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स्पेशल रिपोर्ट: ताइवान ने चीन को दिया झटका

शी और ताइवान की राष्ट्रपति त्साई

वाशिंगटन से ललित मोहन बंसल

राष्ट्रवादी ताइवान ने साम्यवादी चीन के ‘एक राष्ट्र, दो प्रणाली’ सिद्धांत को ‘अंधे कुएं’ में धकेल दिया है। इसी सप्ताह ताइवान के चुनाव नतीजों में सेवारत राष्ट्रपति त्साई इंग वन ने अपनी राष्ट्रवादी छवि के बिना पर राष्ट्रपति चुनाव दोबारा जीत लिया है।





चीन में गृह युद्ध के बाद ताइवान पिछले 71 वर्षों से एक ‘स्वायतशासी’ स्वतंत्र देश के रूप खड़ा है, उसका अपना संविधान है, शुरू के वर्षों को छोड़ दें, तो अब डेमोक्रेटिक ताने-बाने में नियमित चुनाव होते हैं, उनका लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से जीवन जीने का ढंग है, उनके मेहनतकश लोग साम्यवादी चीनी प्रलोभनों पर कम, अपनी पूँजीवादी इकानमी पर ज़्यादा गौरवान्वित हैं।

लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में डाक्ट्रेट त्साई इंग वन ने पहली पारी में (2016-2020) राष्ट्रपति का दायित्व संभाला था, तब मूलत: दो प्राथमिकताएं थीं। एक- साम्यवादी चीन के ‘एक राष्ट्र और दो प्रणाली’ के सिद्धांत को उखाड़ फेंके और अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाए। दो- देश की आर्थिक स्थिति की मज़बूती के लिए देश का हर नागरिक संकल्प ले। वह इन दोनों मोर्चों पर सफल रहीं। इंगवन यह भली भाँति जानती थी कि राष्ट्रपति चुनाव में साम्यवादी चीन डिजिटल मीडिया के सहारे झूठ तंत्र का सहारा ले कर और बड़ी कंपनियों को प्रलोभन दे कर उनके सम्मुख एक बड़ी बाधा खड़ी कर सकती है। साम्यवादी चीन समर्थित क्वोमिनतांग पार्टी और उनके चहेते नेता हॉन कुओ-यू जो ताइवान के एक दक्षिणी नगर काओसुंग में लोकप्रिय मतों से मेयर बन गए थे, एक वर्ष बाद नहीं चल पाए।

इंग वन दूसरी बार एक बड़े जनमत के साथ ताइवान की राष्ट्रपति बनी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उनके विदेश विभाग ने ताइवान की राष्ट्रपति त्साई इंग-वन की जीत पर एक बड़ी टिप्पणी कर चीनी आकाओं को चौका दिया है। अमेरिका ने मात्र इतना कहा है: त्साई इंग-वन की विजय यह दर्शाती है कि ताइवान में लोकतांत्रिक जड़े मज़बूत हैं। लोगों ने अपार बहुमत से चीन की ‘एक राष्ट्र दो प्रणाली’ के विरुद्ध मतदान कर यह दिखा दिया है कि लोकतंत्र में समृद्धि और सुख शांति का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है। यह चीन के लिए एक सबक़ है। अमेरिकी विश्लेषकों का मत है कि पेइचिंग के ताइवानी मतदाताओं को दिए गए प्रलोभन उलटे पड़े । अब उन्हें यह समझ आ गया होगा कि ताइवान को किसी डंडे के ज़ोर पर अधीन नहीं किया जा सकता।

अपनी जीत से उल्लिसित इंगवन ने चीन के राष्ट्रपति शी चिन फिंग को आगाह किया कि वह ताइवान द्वीप को बल के प्रयोग से अपने अधीनक ग्रेटर चीन बनाने का ख़याल त्याग दे। इंगवन ने पिछले दिनों हांगकांग में महीनों तक लोकतंत्र के नाम पर आंदोलनकारियो को झकझोरते हुए कहा था कि चीन बल प्रयोग से ‘एक राष्ट्र दो प्रणाली’ को लागू नहीं कर सकता। इस कथन का बड़ा स्वागत हुआ था।

अमेरिका भले ही चार दशक से ‘एक चाइना नीति’ से बंधा है लेकिन ज़िम्मी कार्टर के ‘ताइवान रिलेशंस एक्ट’ के तहत रिपब्लिक आफ चाइना के नाम के साथ ताइवान इतना विवश भी नहीं है। वह अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका से हथियारों की ख़रीद कर सकता है, बशर्ते कांग्रेस प्रस्ताव का अनुमोदन करे।

‘एक चाइना नीति’ के तहत साम्यवादी चीन के भय से संयुक्त राष्ट्र के 192 सदस्यों में मात्र 16 रिपब्लिक आफ चीन अर्थात ताइवान से दौत्य सम्बंध बना सके हैं, जबकि अमेरिका, यूरोप, एशिया, अफ़्रीका और यहाँ तक कि लेटिन अमेरिका के बड़े देश ताइवान को एक सार्वभौमिक सरकार के रूप में मान्यता देने से कतराते आ रहे हैं। भारत सहित 57 देश ऐसे हैं, जो ताइवान से कारोबारी संबंध बनाए हुए हैं।
ट्रम्प के सम्मुख एक बार फिर प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या वह लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर चुनी हुई सरकार की सुरक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कसौटी पर खरा उतर सकेंगे? यह वही ट्रम्प है, जिसने सत्तारूढ़ होने से पहले ही ताइवान की नवनिर्वाचित राष्ट्रपति साई इंग वेन से फ़ोन पर बातचीत की थी। इस पर चीन ने ‘वन चाइना नीति’ के तहत आपत्ति दर्ज की थी। इसके बावजूद अमेरिका ने ताइपेई में 12 जून, 2018 में करोड़ों डालर ख़र्च कर अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ ताइवान के नाम पर ‘डिफ़ेक्टो’ दूतावास के रूप में चीन के मूंह पर चपेट लगाई थी। यही नहीं, हांगकांग में ‘एक राष्ट्र दो प्रणाली’ के विरोध में जब लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर आंदोलन ने उग्र रूप धारण कर लिया था तब आंदोलन के समर्थन में कांग्रेस की ओर से पारित प्रस्ताव पर ट्रम्प ने एक बार फिर अपने हस्ताक्षर कर चीन से नाराज़गी मोल ली थी।

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