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बालाकोट की संख्या का ‘सियासी खेल’

बालाकोट पर एयर स्ट्राइक

बालाकोट स्थित आतंकी शिविरों को नष्ट कर देने वाला भारतीय वायुसेना हवाई हमला अब राजनीतिक प्रतिद्वंदिता का सबसे हालिया माध्यम बन गया है। सत्तारूढ़ बीजेपी और विपक्षी दलों द्वारा खेला जा रहा खेल स्ट्राइक में मारे गए आतंकियों की संख्या के इर्द गिर्द घूम रहा है। जहां बीजेपी अपनी संख्या का उल्लेख कर रही है वहीं विपक्ष इसके सबूत की मांग कर रहा है। विपक्ष के कुछ राजनेताओं का तो दावा है कि स्ट्राइक में केवल कुछ पेड़ नष्ट हुए और इसमें कोई भी हताहत नहीं हुआ।





यह स्ट्राइक एक सुदूर घाटी की तराई में हुई जिसमें आतंकी शिविर के अलावा कोई भी मानव बस्ती नहीं थी। इसके आसपास के क्षेत्र में कोई गांव या सैन्य प्रतिष्ठान नहीं था। यही वजह थी कि इस जगह का चुनाव किया गया था। वायु सेना का इरादा बड़े पैमाने पर बर्बादी से बचना था जिससे भारत बैकफुट पर न आ सके। इसके अतिरिक्त  चूंकि यह स्थान कई अवसरों पर पाकिस्तान द्वारा साझा किया गया था, इसलिए वह यह स्वीकार नहीं कर सका कि स्ट्राइक सफल रही और कई आतंकी मारे गए। आखिरकार  आतंकी तो महज माध्यम थे और नए आतंकी फिर से बनाये जा सकते थे।

पाकिस्तान स्ट्राइक के पीछे की सच्चाई को छुपाने की हताशापूर्ण ढंग से कोशिश करता रहा है। उसकी मंशा उस जगह से नावाकिफ प्रेस के कुछ सदस्यों को समीपवर्ती पहाड़ी पर ले जाने और यह बताने की कोशिश करने की थी कि वहां स्ट्राइक करना आसान था। यह एक बड़ी वजह है कि अंतरराष्ट्रीय प्रेस के कुछ लोग पाकिस्तान के बयान को सच मान रहे हैं। अभी तक किसी को भी उस सटीक स्थान पर नहीं ले जाया गया है जिन्हें निशाना बनाने का भारत दावा कर रहा है।

हालांकि  हमारे अपने राजनेताओं द्वारा, जो दूसरे राजनीतिक दलों को झूठा बता कर थोड़े बहुत वोट बटोर लेने की हताशापूर्ण कोशिश कर रहे हैं, स्ट्राइक की प्रभावोत्पादकता पर सवाल उठाने से पाकिस्तान को ही मदद मिल रही है जो उनके बयानों का हवाला दे रहा है। इससे भारतीय जनमानस में भी उसके सशस्त्र बलों की दक्षता को लेकर दुविधा पैदा हो रही है। यहां तक कि पुलवामा में शहीद हुए जवानों के परिवारों ने भी राजनेताओं के ऐसे दावों के आधार पर सबूत मांगना शुरु कर दिया है।

राजनीतिक पार्टियों का दावा है कि वे सशस्त्र बलों का समर्थन करते हैं और उन्हें उनकी क्षमता को लेकर कोई संदेह नहीं है। लेकिन इसी के साथ साथ वे लक्ष्य को नष्ट कर दिए जाने का सबूत भी मांगते है जो उनके पाखंड के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। वे नष्ट कर दिए गए भवनों के बारे में भलीभांति जानते हैं, उन ध्वस्त भवनों की तस्वीरें मीडिया में खुले आम दिख रही हैं लेकिन उनकी संख्या को लेकर सवाल उठाने से ऐसा संकेत मिलता है कि वायु सेना ने बहुत बड़ा जोखिम मोल कर भी केवल खाली और वीरान भवनों को ही नष्ट किया। इसलिए, यह सवाल फिर से उठता है कि क्या वे सशस्त्र बलों के समर्थक हैं या देश की सुरक्षा करने में उसकी सत्यनिष्ठा पर संदेह प्रकट कर रहे हैं।

संख्या महत्वपूर्ण हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती है  लेकिन जो लोग राजनीतिक दलों के नेता और राष्ट्रवादी बनने का दावा कर रहे हैं, वे यह बात भूल रहे हैं कि स्ट्राइक ने उन बहुत सारे पहलुओं को साबित किया जिसे भारत सरकार पिछले कई वर्षों से नजरअंदाज करती रही थी। इसने पाकिस्तान की  न्यूक्लियर धौंस के मिथक को तोड़ दिया जिसकी वजह से कई दशक से सरकारें भारत में होने वाली आतंकी घटनाओं का पाक जाकर उसी की जुबान में जवाब देने से बच रही थीं।

पारंपरिक रूप से  भारत चीख चीख कर अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह मुद्वा रखता रहा है लेकिन उन्होंने केवल बातें भर की, कभी भी इस पर कोई कदम नहीं उठाया। ऐसा पहली बार हुआ है कि सभी ने प्रतिक्रिया जताई है और कहा कि वे मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की भी कोशिश करेंगे जिससे कि भारत की नाराजगी को कम किया जा सके। ऐसा इसलिए है कि अब भारत ने यह संदेश दे दिया है कि अगर ऐसी नौबत आ गई तो वह संघर्ष करने से भी पीछे नहीं हटेगा क्योंकि पाकिस्तान ने आतंकी समूहों को समर्थन देना बंद नहीं किया है। अब भविष्य की सभी सरकारें, भले ही वे किसी भी सियासी दल से क्यों न जुड़ी हों, के पास एक अतिरिक्त विकल्प मौजूद होगा जो अब तक उनके लिए बंद पड़ा था।

क्या हवाई हमले में मारे गए आतंकियों की अधिक संख्या से भारतीय जनता के वोटों में इजाफा हो जाएगा या केवल यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि सरकार ने उचित कार्रवाई करते हुए आतंकियों को मिल रहे पाकिस्तान के समर्थन का माकूल जवाब दिया। क्या मारे गए आतंकियों की संख्या भारत के निवासियों की इच्छा के अनुरूप  बदले की कार्रवाई के स्तर को बढा देगी या यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि भारत ने समय पर जरूरी कार्रवाई की। अगर केवल प्रत्युत्तर भारतीय जनता को संतुष्ट कर सकता है तो क्यों इस मुद्वे को बेवजह उछाला जाए और एक कठिन और चुनौतीपूर्ण परिस्थिति पैदा की जाए।

इस चुनौती से किसी का भला नहीं होगा, न तो देश का और न ही भारतीय वायु सेना का जिसने राष्ट्र के सम्मान के लिए अपने पायलटों का जीवन जोखिम में डाल दिया। इससे केवल पाकिस्तान को उसकी अपनी जनता के सामने सच्चाई को छुपाने में मदद मिलेगी। इससे पश्चिमी देशों की मीडिया को लाभ मिलेगा जो पाक द्वारा दिखाए गए स्थानों की वजह से भारतीय कार्रवाई पर संदेह जता रहा है। इस प्रकार, दुनिया भर में भारतीय दावे को स्वीकार नहीं किया जाएगा। क्या इसके लिए हम केवल अपने विभिन्न दलों के राजनेताओं को छोड़ कर किसी और को दोषी मान सकते हैं जो आगामी चुनावों में वोट पाने के लिए बेचैन हैं?

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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