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भारत से अब क्यों डरने लगा है पाकिस्तान?

इमरान खान

पाकिस्तान की सेना ने 26 मई को उत्तर वजीरिस्तान में पश्तून तहाफुज मूवमेंट (पीटीएम) के निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाईं। पाक की सेना ने आरंभ में एक बयान जारी किया कि प्रदर्शनकारियों ने उनके चेक पोस्ट पर हमला किया और सेना को आत्म-रक्षा में गोलियां चलानी पड़ीं। उसने तीन लोगों के हताहत होने की घोषणा की जो और अधिक लोगों के मरने के बाद अब बढ़ कर 13 तक पहुंच गई है।
पाक नेशनल असेंबली के दो पीटीएम सदस्यों पर हमले का आरोप लगाया गया है और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है। विपक्ष द्वारा उन्हें असेंबली के समक्ष प्रस्तुत करने की मांगों के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। जाहिर है कि सेना ने अपनी मनमानी की है और वह सच्चाई को बाहर नहीं आने देना चाह रही है।





मानवाधिकार आयोग और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस घटना का संज्ञान लिया है और स्वतंत्र जांच की मांग की है। पाक सेना इन मांगों को ठुकरा देगी। अपने विचारों के समर्थन में पाक सेना ने कहा है कि उसके पांच जवान घायल ( वे कितने चोटिल हैं, इसका खुलासा नहीं किया गया है) हुए हैं और उसने आरोप लगाया है कि पीटीएम को भारतीय रॉ और अफगान एनडीएस द्वारा वित्तपोषित किया जा रहा है। अफगानिस्तान, जहां पश्तूनों की एक बड़ी आबादी है, ने इस आंदोलन के साथ एकजुटता प्रदर्शित की है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से समर्थन की मांग की है।
पीटीएम पिछले डेढ़ साल के दौरान मौलिक अधिकारों की मांग करने वाले एक शांतिपूर्ण संघर्ष के रूप में विकसित हुआ है। कुछ सप्ताह पहले ही पाक डीजी आईएसपीआर ने खुलेआम आ आंदोेलन को धमकी दी थी और इसके नेताओं को इससे दूर रहने की चेतावनी जारी की थी। यह सब तब हो रहा है जब पढ़े लिखे और परिपक्व राजनेता इसका राजनीतिक समाधान ढूंढने कर कोशिश में हैं और आंदोलन के नेताओं के साथ बातचीत के रास्ते खोलने की कोशिश कर रहे हैं।

पाक के पश्चिमी सीमा के आसपास पीटीएम की लोकप्रियता ने सुरक्षा खतरों को बढ़ा दिया है और उनकी गतिविधियों को उजागर न होने देने के लिए सेना द्वारा मीडिया ब्लैकआउट करने पर मजबूर कर दिया है। इस वजह से पाक की जनता इस आंदोलन के प्रसार और सेना की एकतरफा कार्रवाईयों से देश को पहुंचने वाले नुकसान को लेकर नावाकिफ है। इसके साथ-साथ बलूच मुक्ति सेना (बीएलए) बलूचिस्तान में अपनी ताकत और पहुंच बढ़ा रही है। पिछले वर्ष नवंबर में चीनी दूतावास पर, अप्रैल में ग्वादर के निकट एक बस पर एवं मई में ग्वादर में पर्ल कांटिनेंटल होटल पर इसके हमले इसकी बढ़ती पहुंच के संकेत हैं। यह आंदोलन मजबूत हो गया है क्योंकि सीपीईसी इस क्षेत्र में विस्तारित होने और राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करने की कोशिश कर रहा है।

बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे कम आबादी वाला राज्य है जिसका आजादी के बाद कभी भी पाक में विलय नहीं हुआ लेकिन पाक ने बलपूर्वक इस पर कब्जा कर लिया। प्राकृतिक संसाधनों के लिहाज से यह समृद्ध है जिसका दोहन किया गया है जबकि इसके विकास की अनदेखी की गई है। ग्वादर पर चीन के कब्जे पर उसकी आपत्ति जाहिर है क्योंकि ज्यादातर हमले इसी क्षेत्र में केंद्रित रहे हैं।
बलूच स्वतंत्रता संग्राम का उदय पाक सेना के शोषणवादी दृष्टिकोण और उसके संसाधनों के अंधाधुंध दोहन का भी परिणाम है। बीएलए की गतिविधियों को लेकर भी मीडिया का गला घोंट दिया गया है।
अभी हाल तक पाक अपनी पश्चिमी सीमाओं को लेकर चिंतित नहीं रहा था। उसका मानना था कि यह क्षेत्र भारत की पहुंच के बाहर पूरी तरह उसके कब्जे में है और इसलिए वह निर्ममतापूर्वक यहां हर प्रकार की गतिविधि को कुचल रहा था। वे इस क्षेत्र का इस्तेमाल अफगान तालिबानों के लिए आतंकी ठिकानों एवं प्रशिक्षण सुविधाओं के लिए कर रहे थे जिससे कि अफगानिस्तान में हमले किए जा सके। इस कदम ने स्थानीय लोगां को विस्थापित कर दिया और उन्हें तालिबान के वशीभूत कर दिया। अब उनमें नाराजगी भर गई है और वे उठ खड़े हुए हैं।

पाक सेना का मौजूदा कदम कई तरह से साल 1971 में देश के हुए विभाजन का दुहराव है जब उसने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में बंगालियों के खिलाफ इसी प्रकार की कार्रवाई की थी। इसकी वजह से 1971 का युद्ध हुआ और बांग्लादेश का निर्माण हुआ। इसने इस तथ्य की अनदेखी कर दी है कि जैसाकि 1971 में हुआ आंदोलन सेना, जिसे देश का सबसे ताकतवर हिस्सा माना जाता है, द्वारा मुद्दों को गलत तरीके से निपटाने के कारण पैदा हुआ।

पाक सेना के अहंकार के साथ इन दोनों आंदोलनों को मिलाने से जल्द ही देश अंदरुनी तरीके से बंट जाएगा, जिसे बाहर से सीमित सहायता प्राप्त होगी। भारत के साथ जारी तनाव  तथा इन आंदोलनों की बढ़ती ताकत के कारण पाकिस्तान इसे लेकर बहुत ज्यादा आशंकित है। हताशा में वह भारत के साथ बातचीत करने की मांग करने लगा है। उसे सबसे अधिक डर इस बात का है कि भारत और अफगानिस्तान पाक द्वारा आतंकी समूहों को समर्थन दिए जाने के प्रत्युत्तर में इन आंदोलनों की सहायता करना शुरू कर सकते हैं।

वास्तविकता यह है कि भारत को ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। इन क्षेत्रों में पाक सेना के खिलाफ गुस्सा बिल्कुल चरम पर पहुंच चुका है। भारत को करना यह चाहिए कि वह पाक की सीमा पर दबाव बनाये रखे, उसे अपनी सैन्य टुकड़ियों को पश्चिमी सीमा को भेजे जाने की स्थिति से रोके और मानवाधिकार उल्लंघन के मामलों को उठाने सहित राजनयिक समर्थन देता रहे और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाए। इसी कदम से एक देश के रूप में पाक का वजूद खतरे में पड़ सकता है और उसे शांति और बातचीत करने की मांग करने सहित अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाने को मजबूर कर सकता है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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