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हर्ष कक्कड़ का ब्लॉग: CPEC पर पाक-चीन टकराव पूरे उपमहाद्वीप को खतरे में डाल सकता है

ग्वादर-बंदरगाह

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि पाकिस्तान ने अपना सारा दांव एक ही जगह अर्थात  चीन और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) पर लगा रखा है। डीप स्टेट यानी कुछ बेहद प्रभावशाली लोगों, सेना एवं आईएसआई से निर्मित्त समूह की नीति आतंकी समूहों को समर्थन देने, आंतरिक मतभेदों में इजाफा करने और असुरक्षा की भावना बढ़ाने की रही है और यही वजह है कि विश्व के अन्य देश अपनी विकास यात्रा में पाकिस्तान को नजरअंदाज करते रहे हैं जिसका नतीजा इस देश के कर्ज के विशाल दलदल में फंस जाने के रूप में सामने आया है। पाकिस्तानी समाज के सभी वर्गों के बयान केवल उन लाभों से संबंधित आते रहे हैं जो उन्हें सीपीईसी से प्राप्त हो सकते हैं।





हालांकि सीपीईसी को बेपनाह आंतरिक समर्थन हासिल है लेकिन उसकी वास्तविक कीमत, उससे जुड़ने की शर्तें एवं पुनर्भुगतान के तरीके को अभी तक परदे में रखा गया है। पाकिस्तान से प्राप्त सीमित आधिकारिक जानकारियों के अनुसार, ग्वादर बंदरगाह चीन को सुपुर्द कर दिया गया है जिसकी 91 प्रतिशत आमदनी अगले 40 वर्षों तक चीन को मिलती रहेगी। इस प्रकार, पाकिस्तान श्रीलंका से भी इस मायने में आगे निकल चुका है जिसे हम्बनटोटा बंदरगाह को 99 वर्षों के लिए चीन को लीज पर सुपुर्द करना पड़ा क्योंकि वह ऋण का पुनर्भुगतान करने में असमर्थ है। पाकिस्तान ने पहले ही ग्वादर को 40 वर्षों के लिए सुपुर्द कर दिया है जबकि सीपीईसी की अन्य लागतों की घोषणा की जानी अभी बाकी है। इस फैसले का पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पर ऐसा विनाशकारी प्रभाव पड़ सकता है जिससे पाकिस्तान का और भी बहुत कुछ दांव पर लग सकता है।

इसका अर्थ यह हुआ कि एक देश के रूप में यह न केवल वर्तमान में बल्कि संभवतः आने वाली कई पीढि़यों तक चीन के कर्ज के बोझ तले दबा रहेगा। सीपीईसी पर काम लगभग बंद ही हो गया जब चीन ने बदलती आंतरिक असुरक्षाओं के आधार पर अपनी फंडिंग की शर्तों का फिर से मूल्यांकन किया। यह अंतरराष्ट्रीय रूप से ज्ञात तथ्य है कि चीन की ब्याज दरें अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेन्सियों समेत ज्यादातर देशों की ब्याज दरों से ऊंची हैं। यही वजह है कि जो देश चीन से कर्ज लेते हैं, उन्हें अंततोगत्वा चीन का मातहत देश ही बन जाता पड़ता है। जिम्बाब्वे इसका एक बड़ा उदाहरण है। भारत ने अपने सभी निकटवर्ती पड़ोसी देशों को इस स्थिति में फंसने को लेकर पहले ही आगाह कर दिया था और ज्यादातर देशों ने भारत की नसीहत का सम्मान भी किया।

पाकिस्तान के मामले में, चीन की फंडिंग उन देशों की तुलना में बहुत अधिक है जहां चीन ने निवेश कर रखा है। चीन ने पाकिस्तान में लगभग छयालीस अरब डॉलर के निवेश का वचन दे रखा है और वहां अभी बहुत सारा निवेश होना बाकी है। ताज्जुब है कि इतना अधिक निवेश उस देश में किया जा रहा है जहां अस्थिरता दिन प्रतिदिन बढ़ रही है। अभी हाल में इस्लामाबाद में मजहबी समूहों के एक अधिवेशन में हाफिज सईद को अपना खुद का एक सियासी दल बनाने के लिए प्रेरित किए जाने, मुख्यधारा की सियासी पार्टियों को नजरअंदाज किए जाने, टीटीपी द्वारा वर्तमान में जारी आतंकी हमले तथा बलूच की आजादी के आंदोलन से यही संकेत मिलता है कि पाकिस्तान का भविष्य अभी और अस्थिर होगा। अगर इन दलों को अगला चुनाव लड़ने की इजाजत दी गई तो इससे समस्याएं और बढ़ेंगी। चीन के लिए निवेश वह धन है जिसे गंवाना वह कतई गवारा नहीं करेगा।

इन अनिश्चितताओं में इस बात से भी बढोतरी हुई है कि सीपीईसी एक विवादित क्षेत्र से होकर गुजर रहा है। भारत ने ओबीओआर परियोजना में शामिल होने से इंकार कर दिया। भारत जैसी एक बढ़ती आर्थिक और सैन्य शक्ति, जिसका पूरे उप महाद्वीप में बेशुमार प्रभाव है, के इसमें शामिल न होने से परियोजना की वित्तीय व्यावहार्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना लाजिमी है। चीन ने भारत को इसमें शामिल करने के लिए आकर्षित करने के लिए कई तरकीबें आजमाईं जिसे भारत ने विफल कर दिया। इस प्रकार, भविष्य में भारत-पाक संघर्ष से इस पूरी परियोजना पर असर पड़ सकता है जो चीन को कतई गवारा नहीं होगा। चीन ने पूर्ण रूप से नहीं भी तो आंशिक रूप से इस अनिश्चितता का जरूर अनुमान लगाया होगा। उसने अपने निवेश के प्रभाव का पुनर्मूल्यांकन किया और घोषणा की कि वह अपनी फंडिंग जारी रखने को इच्छुक है बशर्ते कि पाकिस्तान की सेना इस परियोजना को अपने हाथ में ले ले। इस प्रकार, उसने राजनीति पर सेना के प्रभुत्व का समर्थन किया। सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पीएलए की मजबूत उपस्थिति के साथ-साथ पाकिस्तान के पास चीन की बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था, क्योंकि चीन ने पहले ही भारी मात्रा में निवेश कर रखा है। पीएलए की सेनाएं पहले ही सिंध, पीओके में एवं सीपीईसी के साथ-साथ दिखने लगी हैं जो भारत की सुरक्षा के लिए निश्चित रूप से चिंता का एक बड़ा कारण बन सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, गलियारे की सुरक्षा करने में सक्षम एकमात्र बल, पाक की सशस्त्र सेनाओं को प्रेरित करने के अतिरिक्त, चीन की कोशिश यह भी होगी कि फंडिंग एवं सुदृढ़ीकरण के अतिरिक्त पाक की सेना सुरक्षा उद्देश्यों के लिए भी उसके साथ मिल कर काम करे। चीन यह सुनिश्चित करना चाहेगा कि पाकिस्तान की सेना इतनी मजबूत हो कि वह भारत द्वारा गलियारे की सुरक्षा पर किसी प्रकार का खतरा न उत्पन्न होने दे और ऐसे किसी संभावित हमले का प्रतिकार कर सके। इसके अतिरिक्त, अगर भारत-पाक में किसी प्रकार की संघर्ष की स्थिति पैदा होती भी है तो उसके पास अपने निवेशों की रक्षा करने के लिए सीमित मात्रा मे विकल्प जरुर मौजूद हों।

सीमाओं का मतलब केवल दो विकल्प हैं, पाक की मदद या तो आक्रामक तरीके से करना या फिर शांतिपूर्ण माहौल के जरिये। भारत ने पाक द्वारा उकसाए जाने के बावजूद वर्तमान में बेहद संयम का परिचय दिया है। इसलिए, अगर पाक को नियंत्रित करने के अन्य सारे विकल्प विफल हो जाएंगे तो भारत केवल आक्रामक विकल्प पर विचार करेगा। प्रत्येक अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान का नाम लेने एवं उसे जलील करने के साथ-साथ भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से पाकिस्तान को समझाने की भी लगातार अपील की है लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला है।

इसलिए, देश के भीतर बड़े आतंकी हमले की सूरत में भारत के पास सीमित पारंपरिक हमला आरंभ करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं बचेगा जिससे तनाव में और बढ़ोतरी ही होगी। चीन की मदद का भरोसा पाक को नाभिकीय स्तर तक पहुंचने से रोक सकता है।

चीन को हर कीमत पर अपने निवेश की रक्षा करनी होगी क्योंकि उस पर  किसी भी प्रकार का खतरा होने पर शी जिनपिंग की स्थिरता खतरे में आ जाएगी। ऐसी स्थिति में उसके पास पाक की मदद करने के लिए अपनी सेना तैनात करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं बचेगा। इसका उद्देश्य भारत को अपने बलों एवं संसाधनों को एक मोर्चे से दूसरे मोर्चे पर स्थानांतरित करने से रोकना होगा। अगर भारत चीन के रवैये का प्रतिकार करता है तो चीन भारत की भूमि पर एक सीमित आक्रमण तक कर सकता है।

डीप स्टेट यानी पाकिस्तान के कुछ बेहद प्रभावशाली लोगों, सेना एवं आईएसआई से निर्मित्त गठजोड़ लगातार स्व-विध्वंस की राह पर आगे बढ़ता जा रहा है। इसने मुख्यधारा की सियासी पार्टियों को बैकफुट पर लाने तथा देश पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए खुलेआम धार्मिक और कट्टरपंथी समूहों को समर्थन देने के जरिये अपनी आंतरिक राजनीतिक स्थिति को अस्थिर बना लिया है। अगर इन समूहों का देश पर नियंत्रण हो गया और वे प्रतिबंधों से मुक्त हो गए तो वे भारत में अपनी आतंकी गतिविधियां तेज कर देंगे जिससे भारत को भी मजबूरन जवाब देने को विवश होना पड़ेगा।

चीन, जिसने इस परियोजना पर बहुत बड़ी राशि का निवेश किया है, वह चुपचाप नहीं बैठेगा एवं अपने निवेशों को डूबने नहीं देगा। उसे कदम उठाने को मजबूर होना पड़ेगा। इसलिए, भारत को संभवतः दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी होगी जिसकी एकमात्र वजह डीप स्टेट के हथकंडे होगी। इसलिए, हमारी सेनाओं के प्रमुख अगर यह दावा करते हैं कि भारत को ‘दो मोर्चों पर लड़ाई‘ लड़ने के लिए तैयार रहने की जरुरत है तो वे बिल्कुल सही कहते हैं।

मुख्य रूप से चीनी निवेश को सुनिश्चित बनाने के लिए निकट भविष्य में पाकिस्तान-चीन सांठगांठ की बहुत अधिक संभावना है। भारत सरकार को यह समझने की जरुरत है कि वह रक्षा तैयारियों को नजरअंदाज नहीं कर सकती, इसलिए उसे निश्चित रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जितनी जल्दी हो सके, वह दो मोर्चों पर आक्रमण झेलने की क्षमता सृजित कर ले।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

 

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