड़े पेचीदा हैं पर यह भी तय है कि लगातार प्रयासों से बेहतर परिणाम की उम्मीद बढती है। ऐसे ही प्रयास और पहल पूर्वोत्तर के अशांत क्षेत्रों में भी करने की जरूरत है।

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