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सैनिक और चुनाव

सुरक्षाकर्मी
फाइल फोटो

भारतीय नागरिक होने के बावजूद सशस्त्र बल कर्मियों के पास दशकों तक वोट देने का अधिकार नहीं था। उन्हें खुद को केवल सेना मतदाता के रूप में रजिस्टर करने की अनुमति थी और वे डाक मतपत्र (पोस्टल बैलेट) के द्वारा अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते थे। यह कवायद लगभग निर्रथक ही थी क्योंकि न तो मतपत्र समय पर पहुंचते थे और न ही संबंधित स्थान पर पहुंचने वाले उनके मतों का कोई महत्व रह जाता था। सैन्य कर्मियों, जो चुनावों के दौरान अमूमन अपने घरों से दूर ही रहते हैं, के लोकतांत्रिक अधिकारों को बनाये रखने के लिए इस मामले को शीर्ष न्यायालय के समक्ष रखा गया।





इस वर्ष फरवरी में  चुनाव आयोग की सिफारिश पर मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक पीठ ने जनहित याचिका का निपटारा किया जिसमें सैनिकों के लिए मतदान के अधिकार को सुनिश्चित करने के लिए एक कारगर तंत्र की मांग की गई थी। इसने शांत स्थानों पर तैनात सैन्य कर्मियों को खुद को सामान्य मतदाता के रूप में पंजीकृत करने एवं निर्वाचन क्षेत्र में अपने मताधिकार का प्रयोग करने की अनुमति दी जहां वे तैनात हैं। यह सुविधा उन लोगों को नहीं मिल सकेगी जो फील्ड क्षेत्रों में तैनात हैं।

इसकी वजह तर्कसंगत है। शांत क्षेत्रों में तैनात सैन्य मतदाता, जो अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे, की संख्या मतदान करने वाले सामान्य नागरिकों की तुलना में कम होगी जबकि अधिकांश फील्ड क्षेत्रों में सामान्य नागरिकों की कम आबादी के कारण उनका मत वोट संतुलन को परिवर्तित कर सकता है। फील्ड क्षेत्र में रहने वाले सैन्य कर्मी डाक मतपत्र प्रक्रिया का अनुसरण करते रहेंगे  हालांकि डाक द्वारा डाक मतपत्र ले जाने की जगह, अब वे इसे डाऊनलोड कर सकते हैं और इस प्रकार समय बचा सकते हैं।

28 अप्रैल को मतदान के चौथे चरण के दौरान जबलपुर की एक घटना में स्थानीय रूप से स्थित ग्रेनाडियर रेंजीमेंटल सेंटर के मतदान के लिए पंजीकृत सैन्य कर्मी मतदान के लिए बढ़े। सेना ने मतदाताओं को मतदान केंद्र तक ले जाने के लिए केंद्रीकृत परिवहन की व्यवस्था की थी। पुलिस निर्देशों के अनुरूप  उनके वाहन मतदान केंद्र से एक किलोमीटर की दूरी पर ही रोक दिए गए थे और मतदाता पैदल ही आगे बढ़ रहे थे।

तभी कांग्रेेस पार्टी के कार्यकर्ता उस स्थान तक आए जहां वाहन पार्क किए गए थे और यह दावा करते हुए कि वोट हासिल करने के लिए बीजेपी सेना का इस्तेमाल कर रही है और जवानों को अवैध तरीके से वोट डालने के लिए भेजा जा रहा है, इसका वीडियो बनाने लगे। उन्होंने इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि जब तक उनका नाम मतदाता सूची में दर्ज नहीं होता, वे मतदान केंद्र में प्रवेश कर ही नहीं कर सकते थे। इस वीडियो में वाहनों के ड्राइवर भी दिखे थे, लेकिन उन्होंने चुप्पी साधे रखी।

आरोप लगाने वालों ने इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया कि जो वोट देने गए थे, वे सिविल ड्रेस में थे और उनके ड्राइवर मतदान केंद्र से दूर यूनिफॉर्म में ही बने रहे। फिर इस वीडियो को इस दावे के साथ पूरे सोशल मीडिया में फैलाया गया कि सेना का राजनीतिकरण किया जा रहा है और उसे एक विशेष दल मुख्य रूप से भाजपा को वोट देने का निर्देश दिया गया है।

चुनाव शुरू होने के बाद से पहली बार सेना ने राजनीतिकरण के आरोप पर इस प्रकार प्रतिक्रिया जताई। इसकी वजह यह थी कि इन आरोपों ने सेना की अराजनीतिक प्रकृति के मर्म को छू लिया था। कांग्रेस के स्थानीय प्रत्याशी ने तो यहां तक दावा किया कि जबलपुर में सेना का एक कर्नल बीजेपी का करीबी था और इसलिए वह सैन्य कर्मियों को वोट डालने के लिए उकसा रहा था।

यह दुख की बात है कि इस प्रकार के आरोप लगाने वाले लोग सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों से अनजान बने रहते हैं और इस प्रकार इस तथ्य से भी नावाकिफ रहते हैं कि सैन्य कर्मी केवल अपने राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। सेना ने अपनी नाराज प्रतिक्रिया में कहा कि वह सत्तारूढ़ सरकार का समर्थन करती है और पाकिस्तानी सेना की तरह नहीं है जो हर चुनाव में पार्टी और प्रधानमंत्री का चयन करती है।

उन्होंने यह भी कहा कि सेना अभी तक अराजनीतिक रही है और आगे भी रहेगी और उसके जवानों का सम्मान किया जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रीय संविधान की रक्षा करने के लिए अपने जीवन की कुर्बानी करने का संकल्प लिया है। सेना ने आखिर में यह भी कहा कि वह कभी भी किसी दुश्मन या आतंकी संगठन से डरी नहीं है और इसलिए वह ऐसे लोगों से भयभीत होकर नहीं हारेगी जो उस पर आरोप लगाना चाहते हैं। सेना सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रदत्त अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का उपयोग करना जारी रखेगी। सेना की टिप्पणी का अंतिम वाक्य था, ‘ हम आपसे इतना अच्छा बन जाने का आग्रह करते हैं कि आपके लिए मरना हमारे लिए आनंद की बात हो जाए।‘

आश्चर्य की बात यह है कि इस कृत्य में शामिल लोग वही हैं जिन्होंने बीजेपी पर सशस्त्र बलों के राजनीतिकरण का आरोप लगाया है। क्या वे उनसे किसी भी प्रकार बेहतर हैं ?

यह एक दुखद दिन था जब राष्ट्र के सदस्यों ने एक ऐसे बल पर आरोप लगाया जो राजनीति और पक्षपात करने वाले राजनीतिक दलों से अलग रहा है। इससे भी बुरी बात यह है कि सर्वाधिक सम्मानित अराजनीतिक संगठन पर राजनीतिक होने का आरोप लगाया जा रहा है। वर्दीधारी और पूर्व सैन्य समुदाय को इस बात से अधिक आघात लगा है कि कांग्रेस के किसी भी नेता ने अपने कार्यकर्ताओं के इन कृत्यों की आलोचना नहीं की है। इससे यही संदेश जा रहा है कि सभी राजनीतिक दल केवल राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए ही सेना का शोषण करते रहे हैं। क्या हम इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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