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बंद होना चाहिए सेना पर दोषारोपण

भारतीय जवान

हाल में कश्मीर में एक घटना हुई जिसमें सेना की एक प्रशासनिक टुकड़ी पर पत्थर फेंका गया, सेना के वाहनों को जलाने तथा हथियार छीनने और एक जेसीओ को तो लगभग मार ही डालने की कोशिश की गई। इसका नतीजा आत्म रक्षा के लिए सेना द्वारा गोली चलाने के रूप में सामने आया जिसमें दो लोगों की जानें गईं और कुछ लोग घायल हो गए। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने फौरन रक्षा मंत्री को फोन मिलाया और दावा किया कि सेना द्वारा ऐसी कार्रवाईयां उन सकारात्मक परिणामों पर पानी फेर देंगी जो अब तक अर्जित किए गए हैं। इस घटना ने हुर्रियत को बंद की अपील करने के द्वारा एक बार फिर से पहल करने का अवसर दे दिया।





कश्मीर घाटी में 2016 की अशांत और अराजक गर्मियों के बाद से सकारात्मक प्रगति हुई है। अलगाववादियों और पाक प्रायोजित आतंकियों के मंसूबों को, जो बढ़त प्राप्त हो गई थी, उसमें धीरे धीरे कमी आने लगी थी। सुरक्षा बलों की आतंकियों को खत्म करने की रफ्तार ने उन्हें बैकफुट पर धकेल दे दिया था और भागने को मजबूर कर दिया था। भारतीय सेना ने नियंत्रण रेखा पर बढ़त हासिल कर ली। नोटबंदी ने नकली और हवाला करेंसी को घाटी में बेअसर बना दिया जिससे अलगाववादियों की हिंसा को भड़काने की कूव्वत कम हो गई।

एनआईए ने मनी लांड्रिंग और हवाला के कई मामलों का भंडाफोड़ किया नतीजतन कुछ अलगाववादी गिरफ्तार कर लिए गए। उनकी स्वीकारोक्तियों की बदौलत उनके शीर्ष नेतृत्व पर भी गिरफ्तारी की तलवार लटकने लगी है। इस प्रकार, 2017 के आखिर तक, घाटी में हालात सामान्य होने लगे थे और इसने सरकार को एक वार्ताकार या Interlocutor की नियुक्ति करने एवं साथ ही फरवरी के मध्य में पंचायत चुनावों की घोषणा करने में सक्षम बना दिया।

शोपियां जैसी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि अराजक तत्व फिर से सर उठाने लगे हैं और केंद्र एवं राज्य सरकार द्वारा अर्जित की गई प्रगति को पीछे धकेलने के लिए घाटी को फिर से हिंसा की आग में झोंकने की कोशिश में जुट गए हैं। यह कहना मुश्किल है कि वे अलगाववादियों की शह पर काम कर रहे हैं या उनके भीतर छुपे आतंकी तत्व ही लोगों को भड़का रहे हैं। लेकिन सच यही है कि घटनाएं तो होती ही हैं। यह मान लेना कि एक घटना अब तक हासिल की गई प्रगति पर पानी फेर देगी, गलत होगा।

सरकार द्वारा पंचायत चुनावों की घोषणा से पाकिस्तान और अलगाववादी घबरा गए हैं जिसने उन्हें घाटी को फिर से अराजकता की आग में झोंकने और राजनीतिक प्रक्रिया को अवरुद्ध करने के लिए हताशा भरे कदम उठाने को मजबूर कर दिया है। इसके अतिरिक्त, घाटी में शांति उनके मंसूबों के लिए अभिशाप साबित हो सकती है, इसलिए भी उन्होंने हिंसा भड़काने की कोशिशें शुरु कर दीं।

महबूबा मुफ्ती द्वारा जल्दीबाजी में रक्षा मंत्री को शिकायती फोन करना राष्ट्र विरोधी तत्वों को अवसर प्रदान कर सकता है। सभी एजेन्सियों को शामिल कर एक निष्पक्ष जांच ही निर्धारित करेगी कि भीड़ ने अचानक किस वजह से एक प्रशासनिक टुकड़ी पर हमला बोल दिया जो शांतिपूर्वक गुजर रही थी। अगर कहीं कोई गलती थी तो उसे भविष्य के लिए दुरुस्त किया जा सकता था। अगर उकसाया न जाए तो सेना कभी भी गोली नहीं चलाती, उसने आजतक कभी भी बगैर उकसावे के गोली नहीं चलाई है। इसके अतिरिक्त, सेना कभी भी न तो पैलेट गन का या फिर बैटन का ही इस्तेमाल करती है। इसका इस्तेमाल अंतिम उपाय के रूप में किया जाता है।

ऐसी घटनाएं हमेशा होती रहेंगी, खासकर, जब राज्य एक चुनौतीपूर्ण समय से गुजर रहा है। किसी अच्छे शासन की काबिलियत स्थिति पर नियंत्रण करने एवं एक विपरीत हालात को अपने लिए लाभदायक बना लेने में है न कि उन एजेन्सियों पर इल्जाम लगाने में, जो व्यवस्था को बनाये रखने के लिए रोजाना अपने जीवन की आहूति देते हैं। एक घटना को अंतिम उदाहरण नहीं मान लिया जाना चाहिए। ऐसी घटनाओं से कुछ सीमित समय के लिए किसी छोटे क्षेत्र में भले ही माहौल प्रतिकूल हो जाए, लेकिन पूरी घाटी पर इसका असर नहीं पड़ सकता। महबूबा को हालात पर फिर से काबू करने के लिए ठोस कदम उठाने की जरुरत है। उसे पंचायत चुनावों को संपन्न कराने की दिशा में सुनियोजित तरीके से आगे बढ़ना चाहिए और सेना पर दोषारोपण करना बंद करना चाहिए।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

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