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जेलें बदहाली, बदइंतजामी का शिकार क्यों हैं ?

गाजियाबाद कारागार

देश की जेलों में बढ़ती भीड़ की स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा गहरी चिंता जताना वाजिब है। कोर्ट का इस बात पर भी नाराजगी जताना जायज है कि देश की कुछ जेलों में तो एक सौ पचास प्रतिशत से भी अधिक कैदियों को रखा गया है जो सीधा मानवाधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने देश के सभी उच्च न्यायालयों से ऐसे मामलों को स्वतः संज्ञान लेने का आग्रह किया है।





दरअसल पूरे देश की जेलों में कमोबेश हालत यह है कि तमाम सुधारों, चर्चाओं और यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर दिए गए निर्देशों-आदेशों के बावजूद सुधार नहीं हुआ है। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को यह बात नाराजगी भरे लहजे में कहनी पड़ रही है कि कारागार अधिकारी भी जेलों में बढ़ती भीड़ की समस्या को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। राज्यों को इस मामले में अब पूरी तरह जागरूक तथा संवेदनशील होने की जरूरत है। ताकि जेलों में रह रहे कैदियों की हर स्थिति में सुधार हो सके। आखिर कैदी भी इंसान हैं, जीते-जागते मानव हैं। यह ठीक है कि किसी अपराध की सजा में वे वहां पर कैद हैं। पर हमें, खासतौर से सरकार तथा कारागार प्रशासन को यह जरूर ध्यान रखना होगा कि अगर कैद के दौरान उन्हें एक बेहतर, जिम्मेदार व संवेदनशील नागरिक बनाना चाहते हैं तो उन्हें अमानवीय और बुरी हालत में रखकर उनमें सुधार की अपेक्षा नहीं की जा सकती। संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत जेलों का रख-रखाव तथा प्रबंधन राज्य सरकारों का विषय है। जेल में किसी तरह की अव्यवस्था, खामी, भेदभाव, हिंसा आदि के लिए जेल प्रशासन यानी राज्य सरकार ही जिम्मेदार होती है।

स्थिति यह है कि जेलों में बेहद अमानवीय हालात की वजह से आए दिन कैदियों के मरने-मारने की खबरें आती रहती हैं। आंकड़ें बताते हैं कि वर्ष 2015 में देश में प्रतिदिन औसतन 4 कैदियों की मौत हुई। कुल मिलाकर 1,584 कैदियों की मृत्यु हुई जिनमें 1,469 मौतें स्वाभाविक थीं। बाकी मौतों का कारण अस्वाभाविक था। हालत यह है कि दबाव, तनाव, खिंचाव की मनःस्थिति से जूझ रहे कैदियों को सुरूचिपूर्ण व स्वस्थ वातावरण नहीं मिल पाता। लिहाजा सजा के दौरान उनमें तरह-तरह की बेचैनी रहती है। जो उन्हें सीधे तौर पर मानवाधिकार से वंचित करती है। इसी बात पर टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने की है।

राज्य सरकारों को इस बात पर फिर से सोचने और उस पर तत्काल प्रभाव से काम करने की जरूरत है कि कारागार में कैदियों का जीवन (मन व शरीर के साथ) किस तरह बेहतर बनाया जाए। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने भी आग्रह भरा सुझाव सभी राज्यों के हाईकोर्ट को दिया है कि कारागार बदहाली, बदइंतजामी की जेलें न बनें। इन परिस्थितियों से उबरें। और इसके लिए हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी या हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी की भी मदद ले सकते हैं। निश्चय ही देश की सबसे ऊंची कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन कर, खुले मन से ही काम कर ही जेलों की दशा सुधारी जा सकती है।

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