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श्रीलंका के बम विस्फोट देते हैं भारत को मजबूत संदेश

श्रीलंका में आतंकी हमला
फाइल फोटो

श्रीलंका में हाल में हुए बम विस्फोटों में 250 से अधिक जानें गईं। इन विस्फोटों से भारत को भी एक मजबूत संदेश मिला है। आईएसआईएस द्वारा जारी सर्कुलर में दावा किया गया कि विस्फोट करने वाले उसके आदमी थे। ये सर्कुलर तमिल और मलयालम भाषा में जारी किए गए थे। तमिल की बात तो समझी जा सकती है क्योकि यह श्रीलंका में भी बोली जाती है लेकिन इसे मलयालम भाषा में भी जारी किए जाने के अलग निहितार्थ हैं। इस हमले से संबंधित खुफिया जानकारी भारत और अमेरिका द्वारा श्रीलंका को मुहैया कराई गई थी जिसकी अनदेखी की गई। ऐसा भी माना जाता है कि कुछ आत्मघाती हमलावर भगोड़े भारतीय मुस्लिम प्रचारक जाकिर नाइक के उपदेशों से भी प्रभावित थे जिसे मलेशिया में पनाह दी गई है और जो विभिन्न धर्मों के बीच नफरत फैला रहा है।





श्रीलंका और मालदीव भारत के दो निकटतम पड़ोसी देश हैं जिनके खासकर, मालदीव के नागरिकों ने सीरिया और इराक में आईएसआईएस के आतंकियों के साथ मिल कर लड़ाई लड़ी थी। समाज में उनकी वापसी से एक नए प्रकार का खतरा पैदा हो गया है। हाल के बम धमाकों की जांच से संकेत मिला है कि इसमें कम से कम दो वैसे लोगों की संलिप्तता है जो इराक और सीरिया से लौटे थे।

श्रीलंका की सरकार ने इन हमलोें के पीछे नेशनल थोहीजमात (एनटीजे) का हाथ होने का आरोप लगाया है। एनटीजे भारत में मौजूद सऊदी अरब वित्तपोषित तमिलनाडु थोहीजमात (टीएनटीजे) की वैचारिक शाखा है। टीएनटीजे ने श्रीलंका थोहीजमात की स्थापना की जिससे एनटीजे पैदा हुआ। बताया जाता है कि एनटीजे के लश्कर-ए-तैयबा से ताल्लुकात हैं जिसके जरिये इसने टीएनटीजे से संबंध जोड़ने की कोशिश की।

एनटीजे का नेता जहारन हाशिम है जो एक चरमपंथी प्रचारक है। वह एक फिदायीन बमवर्षक है और उसके परिवार के ज्यादातर सदस्यों ने सुरक्षाकर्मियों द्वारा घेरे जाने पर खुद को उड़ा लिया था। विस्फोटकों की खरीद और असेम्बिलंग केवल जमात के सदस्यों द्वारा नहीं की जा सकती थी क्योंकि अब तक हुई जांच से पता चलता है कि उनमें किसी विशेषज्ञ की कमी थी। इसीलिए  इसमें कोई पेशेवर आतंकी जरूर शामिल हुआ होगा, जिसके बारे में जानकारी अभी तक नहीं मिल पाई है।

इसमें पाकिस्तानी कोण की भी जांच की जा रही है। पाकिस्तान के आईएसआईएस  के लिए श्रीलंका में प्रवेश उसके लिए इस क्षेत्र में कई दरवाजे खोल देगा। कोलंबो में पाक उच्चायोग के भीतर आईएसआईएस के कार्यालय को दक्षिण भारत में उसके नेटवर्कों की निगरानी करने का दायित्व सौंपा गया है। यह पूर्वी श्रीलंका में मुस्लिम समुदाय के भीतर उग्रपंथ को बढ़ाने का काम भी करता रहा है जिससे कि वे भारत में रहने वाले अपने परिचितों को प्रभावित कर सकें। इससे संबंधित एक थ्योरी यह भी है कि पाकिस्तान से आने वाले ड्रग मनी का इस्तेमाल एनटीजे के वित्तपोषण के लिए किया जा रहा था।

श्रीलंका में ईसाई और मुसलमान शुरू से ही प्रेमपूर्वक रहते आए हैं जबकि चरमपंथी बौद्ध समूह इन दोनों को निशाना बनाते आए हैं। कायदे से एनटीजे ने हमला किया तो उन्हें बदले की भावना से बौद्धों को निशाना बनाना चाहिए था लेकिन उन्होंने इसकी जगह ईसाइयों और पश्चिमी देशों के पर्यटकों को निशाना बनाया। इससे यह संकेत मिलता है कि इन हमलों के सूत्र श्रीलंका की सरहदों से कहीं दूर से जुड़े हुए थे। बौद्ध स्मारकों को निशाना बनाने के लिए कुख्यात रहे एनटीजे ने अपनी दिशा बदली और फियादीन हमले किए  इससे एक बार फिर से यह धारणा बलवती होती है कि इन हमलों की दिशा और उन पर प्रभाव बाहरी थे।

ये हमले भारतीय सीमाओं के निकट किए गए हैं और इनमें वैसे समुदाय संलिप्त हैं जिनका दक्षिण भारत में घनिष्ठ पारिवारिक संबंध हैं। अलावा इसके  इसरो और एचएएल सहित ज्यादातर प्रमुख सैन्य उत्पादन और अनुसंधान केंद्र दक्षिण भारत में ही स्थित हैं। इन पर हमेशा खतरे की तलवार लटकती रही है। अगर इस क्षेत्र में ऐसे हमले होने लगे तो इन पर जोखिम और बढ़ जाएगा। इस हमले की प्रारंभिक खुफिया सूचना भारतीय एजेन्सियों द्वारा कोयंबटूर के एक मामले की जांच किए जाने के दौरान प्राप्त हुई।

इस हमले और आईएसआईएस द्वारा वीडियो जारी किए जाने के बाद केरल, तमिलनाडु एवं कर्नाटक में जांच में तेजी आ गई है। ऐसी संभावना है कि वहां पाक समर्थित स्लीपर सेल मौजूद हैं जिन्हें धीरे धीरे सक्रिय बनाया जा सकता है। हालांकि ऐसा नहीं लगता कि श्रीलंका में हुए हमलों में कोई प्रत्यक्ष भारतीय संलिप्तता रही हो, फिर भी देश में ऐसे तत्व मौजूद हैं जिन्हें हो सकता है प्रभावित किया गया हो और वे इसके माध्यम बने हों।

एक ऐसा समूह, जो सुरक्षा राडार पर आने से बचता रहा हो, जो अपने लक्ष्य की प्रकृति पर अपना फोकस बदल देता है और अब ऐसा कायरतापूर्ण कार्य कर रहा है, पर नजर रखने के लिए जरूरी है कि खुफिया एजेन्सियां अब मानव और सिग्नल (संकेत) खुफिया जानकारी पर अधिक भरोसा करें। विस्फोटकों की बरामदगी जैसे छोटे संकेतकों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए जैसी कि श्रीलंका मामले में की गई। अमेरिका जैसे देश, जहां कई प्रकार के सिगनल निगरानी तंत्र हैं, से प्रवाहित होने वाली सूचनाओं पर गंभीरता से गौर किया जाना चाहिए और उनकी पुख्ता जांच की जानी चाहिए।

भारत को निगरानी एवं सतर्कता के अपने स्तर को अब और अधिक बढ़ाना चाहिए। वैसे क्षेत्र, जिन्हें कभी सुरक्षित और उग्रपंथ से अछूता समझा जाता रहा है, उन पर अब फिर से विचार किए जाने की आवश्यकता है। भारतीय खुफिया ढांचे को पुनर्गठित करना अब बेहद जरूरी हो गया है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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