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जम्मू-कश्मीर को चाहिए एक सख्त प्रशासक ?

कुपवाड़ा में भारतीय सेना

आम चुनाव के बाद बीजेपी दोबारा चुनकर सत्ता में इसलिए आई क्योंकि उसने कई मोर्चों पर सकारात्मक परिणाम देने का वादा किया था। केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में अमित शाह की नियुक्ति से ऐसा संदेश दिया गया कि सरकार घाटी में आतंकवाद और इसे बढ़ावा देने वालों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाएगी। एनआईए तथा अन्य केंद्रीय एजेन्सियों की कार्रवाइयों ने अलगाववादियों को बचाव की मुद्रा में लाकर खड़ा कर दिया है जबकि सुरक्षा बलों ने आतंकियों के खिलाफ अपने अभियान बढ़ा दिए हैं और इस वर्ष सौ से अधिक आतंकियों को मार गिराया है।





सैन्य बलों को होने वाले नुकसान में भी कमी आई है जिससे यह साबित होता है कि सैन्य अभियान स्थानीय निवासियों की सटीक सूचना के साथ चलाया जा रहा है। कश्मीर में ज्यादातर लोग आतंकवाद से त्रस्त हो चुके हैं और अमन-चैन चाहते हैं। यहां तक कि अलगाववादियों द्वारा बंद की अपील की भी लोग अनदेखी कर रहे हैं।

राज्य में चुनावों के सफल संचालन से क्षेत्र में सुरक्षा बलों के नियंत्रण का संकेत मिलता है। घाटी के कुछ हिस्सों में कम मतदान हुआ जैसी कि उम्मीद थी। यहां तक कि हिंसा में भी कमी आई और मतदान अधिकारियों को निशाना बनाने की कोई कोशिश नहीं हुई जैसी कोशिशें बुरहान वानी के खात्मे के बाद लोकसभा के पिछले उपचुनावों के दौरान हुई थी।

केंद्र सरकार एक परिसीमन प्रक्रिया द्वारा जम्मू एवं कश्मीर के विधान सभा चुनाव क्षेत्रों की सीमाओं की रूपरेखा फिर से तैयार करने की कोशिश कर रही है। इससे कम क्षेत्र एवं आबादी के घनत्व के बावजूद राज्य पर घाटी के शिकंजे को दूर करने में मदद मिलेगी। इससे वैसे समुदायों को भी अधिकार प्राप्त होंगे जिनकी दशकों से उपेक्षा की गई है। घाटी स्थित राजनीतिक दल के कुछ नेताओं द्वारा इन कदमों पर आपत्ति जताई गई जिनकी अनदेखी की जा सकती है।

बीजेपी के राजनीतिक वादों में अनुच्छेद 35ए और 370 को हटाना भी शामिल है। अनुच्छेद 35ए राज्य की जनसंख्या सहित प्रत्येक हिसाब से भेदभावपूर्ण है और वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है। इससे घाटी स्थित राजनीतिक दलों के भीतर तनाव बढ़ गया है। उन्होंने हकीकत को नजरअंदाज करते हुए इसका इस्तेमाल हिंसा और नफरत बढ़ाने के एक बहाने के रूप में किया है।

वर्तमान में, घाटी तो नियंत्रण के भीतर आती दिख रही है लेकिन कुछ जगहों पर सुरक्षा एजेन्सियों के खिलाफ पत्थर फेंकने की घटनाओं में इजाफा हुआ है। सोशल मीडिया में ऐसे कई वीडियो दिख रहे हैं जिनमें स्थानीय युवक सुरक्षा बलों के वाहनों पर छलांग लगाते और उन्हें नुकसान पहुंचाने की की कोशिश  करते देखे जा रहे हैं। हालांकि ऐसी घटनाएं केवल कुछ ही स्थानों तक सीमित हैं और मुख्य रूप से मस्जिदों में भड़काने वाले बयानों के बाद घटी हैं फिर भी ये चिंताजनक हैं।

सुरक्षा बल भी खून-खराबे से बचने के लिए इन स्थानों से चुपचाप हटकर चले जाते हुए देखे गए हैं। अलावा इसके  कुलगाम में एक मस्जिद के भीतर हथियारबंद आतंकियों की मौजूदगी भी देखी गई जो नफरत फैलाने वाले बयान दे रहे थे और स्थानीय लोगों पर उनकी मौजूदगी के बारे में सुरक्षा बलों को जानकारी देने का आरोप लगा रहे थे। इन आतंकियों की उपस्थिति बगैर स्थानीय इमाम की मिलीभगत के मुमकिन नहीं थी।

हिंसा में बढ़ोतरी इसलिए देखी जा रही है क्योंकि सुरक्षा बलों ने खासकर  युवाओं के खिलाफ, उनके द्वारा पत्थर फेंके जाने के बावजूद अपना संयम बढ़ाया है और इससे ये युवक ऐसे कदमों के लिए प्रोत्साहित महसूस कर रहे हैं। सुरक्षा बल खूनखराबे से भी बच रहे हैं क्योंकि इससे अधिक से अधिक युवा हथियार का रास्ता पकड़ लेंगे, जिसमें वर्तमान में कमी दिखाई पड़ रही है। बहरहाल, सुरक्षा बलों के इस आत्म संयम से स्थानीय युवकों में डर भी कम होता दिखाई दे रहा है जिससे वे दिन प्रतिदिन अधिक निडर होते जा रहे हैं।

सेना के वाहनों के खिलाफ भी ऐसी ही कार्रवाई की रिपोर्ट है। जाहिर है कि निम्न स्तर पर सेना प्रमुख के निर्देशों में कुछ अंतर है। पत्थर फेंकना भी गोली चलाने के समान ही  एक अपराध है क्योंकि दोनों का ही उद्वेश्य मारना या घायल करना है। इसके अतिरिक्त पत्थर फेंकने वाले ही बाद में आतंकी बन जाते हैं, इसलिए उन पर इसी के अनुरूप विचार किया जाना चाहिए।

जल्द ही अमरनाथ यात्रा आरंभ होगी। इस बीच अनंतनाग में आतंकी हमला हो चुका है। ऐसी कार्रवाई तब यात्रा के सफल संचालन को भी बाधित करेगी और इससे तीर्थयात्री घायल भी होंगे क्योंकि वे निहत्थे होंगे और उनके वाहन भी सुरक्षित नहीं होंगे। इससे पहले एक ऐसी ही घटना हो चुकी है जब तमिलनाडु के एक पर्यटक की उसके वाहन पर फेंके गए पत्थर के कारण मौत हो गई।

सेना प्रमुख ने कहा था कि पत्थरबाजों को आतंकवादी माना जाएगा और उनके साथ वैसा ही बर्ताव किया जाएगा। इसका सख्ती से कार्यान्वयन किया जाना चाहिए। सेना का खौफ घाटी में फिर से दिखना चाहिए। युवाओं को महसूस करना चाहिए कि ऐसे कदम जानलेवा हो सकते हैं और सेना इसका मुंहतोड़ जवाब देगी।

सभी सुरक्षा बलों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने की आवश्यकता है कि पत्थर फेंकने की कोशिशों का कड़ा जवाब दिया जाएगा। उन पर गोली चलाई जानी चाहिए और हताहतों की संख्या पर बाद में ध्यान दिया जाएगा। जो नौजवान ऐसा कर रहे हैं, वे भ्रमित नहीं हैं बल्कि वे एक इरादे के साथ ऐसा कर रहे हैं। सुरक्षा बलों को पूरी ताकत के साथ इसका जवाब देना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

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