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पाकिस्तान पर रखना होगा लगातार दबाव

पाक पीएम इमरान खान

पाकिस्तान की कथनी और करनी की चाल एक बार फिर यह बता रही है कि वह अपनी पैंतरेबाजियों से बाज नहीं आया है। पाकिस्तानी सेना ने दावा किया है कि जैश-ए-मोहम्मद आतंकी गुट का पाकिस्तान की जमीन पर कोई वजूद नहीं है। जबकि पाकिस्तान के विदेश मंत्री मान चुके हैं कि जैश का सरगना मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान में मौजूद है। पाकिस्तानी सेना और पाकिस्तान के जिम्मेदार मंत्री के अलग-अलग बयानों से यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि उसकी चालबाजियां और पैंतरेबाजियां जारी हैं तथा वह पुलवामा आंतकी हमले के बाद भारतीय वायुसेना द्वारा बालाकोट में की गई सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी बाज नहीं आया है। यह सही है कि पाकिस्तान की ऐसी पैंतरेबाजी भारत के लिए कोई पहली और अंतिम नहीं है लेकिन जरूरी यह है कि भारत उस पर लगातार दबाव बनाकर रखे।





वैसे भी पाकिस्तान के लिए दोमुंही नीति पर चलना कोई नई बात नहीं है। उसका चरित्र और व्यवहार ही यह बताता है कि वह इस नीति को ढाल के रूप में इस्तेमाल करता है। एक ओर बालाकोट की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद घबराया पाकिस्तान पूरी दुनिया के सामने शांति की भावना के साथ आगे बढ़ने की बात करता है और दूसरी ओर संर्घष विराम का उल्लंघन कर नियंत्रण रेखा पर नागरिकों को निशाना बनाकर गोली दागता है। उसकी यह हरकत आज भी जारी है। पूरे विश्व समुदाय को पाकिस्तान से पूछना चाहिए कि वह आखिर शांति कायम करने की पहल का चोला ओढ़कर क्यों गोलीबारी करता है ? यह तो हुई सीमापार से दागी जाने वाली गोलियों तथा मोर्टार गोलों की बात। जम्मू-कश्मीर घाटी में युद्ध जैसा छद्म युद्ध भी उसी की देन है। पूरी दुनिया अब इस बात को समझ चुकी है कि आतंक की फसल पाकिस्तान की जमीन पर उगाई जाती है और जिसका असर सीमा के इस पार भारत में भी पड़ता है। घाटी में 1989-90 से पाकिस्तान की ओर से थोपा गया प्रॉक्सी वार आज भी जारी है। कहा भी जा सकता है कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर खाद्यान की फसलें कम, आतंक की पौध ज्यादा उगाता है। पाकिस्तान की इस नापाक हरकत से भारत भलीभांति परिचित है। लिहाजा पूरे विकल्पों के साथ पाकिस्तान की आंख में आंख डालकर पूरे अक्रामक ढंग से उसे उसी की भाषा में जवाब देना समय की जरूरत है। उसके द्वारा किए गए किसी भी वार का एक मात्र विकल्प है पलटवार। पुलवामा के बाद बालाकोट में की गई भारतीय वायुसेना की कार्रवाई इसका ताजा उदाहरण है। खास बात यह कि सधे कदमों के साथ उस पर ऐसा अक्रामक हमला हो कि वह दोबारा खड़े होने की जुर्रत न कर सके। 1971 का युद्ध और 1999 का करगिल युद्ध इस बात का सुबूत है।

यह सही है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच अघोषित शांति है लेकिन भारत की लगातार कोशिश रहनी चाहिए कि पाकिस्तान से दबाव से उबरने न पाए। कूटनीति का एक नियम है कि शांति के लिए युद्ध चाहिए। यह नियम हमेशा लागू होता है। आज भी यह नियम दोनों देशों के बीच पनपे तनाव बीच पूरी तरह सही बैठता है। पड़ोसी देश को इस बात का हमेशा एहसास होना चाहिए कि कभी भी चौतरफा हमला कर उसे नाकों चने चबवा सकता है। भारत के पास तो सैन्य कार्रवाई के अलावा ऐसे कई विकल्प हैं जो पाकिस्तान को कठोर सबक सिखाने के लिए पर्याप्त है। राजनयिक व आर्थिक विकल्प को लागू कर पड़ोसी देश की कमर तोड़ी जा सकती है। इस बात को पाकिस्तान भी अच्छी तरह से जानता है। वह यह भी जानता है कि यह नया भारत है और बालाकोट जैसी कार्रवाई उसके घर में घुस कर कभी भी कर सकता है। फिर भी पाकिस्तान की नापाक हरकतों व पैंतरेबाजियों के बीच भारत को उसे स्पष्ट संदेश देकर दबाव में रखने की जरूरत है।

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