vishesh

…ताकि घाटी के युवा आतंक की राह न पकड़ सकें

युवाओं का आतंकी बनना
प्रतीकात्मक फोटो

इस बात से केवल संतोष किया जा सकता है और आश्वस्त भी हुआ जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर में सेना की उस रणनीति ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है जिसमें घाटी में आतंकियों के पैदावार बढ़ाने पर रोक लगी है। सेना की इस कारगर रणनीति के तहत स्थानीय युवाओं को भ्रमित करने, बरगलाने और जेहाद के नाम पर आतंकी बनाने पर गुमराह करने वाले लोगों पर लगाम कसी गई है। जिसके नतीजे सामने आ रहे हैं। हालांकि अभी तक होता यह रहा कि कश्मीर घाटी के कई जिलों में भाषणबाज स्थानीय युवाओं के दिमाग में जहर घोलकर उल्लू सीधा करते रहे और युवाओं को आतंक की अंधी राह पर धकेलते रहे। लेकिन सेना की नई रणनीति से काफी कमी आई है। यह एक अच्छा संकेत है।





एक आंकड़ा भी इस बात की तस्दीक करता है कि स्थानीय युवकों के आतंकी बनने की राह पर जाने में कमी आई है। सेना के मुताबिक विगत चार महीनों का आंकड़ा इस बात का खुलासा करता है कि पिछले साल नवंबर में जहां 10 आतंकी बने, वहीं दिसंबर में 20, जनवरी में केवल तीन नए युवाओं को आतंकी अपने साथ जोड़ पाए, वहीं फरवरी से अब तक कोई भी स्थानीय युवा आतंकियों के बहकावे में नहीं आया। यह संख्या बताती है कि अगर सही रणनीति के तहत आक्रमक और जमीनी स्तर से ही युवाओं को मुख्यधारा से जोड़ा जाए तो बात बनेगी ही। घाटी में रोजगार के अभाव और जेहाद के नाम पर ब्रेनवाश कर उन्हें बंदूक थामने की ओर बढ़ा दिया जाता है। आतंकी संगठन इसी का फायदा उठाकर अपने मकसद को अंजाम देते रहे हैं। इस साल 14 फरवरी को पुलवामा आतंकी हलमे के बाद सेना, सशस्त्र बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त कार्रवाई से आतंक पर लगाम लगी है। 14 फरवरी से अब तक 18 से ज्यादा आतंकी मारे गए हैं जिनमें 14 आतंकी जैश-ए-मोहम्मद गुट के हैं। इसी गुट ने पुलवामा आतंकी हमले की जिम्मेदारी ली थी। वैसे भी दक्षिण कश्मीर में जैश आतंकी गुट का डिप्टी कमांडर मुदस्सिर के मारे जाने के बाद इस इलाके में जैश को झटका लगा है। मारा गया डिप्टी कमांडर इस इलाके में युवाओं को बरगला कर आतंक की ओर घसीटता था।

यह सही है कि सीमा के इस पार पुलवामा आतंकी हमले के बाद उकसाने वालों पर तेज प्रहार करने से स्थानीय युवा आतंकी नहीं बने हैं। पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस दिशा में पूरी सफलता तभी मिलेगी जब केंद्र व सूबे का राज्यपाल शासन हर संभव कोशिश से घाटी में खून खराबे, हिंसा का माहौल नहीं खत्म कर लेता और शांति स्थापित नहीं कर लेता। काम बेहद चुनौतीपूर्ण है लेकिन करना होगा। यहां यह बात समझने की है कि कई दशक से घाटी में स्थितियां बेहद असामान्य हैं। लंबे समय से स्थानीय युवाओं ने वहां समान्य जन-जीवन नहीं देखा है। किशोर तथा युवा इन अप्रत्याशित घटनाओं को देख रहे हैं और उकसावे-बहकावे में पत्थरबाज और आतंकी बन रहे हैं। इसे रोकने का काम सुरक्षाबल तथा सुरक्षा एजेंसियां कर रही हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।

इसी परिपेक्ष्य में इस बात पर भी खास ध्यान देने की जरूरत है कि सीमा के उस पार सेन भी कश्मीरियों को आत्मघाती हमले के लिए उकसाने वाली पाकिस्तानी सेना को मुंहतोड़ जवाब लगातार दिया जाए। आतंकवाद पर लगाम लगाने का नाटक करने वाले पाकिस्तान का झूठ एक बार फिर दुनिया के सामने है। पाकिस्तान के कब्जे वाले गुलाम कश्मीर (PoK) के नेताओं तथा मानवाधिकार के कार्यकर्ताओं ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 40वें सत्र में साफ कहा कि पाकिस्तानी सेना के अफसर खुलेआम कश्मीरियों को छोटे हथियार छोड़कर आत्मघाती हमले के लिए उकसाते हैं। विश्व के पटल पर यह पाकिस्तान का दोमुंहा चेहरा है लेकिन भारत के लिए यह कोई नहीं बात नहीं है। भारत को जम्मू-कश्मीर घाटी में आतंक पर हर तरह से लगाम कसने तथा सीमा पार आतंकी अड्डों को नेस्तनाबूद करते रहने की मुहिम जारी रखनी होगी। साथ ही चीन के वीटो करने या न करने तथा किसी अन्य देश की सक्रिय मदद की ज्यादा उम्मीद भी भारत को नहीं करनी चाहिए।

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