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सांसदों की गुजारिश पर खुलीं छावनी की सड़कें

दिल्ली कैंट
दिल्ली कैंट की सड़क (प्रतीकात्मक)

रक्षा मंत्रालय ने मीडिया को जारी एक रिपोर्ट में छावनी (कैंटोनमेंट) की सड़कों को खोले जाने के अपने फैसले को तर्कसंगत ठहराते हुए कहा कि यह फैसला अलग-अलग दलों एवं देश के विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसदों के अनुरोध पर किया गया था। इन सांसदों ने छावनी के आसपास के क्षेत्रों में रहने वाली आबादी की बेहतर और सुगम पहुंच उपलब्ध कराने के लिए कैंटोनमेंट की सड़कें खोलने की गुजारिश की थी।





रक्षा मंत्रालय ने यह कहते हुए अपने फैसले को उचित ठहराया कि जिन सड़कों को खोलने के आदेश दिए गए थे, उन्हें बिना उचित प्रक्रिया और बिना कैंटोनमेंट बोर्ड की मंजूरी प्राप्त किए गए बंद कर दिया था। कैंटोनमेंट की सुरक्षा करना सेना की जिम्मेदारी है, लिहाजा कैंटोनमेंट की सड़कों के लिए सरकार से मंजूरी मांगे जाने का तो सवाल ही नहीं उठता, जैसाकि रक्षा मंत्रालय द्वारा दावा किया जा रहा है।

रक्षा मंत्रालय के बयान में इसका जिक्र तो किया गया कि सेना के परिवारों का एक प्रतिनिधिमंडल ने रक्षा मंत्री से मुलाकात की थी और आशंका जताई थी कि रक्षा मंत्रालय के फैसले से उन सैन्य क्षेत्रों तक आम लोगों की पहुंच आसान हो जाएगी जो पहले प्रतिबंधित थे। इसके अलावा  इस फैसले से खासकर उन सैन्य परिवारों की सुरक्षा के लिए भी खतरा बढ़ जाएगा जिनकी पत्नियां छावनी में अकेले अपने बच्चों के साथ रहती हैं, जबकि उनके पति देश की सीमा या उपद्रवी क्षेत्रों में तैनात रहते हैं। रक्षा मंत्रालय ने इस बैठक की जानकारी तो दी लेकिन इस संबंध में वह आगे क्या कार्रवाई करने वाला है, इसका कोई संकेत नहीं दिया।

छावनी का वजूद आजादी मिलने के पहले से है। छावनी के आसपास जो कॉलोनियां बसीं, उन्हें हमेशा से उम्मीद थी कि उन्हें इस क्षेत्र में प्रवेश हासिल हो जाएगा और यहां से गुजर कर उनकी आवाजाही आसान हो जाएगी। लेकिन जब सुरक्षा से संबंधित खतरे बढ़ने लगे, खासकर सतवारी और सुनजुवां सैन्य शिविरों में हमलों के बाद, जिनमें सैनिकों के परिवारों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया था, तो इसके बाद छावनी में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया जाना शुरू हो गया।

सिविल (आम नागरिक) आबादी ने हमेशा सेना के एकतरफा फैसलों पर आपत्ति जताई और हैदराबाद में तो सेना के खिलाफ अदालतों में भी गुहार लगाई गई थी क्योंकि सिकंदराबाद में वे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। हैदराबाद हाई कोर्ट ने सेना के पक्ष में फैसला सुनाया और अगर सिविल आबादी ने कहीं और भी अदालतों की शरण ली होती तो वहां भी ऐसा ही फैसला हुआ होता। रक्षा मंत्रालय ने अपनी सुविधा के अनुसार इस तथ्य से आंखें फेर ली। उसने अपने तर्कों या औचित्यों में कहीं भी इस तथ्य का जिक्र नहीं किया है।

छावनी की सड़कों को खोले जाने और सभी प्रकार के अवरोधों एवं बाधाओं को हटाने के एकतरफा फैसले ने इन छावनियों को संवेदनशील बना दिया है और उन पर सुरक्षा संबंधित खतरे अब बढ़ गए हैं। इसकी वजह से देश के इतिहास में स्थानीय आबादी एवं सेना के बीच अब तक की सबसे बड़ी खाई पैदा हो गई है। पुणे और दानापुर में भाजपा और सत्ताधारी दल का प्रतिनिधित्व करने वाले एक वर्ग द्वारा समारोह एवं जीत का प्रतीकात्मक जश्न मनाया जाना निंदनीय था।

रक्षा मंत्रालय यहीं नहीं रुका। उसने एक कदम और आगे बढ़ कर एक और निर्देश जारी किया कि इन सड़कों को बंद करने पर आगे के किसी भी फैसले के लिए उससे मंजूरी लेने की जरूरत होगी। इस निर्देश का मतलब यह संदेश देना था कि रक्षा मंत्री अपनी ही सेना के उन जनरलों पर भरोसा नहीं करतीं, जिनके एक आदेश पर सैनिक युद्ध के मैदान में शत्रुओं पर टूट पड़ते हैं, जो जीवन मरण के निर्णय लेते हैं और उन सैनिकों के परिवारों की परवाह करते हैं जो दूर-दराज क्षेत्रों में तैनात हैं। अगर सेना के ऐसे जिम्मेदार जनरल अपनी और अपने परिवारों की सुरक्षा के लिए कुछ सीमित सड़कों को बंद करने का फैसला करते हैं तो रक्षा मंत्री को उन पर यकीन नहीं होता। इसका फैसला अब रक्षा सचिव और रक्षा संपदा के प्रधान निदेशक द्वारा किया जाएगा।

रक्षा मंत्रालय ने खुद पर लगे अरोपों से पल्ला झाड़ने के लिए घोषणा की कि इस मुद्वे पर सेना से भी राय ली गई थी। वास्तविकता, जिसे समझे जाने की जरूरत है, वह यह है कि इस बाबत अगर एक बार फैसला ले लिया गया तो सेना आपत्ति तो जता सकती है लेकिन इसके बाद उसके सामने इस फैसले को अमली जामा पहनाने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं है। आदेशों की अवहेलना करना लोकतांत्रिक मानकों के विरुद्ध माना जाएगा। कोई भी सेना प्रमुख खासकर, जो इन घटनाओं से वाकिफ है, खुले आम ऐसे आदेशों को स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन वह सार्वजनिक रूप से अपनी आपत्तियां भी नहीं जता सकता। इसलिए, ऐसा प्रतीत होता है कि ये दावे मंत्रालय के गलत फैसले को ढंकने के लिए किए जा रहे हैं।

रक्षा मंत्रालय ने एक महीने के बाद इसकी समीक्षा करने की योजना बनाई है। इसके कोई आसार प्रतीत नहीं होते कि रक्षा मंत्रालय इसमें कोई बदलाव करेगा क्योंकि इसने एक हड़बड़ी भरे फैसले से खुद ही अपने हाथ-पांव बांध लिए हैं।

इस प्रकार, सरकार अब मुश्किल हालात में फंस गई है। अगर यह अपने आदेशों को रद्द करती है तो उसे उन लोगों की नाराजगी का सामना करना पड़ेगा, जिनकी मदद करने की उसकी मंशा थी और उसे उनके वोट से भी हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि विपक्षी दल निश्चित रूप से इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से चुनौती देंगे। अगर सरकार अपना फैसला बनाये रखती है तो इससे सैन्य समुदाय के भीतर के फैल रहे आक्रोश में और इजाफा होगा जिनमें मौजूदा सेवारत एवं पूर्व सैनिक दोनों ही शामिल हैं। साथ ही, सरकार को उनके भरोसे और वोट दोनों का नुकसान होगा। विपक्षी दल इसका भी लाभ उठाएंगे जिनसे या तो सैन्य समुदाय के मतों का विभाजन होगा या वे नोटा को वोट देने को बाध्य होंगे जिससे विपक्ष को फायदा पहुंचेगा।

इसके अलावा अगर किसी भी सैन्य केंद्र में कोई एक दुर्घटना, भले ही वह स्थानीय असामाजिक तत्वों द्वारा, खासकर सैनिकों के परिवारों से संबंधित, घट गई तो साल 2019 के आम चुनाव की तैयारी में लगा प्रत्येक विपक्षी सियासी दल खुले आम इसका लाभ उठाएगा। किसी भी सूरत में नुकसान सरकार का ही होना है। वोट बैंक को तुष्ट करने के लिए उठाए गए एक जल्दीबाजी भरे फैसले से सरकार का पांसा पूरी तरह उल्टा पड़ गया है और इस कदम को दुरुस्त करने की उसकी तमाम कोशिशें निष्फल होती प्रतीत हो रही हैं।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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