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जवानों की सुरक्षा सबसे पहले

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File Photo

पुलवामा आतंकी हमले के बाद जवानों की सुरक्षा पर केंद्र सरकार का यह फैसला कि अब घाटी में तैनात केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के जवान सरकारी खर्च से छुट्टी पर जाने के लिए और छुट्टी से ड्यूटी पर लौटते समय कमर्शियल फ्लाइट का इस्तेमाल कर सकेंगे, बेहद अहम व दूरगामी है| कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों को नित नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है| आतंकी संगठन अपनी रणनीति बदलते रहते हैं| कई बार इस बात का नुकसान ड्यूटी पर जा रहे या ड्यूटी कर रहे जवानों को होता है|





पिछले गुरुवार को पुलवामा में अवंतिपोरा के गोरीपोरा में सड़क मार्ग से गुज़र रहे केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल के काफिले पर जैश-ए-मोहम्मद के एक फिदायीन हमले में 40 जवान की इसलिए शहादत हुई कि उन्हें एयर लिफ्ट नहीं किया गया| अगर हवाई जहाज़ से जवानों को जम्मू से श्रीनगर पहुंचाया गया होता तो वह आज ड्यूटी पर होते| ऐसे में केंद्र सरकार का जवानों को विमान से आवाजाही का फैसला कारगर और उनका मनोबल बढ़ाने वाला है|

ख़ास बात यह भी है कि केंद्र सरकार के इस फैसले से पूरे देश में यह सन्देश जाएगा कि सेना की तरह अर्धसैनिक बलों के जवानों की सुरक्षा भी अहम है| जम्मू-कश्मीर घाटी में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों- सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी, सशस्त्र सीमा बल, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के करीब 90,000 अधिकारी तथा जवान तैनात हैं| और अक्सर ही इनकी आवा-जाही सड़क मार्ग से होती है| आतंकी इस बात को समझ कर अपनी घिनौनी चाल चलते है, हरकतें करते हैं | जम्मू-श्रीनगर मार्ग पर कई ऐसे इलाके हैं जो आतंकियों के निशाने पर रहते हैं | पिछले पांच सालों में इन्ही इलाकों में सुरक्षा बलों पर अधिकांश हमले हुए है जिसमे पिछले सप्ताह हुआ पुलवामा आतंकी हमला भी शामिल है | सड़क मार्ग पर आतंकियों के मुखबिर सक्रिय रहते है | यह सही है की सुरक्षा बल जम्मू-कश्मीर राजमार्ग पर लगातार गश्त करते रहते है लेकिन मौका पाकर आतंकी गोलीबारी या माइंस बिछाकर नुकसान पहुंचने का काम करते है| बीते पांच सालों में इस राजमार्ग पर सुरक्षा बलों पर पांच घातक हमले हो चुके हैं यह चिंता का विषय है| सैन्य बलों और सुरक्षा बलों के जवानों की सुरक्षा हर तरह से सर्वप्रथम इसलिए है कि उन्हीं की बदौलत सरहद या घर के दुश्मनों से नागरिकों की सुरक्षा होती है|

अगर किसी चूक, खामी से उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ती है तो यह यह चिंता का विषय बन जाता है| इस पर किसी तरह की लापरवाही से घटी घटना को देश के नागरिक भूल नहीं पाते|

सशस्त्र बल को जवान कोई सामान्य इंसान नहीं बल्कि वह साक्षात् शौर्य व पराक्रम का पर्याय तथा अनुकरणीय वीरता की प्रतिमूर्ति होते हैं|

चुनौती भरे तथा कठिन परिश्रम के बाद वह बेहद जोखिम भरे माहौल के बीच अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार किए जाते हैं| वे आज कश्मीर घाटी का पूर्वोत्तर राज्यों तथा नक्सल प्रभावित इलाकों में बदली हुई परिस्थिति में ड्यूटी कर रहे हैं| ऐसे में कामकाजी घंटो में व अवकाश को लेकर सीआर पीएफ की यह पहल भी स्वागत योग्य है की यह सशस्त्र बल की तर्ज़ पर चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में तैनात जवानों की छुट्टियां बढ़ाने पर विचार कर रहा है| इससे तनाव, दबाव, तथा खिंचाव कम होता है और जवान अधिक एकाग्रता से ड्यूटी कर पाने में सक्षम होते हैं|

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