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बेहद आवश्यक है सैनिकों का यथोचित सम्मान करना: मेजर जनरल हर्ष कक्कड़(से.नि.)

भारतीय सेना के जवान

एक जवान अपने देश की सुरक्षा और हिफाजत के लिए अपने प्राणों की बलि दे देता है। वह अपनी इस अमिट सेवा के बदले देश से और कुछ नहीं चाहता, केवल उचित सम्मान और रुतबा चाहता है। ‘ईश्वर और सैनिक केवल मुसीबतों के समय ही याद आते हैं,’ यह भले ही एक लोकोक्ति भर हो, लेकिन भारत के संदर्भ में यह हमेशा सच साबित हुआ है। बहरहाल, पिछले कुछ समय से जवानों के प्रति सम्मान की दिशा में धीमा, लेकिन एक सकारात्मक बदलाव देखने में आ रहा है, जो संभवतः दुनिया भर से प्राप्त होने वाले रुझानों एवं सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण देखने में आ रहा है।





एयरलाइंसों की अच्छी पहल

सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहे एक वीडियो में दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर संयुक्त राष्ट्र के एक मिशन पर जा रहे यूनिफॉर्म से सुसज्जित जवानों की सराहना और वाहवाही करते यात्रियों को दिखाया गया है। एयरलाइंसों ने अब शहीदों के पार्थिव शरीर की हवाई जहाज में मौजूदगी के बारे में घोषणाएं करनी शुरु कर दी हैं। इंडिगो की एक उड़ान के दौरान, जिसमें मैं भी मौजूद था, हवाई जहाज में उपस्थित सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के बारे में घोषणाएं की गईं जो 37 साल तक सेना और राष्ट्र को अपनी सेवा देने के बाद वापस अपने घरों को लौट रहे थे। यात्रियों द्वारा की जा रही उनकी सराहना और सम्मान एक सुखद और सकारात्मक बदलाव का परिचायक थी।

एनएचएआई का अच्छा कदम

इसी प्रकार, घरेलू उड़ानों में सैन्य पुरस्कार विजेताओं की मौजूदगी की घोषणा का भी अब प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इस सूची में नवीनतम घटनाक्रम के रूप में एनएचएआई द्वारा जारी एक सर्कुलर है जिसमें कहा गया है कि टॉल प्लाजा के कर्मचारी रास्ते से गुजरने वाले सेना के जवानों का अभिवादन करें एवं उनकी हौसला अफजाई करें। यह मुद्दा व्यावहारिकता का भले ही न हो, पर इसमें सम्मान देने की भंगिमा का एक पुट जरूर है। एयरलाइंस वर्दीधारी सैनिकों को विशेष बोर्डिंग उपलब्ध कराते हैं। यह बात दीगर है कि सुरक्षा कारणों से कोई जवान यूनिफॉर्म में यात्रा नहीं करता, जब तक कि उन्हें विशेष सैन्य उड़ानों के लिए न जाना हो।

जवानों का बढ़ता है मनोबल

सम्मान के ऐसे भाव सेना के जवानों के प्रति कृतज्ञता के सूचक हैं। यह एक छोटी भंगिमा हो सकती है, लेकिन इससे उनमें गर्व और सम्मान का भाव पैदा होता है जो महत्वपूर्ण है। इससे उनका मनोबल बढ़ता है। श्रीनगर, लेह, जम्मू एवं उत्तर पूर्व राज्यों जैसे उपद्रवग्रस्त क्षेत्रों से जब जवान अपने घरों के लिए उड़ान भरते हैं तो विशेष बोर्डिंग जैसी छोटी सुविधाओं को सम्मानसूचक भंगिमाओं में तबदील किए जाने का नियम बना दिया जाना चाहिए। भले ही, उस वक्त वे यूनिफॉर्म में न भी हों, तब भी ऐसा किया जाना, उनके प्रति सम्मान का सूचक होगा क्योंकि इससे उनमें ऐसी भावना का संचार होगा कि देश के प्रति उनकी सेवाओं को सम्मानित किया जा रहा है।

सैनिकों को समाज से सकारात्मक प्रतिक्रियाओं की जरूरत

एक राष्ट्र, जो अपने सैनिकों का सम्मान करता है, हमेशा एक गौरवपूर्ण राष्ट्र बना रहेगा। लोकतंत्र में, सेना को सत्ता के गलियारों से दूर रखा जाता है, उन्हें शायद ही किसी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाता है, लेकिन जब कभी राष्ट्रीय गौरव सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर कड़े फैसले लिए जाने की बात हो तो, तो वे हमेशा कार्रवाई की अग्रिम पंक्ति में मुस्तैद खड़े मिलते हैं। डोकलम एवं सर्जिकल स्ट्राइक जैसी हाल की घटनाएं इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इसलिए, सैनिकों को समाज से सकारात्मक प्रतिक्रियाओं की जरूरत है जिससे उन्हें इसका अहसास हो कि वे विशिष्ट हैं और राष्ट्र उनकी कुर्बानियों के लिए उनके प्रति आभार प्रकट करता है।

सरकार दे सभी मंत्रालयों को निर्देश

इसके साथ-साथ सरकार के हर कदम का, जो उनके रुतबे को नीचे करता है, शहीदों की विधवाओं एवं पूर्व सैनिकों की वाजिब मांगों को नजरअंदाज करता है, उनके मनोबल पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। सरकार को निश्चित रूप से सभी मंत्रालयों को निर्देश देना चाहिए कि सैनिकों एवं पूर्व सैनिकों से संबंधित मु़द्दों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार किए जाने की जरुरत है। रक्षा मंत्री को इस बारे में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की जरुरत है क्योंकि मुख्य रूप से उनके मंत्रालय की ही पूर्व सैनिकों एवं शहीदों की विधवाओं की जरुरतों एवं उनके समक्ष आने वाली समस्याओं के प्रति असंवेदनशील बर्ताव से संबंधित हाल में उठाए गए कदमों को लेकर आलोचना की जाती रही है।

पूर्व सैनिकों और वर्तमान सैनिकों का घनिष्ठ रिश्ता

आज का हर सैनिक आने वाले कल का पूर्व सैनिक होगा। पूर्व सैनिक और वर्तमान सैनिकों के बीच एक घनिष्ठ रिश्ता होता है क्योंकि सोशल मीडिया पर वे एक ही पेज पर होते है। जब कोई सैनिक सैन्य विधवाओं एवं पूर्व सैनिकों के प्रति रूखे बर्ताव की खबर सुनता है तो उसे चिंता होने लगती है कि अगर कल वह कर्तव्य की राह पर शहीद हो गया तो क्या देश उसके परिवार की चिंता करेगा? आखिरकार, हर सैनिक भी अपने परिवार से अटूट प्रेम करता है और उसके कल्याण के लिए चिंतित रहता है। अगर ऐसी भावना किसी भी जवान के दिल में आती है तो भारत के लिए यह एक दुखद दिन होगा और इसके लिए राष्ट्रीय नेतृत्व जिम्मेदार होगा।

भारतीय सेना

अपनी कठिनाइयों को भूल सेवा में तत्पर रहते हैं जवान

 

देश में सशस्त्र सेनाएं ही ऐसा संगठन है जिनकी कोई भी यूनियन नहीं है जिसके कारण वे अपनी मांगों को उपयुक्त प्राधिकारी के समक्ष नहीं रख पाते। वे हमेशा चुपचाप और उनके खिलाफ अनथक काम करते हैं जो देश को नुकसान पहुंचाने की साजिश करते हैं। देश के सैनिक अपनी कठिनाईयों की परवाह किए बगैर उन लोगों की सेवा करने में तत्पर रहते हैं, जो किसी भी प्रकार की आपदा से प्रभावित हो जाते हैं।

सेना की आलोचना ही है कुछ लोगों का काम

सेना के इसी सेवा भाव के कारण उन्हें आम भारतीयों से प्रेम और सम्मान प्राप्त होता है जबकि राजनीतिज्ञ और मानवाधिकार कार्यकर्ता जो आरामतलब जीवन गुजारते हैं, उनके कल्याणकारी कदमों में भी नुक्स निकालते रहते हैं। देश में हमेशा से ही ऐसी लॉबी रही है जिनकी रोजीरोटी सशस्त्र सेनाओं की आलोचना करने से ही चलती है। क्योंकि उन्हें पता है कि सेना उनकी टिपण्णियों का कभी भी जवाब नहीं देगी और प्रतिकार नहीं करेगी।

भारत में सरकारों ने कभी भी सेना को उसका उचित सम्मान नहीं दिया है। 1965, 1971 एवं कारगिल युद्ध के समय सशस्त्र सैनिकों ने अपनी शूरवीरता का परिचय दिया और इतिहास बदल कर रख दिया। दुनिया अभी भी उनकी उल्लेखनीय रणनीति और उसे अमल में लाने के कौशल की कायल है और उसका अध्ययन करती है। देश के भीतर, दुश्मनों पर विजय पाने का जश्न बिना किसी धूमधड़ाके के खामोशी से मनाया जाता है। केवल सैनिकों के बीच इन विजयों का महत्व आंका जाता है और यह अवसर इन युद्धों में शहीद हुए जवानों की विधवाओं को सम्मानित करने का भी होता है। इन अवसरों को राष्ट्रीय स्तर पर नजरअंदाज किए जाने से आम देशवासियों को अपनी सशस्त्र सेनाओं के पराक्रम को जानने का अवसर ही प्राप्त नहीं होता। केवल यह सुनिश्चित किए जाने कि इन विजय समारोहों का उत्सव समाज के हर वर्ग में मनाया जाए और देश के सभी लोग उसमें शिरकत करें, सरकार सेना के सम्मान में बढोतरी कर सकती है।

सेना को समुचित सम्मान और सराहना की जगह, पिछले कई वर्षों से सरकारों ने, संभवतः तख्ता पलट की झूठी आशंका, जिसे देश की नौकरशाही बढ़ावा देती है, सशस्त्र सेनाओं के रुतबे और मनोबल को गिराने का काम किया है। इससे सैनिकों में मायूसी पनपी है और नौकरशाही तथा सेना के बीच की दूरियां बढ़ी हैं।

ऐसा केवल भारत में ही हो सकता है कि राजनीतिक पार्टियां सशस्त्र सेनाओं द्वारा अंजाम दिए गए ऑपरेशनों (मिशनों) के आधार पर मतदाताओं से वोट मांगती हैं जबकि उन्हें उनके वाजिब हकों एवं सुविधाएं देने से मुंह चुराती हैं। वे पूर्व सैनिकों की वाजिब मांगों के खिलाफ अदालतों का दरवाजा भी खटखटाती हैं जिससे कि उन्हें ये अधिकार न देना पड़े और इसमें और देरी हो, बजाये इसके कि जल्द से इसकी मंजूरी दे दे। इस प्रकार, सरकारें सैनिकों को उनके यथोचित सम्मान से वंचित रखती हैं जिसके वे हकदार हैं।

बहरहाल, जैसाकि हाल की घटनाओं से प्रदर्शित हुआ है, सैनिकों के प्रति आम भारतीयों के दिलों में सम्मान लगातार बढ़ा है, भले ही सरकार उनकी उपेक्षा क्यों न करती रहे। यह सरकार के लिए यह चेतावनी होगी क्योंकि सैनिकों का अपमान करने से आम लोगों के दिलों में सरकार के प्रति सम्मान की भावना में कमी ही आएगी।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

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