vishesh

पूर्व सैनिकों के आंदोलन में घुल रहा राजनीतिक रंग

पूर्व सैनिक

जनरल सतबीर सिंह के नेतृत्व में एक रैंक, एक पेंशन (ओआरओपी) पूर्व सैनिक आंदोलन के प्रतिभागियों के मंच को राहुल गांधी द्वारा हाल में साझा किए जाने और इस मंच पर उनके द्वारा दिए गए बयान से एक बार फिर से इस आंदोलन को राजनीतिक रंग दिए जाने का मुद्दा गरमा गया है। इस मुद्दे को अब तक बहुसंख्यक पूर्व सैनिकों द्वारा इसीलिए समर्थन दिया जाता रहा है क्योंकि यह अराजनीतिक रहा है अर्थात इसने किसी भी धारा या पंथ की राजनीति से उचित दूरी बनाये रखी है। जनरल सतबीर सिंह एवं पूर्व सैनिकों का उनका छोटा सा समूह 2011 में कोशियारी समिति द्वारा की गई अनुशंसाओं के अनुरूप ओआरओपी की मंजूरी के लिए लगातार और अनथक प्रयास करता रहा है।





वर्तमान ओआरओपी को सरकार द्वारा मंजूरी प्रदान कराने का श्रेय जनरल सतबीर सिंह को ही जाता है। 2013 में रेवाड़ी में प्रधानमंत्री मोदी द्वारा किए गए वायदे के बावजूद इस आंदोलन में कोई सुगबुगाहट नहीं दिख रही थी, जब तक कि आंदोलन ने गति नहीं पकड़ी। 2015 में स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर पुलिस द्वारा वरिष्ठ पूर्व सैनिकों के साथ किए गए दुर्व्यवहार एवं काफी परिश्रम से अर्जित उनके बेशकीमती फीतों को फाड़े जाने की खबरें राष्ट्रीय समाचार पत्रों में सुर्खियां बनीं और पुलिस को माफी मांगने पर मजबूर होना पड़ा। इस घटना तथा जंतर मंतर पर आयोजित रैलियों में भारी भीड़ ने सरकार को कदम उठाने पर विवश कर दिया और उसने ओआरओपी के कुछ रूपों की घोषणा की।

ओआरओपी की आरंभिक मंजूरी के बाद से, अधिकांश प्रतिभागियों ने खुद को आंदोलन से दूर कर लिया, कुछ प्राप्त राशि और सुविधाओं से संतुष्ट है। कोर ग्रुप अभी भी असंतुष्ट है और आंदोलन से जुड़ा हुआ है। कई पूर्व सैनिकों ने अनुदान को ही विजय मान लिया जबकि कोर ग्रुप के अनुसार यह ‘एक रैंक, पांच पेंशन‘ था। वे तभी से सही आवंटन के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

कोर ग्रुप ने अब आंदोलन के अपने दायरे को विस्तारित कर लिया है जिसे पदावनति व अन्य बुराइयों को भी शामिल किया जा सके जो अब सशस्त्र बलों को पीड़ा पहुंचा रही हैं। कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी में अपने संबोधन के दौरान जनरल सतबीर सिंह ने कहा कि उन्होंने ओआरओपी से संबंधित प्रमुख मुद्दों के समाधान के लिए कदम उठाने तथा सशस्त्र बलों के दर्जें को बहाल करने के लिए मुख्य विपक्षी दल से सहायता मांगी है जिससे कि सरकार पर दबाव डाला जा सके।

अन्य सभी दलों की तरह कांग्रेस ने वादा किया कि अगर वे सत्ता में आए तो वे इसे कार्यान्वित करेंगे लेकिन उन्होंने इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 1973 में 70 प्रतिशत के प्रारंभिक पेंशन को घटाने के बाद, जब उन्होंने ओआरओपी का वायदा किया था, कांग्रेस ने साढ़े चार दशक तक कुछ भी नहीं किया।

कांग्रेस ने उसी मंच का इस्तेमाल राफेल सौदे पर सरकार की आलोचना के लिए किया क्योंकि वह इस मुद्दे पर वायु सेना के पूर्व सैनिकों का समर्थन पाने के लिए हताश थी। संभवतः यह एक प्रकार का सौदा था कि आप राफेल सौदे की आलोचना में हमारा साथ दो और अगर हम सत्ता में आए तो हम आपके दुखों पर गौर करेंगे। वर्तमान सरकार का कार्यकाल खत्म होने वाला है। 2019 में सत्ता में कौन काबिज होगा, अभी से कहना मुश्किल है। यह आंदोलन वर्षों से चल रहा है पर सरकार ने कोई भी कदम नहीं उठाया है जबकि उसने बहुत धूमधाम से लगभग दो वर्ष पहले रेड्डी समिति द्वारा जारी रिपोर्ट को स्वीकार भी किया था।

पिछले चार दशक से ज्यादा समय में किसी भी सरकार ने सशस्त्र बल समुदाय के सदस्यों द्वारा बार-बार अपील किए जाने के बावजूद ओआरओपी की अवधारणा को भी स्वीकार नहीं किया है। हकीकत यह है कि एक अनुशासित, अराजनीतिक और सुर्खियों से दूर रहने वाले सशस्त्र बल का हमेशा ही राजनीतिक दलों द्वारा वोट पाने के लिए इस्तेमाल किया गया है और चुनावों के तत्काल बाद उनकी उपेक्षा कर दी गई है। पूर्व सैनिकों के किसी भी संगठन को उन्हें एक भरोसेमंद वोट बैंक में सूत्रबद्ध कर पाने में सफलता नहीं मिली है जिसे एक समुदाय के रूप में कोई लाभ हासिल हो सके और जो राजनीतिज्ञों को कदम उठाने के लिए मजबूर कर सके।

पूर्व सैनिक अभी भी पूरी तरह सेना के अराजनीतिक रुख में ही यकीन करते हैं जैसाकि अभी तक सेना का चरित्र रहा है और एक समुदाय के रूप में वे किसी भी एक पार्टी का समर्थन करने के अनिच्छुक रहे हैं। यहां तक कि गुजरात चुनावों के दौरान जनरल सतबीर सिंह की कांग्रेस मंच पर मौजूदगी को भी अधिकांश पूर्व सैनिकों द्वारा बेहद गलत माना गया था। मंच साझा करने के वर्तमान दृष्टांत का भी ऐसा ही प्रभाव पड़ा।

जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आते जाएंगे, राजनीतिक दलों द्वारा पूर्व सैनिक समुदाय को लुभाने की कोशिशें बढ़ती जाएंगी क्योंकि वे किसी भी बहाने से और कितने भी चुनावी वायदे करने के जरिये उनका वोट हासिल करने का प्रयास करेंगे।

जैसाकि भारतीय चुनाव के इतिहास ने प्रदर्शित किया है, अधिकांश वायदों को कभी भी पूरा नहीं किया जाएगा। दिग्गज राजनीतिज्ञों ने कहा है कि केवल 20 प्रतिशत वायदे ही पूरे किए जाते हैं, शेष को चुपचाप नजरअंदाज कर दिया जाता है। जैसे ही चुनाव संपन्न हो जाते हैं प्राथमिकताएं बदल जाती हैं और जो निर्णयों को कभी नहीं प्रभावित करते, उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है।

जनरल सतबीर सिंह ने कांग्रेस का समर्थन चाहने के जरिये अधिकांश पूर्व सैनिकों का विश्वास खो दिया है जो कांग्रेस को दोनों खलनायकों के बीच ज्यादा बड़ा विलेन मानता है क्योंकि उसने अपने हर कार्यकाल के दौरान, जब वह सत्ता में थी, सशस्त्र बलों की अनदेखी की। सशस्त्र बलों की वर्तमान निम्न क्षमता स्थिति यूपीए के 10 वर्ष के शासन का तोहफा है। इसलिए, भविष्य में अगर जनरल सतबीर बड़े स्तर पर आंदोलन की कोई अपील करते हैं तो तो शायद उन्हें कम ही समर्थक प्राप्त होंगे।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

 

Comments

Most Popular

To Top