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रक्षा बजट का अधिकतम उपयोग करने की जरूरत

राजपथ पर ब्रह्मोस

लोकसभा में पेश किए गए बजट में प्रभारी वित मंत्री ने रक्षा क्षेत्र के लिए 3.18 लाख करोड़ रुपये की घोषणा की जो पिछले वर्ष की तुलना में मामूली रूप से 3 फीसदी अधिक है। प्रतिशत के लिहाज से जीडीपी के 1.5 प्रतिशत का यह हिस्सा पिछले वर्ष की तुलना में भी कम है जो 1.6 प्रतिशत था। यह मामूली बढोतरी वार्षिक महंगाई को भी बमुश्किल से कवर करेगी जो वर्तमान में 3.6 प्रतिशत पर आंकी जाती है। इस बजट ने पूंजीगत व्यय में 10 प्रतिशत की बढोतरी की है जिसका उद्वेश्य हार्डवेयर की खरीद करना और बुनियादी ढांचे का निर्माण करना है। प्रभारी वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त निधि उपलब्ध कराई जाएगी। यह एक फौरी और रस्मी बयान है। पिछले वर्षों की तरह यह आवंटन भी आवश्यकता की तुलना में कम है।





जब आम चुनाव करीब है तो सरकार की प्राथमिकता निश्चित रूप से आम लोगों को लुभाने की है। सरकार इससे वाकिफ है कि सशस्त्र बलों के लिए भले ही फंड कम है लेकिन वे सरकार को कभी भी नीचा नहीं दिखाएंगे। जो हथियार उनके पास हैं उन्हीं से वे सभी चुनौतियों का सामना करेंगे जबकि राजनीतिक नेतृत्व लगातार यह उजागर करता रहेगा कि उसने पिछली सरकारों के तहत वर्षों से सुस्त पड़ी परियोजनाओं को जल्द पूरा करने के द्वारा इसे आगे बढ़ाया है।

जैसी भी और जब भी आवश्यकता पड़ेगी, वित मंत्रालय लगातार रक्षा जरुरतों को पूरी करने का वादा करता रहेगा। बहरहाल, चुनौतियों के बढ़ने के बावजूद फंड की कमी हमेशा महसूस होती रहेगी और कमियों को पूरा करने एवं पुराने पड़ चुके हथियारों को अपग्रेड करने को लेकर हताशा बनी रहेगी। फंडों की कमी से न केवल हथियारों की खरीद प्रभावित होगी बल्कि बुनियादी ढांचे और वर्तमान परिसंपत्तियों के रखरखाव पर भी असर पड़ेगा।

महत्वपूर्ण राफेल हैंगर सहित वर्तमान में जारी निर्माण परियोजनाओं के लिए लंबित बकाया राशि चुकाने में असमर्थता बुनियादी ढांचे के निर्माण को भी प्रभावित कर रही है। रिपोर्टों के अनुसार सरकार पर मिलिटरी इंजीनियरिंग सर्विस के ठेकेदारों का करीब 2,000 करोड़ रुपये बकाया है। उनके संगठन ने धमकी दी है कि अगर बकाया राशि का भुगतान न किया गया तो वे सभी काम बंद कर देंगे। हाल की रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि सरकार ने एचएएल के ठेकेदारों को भुगतान के लिए रखी गई लगभग 200 करोड़ रुपये को स्थानांतरित कर दिया है जिससे उनकी परेशानियां और बढ़ गई हैं।

सशस्त्र बलों के लिए संदेश बिल्कुल साफ है। बजट निम्न रहेगा और उम्मीदों से कम रहेगा। उन्हें अपनी जरूरतों की पूर्ति करने के लिए खरीद योजनाओं में बदलाव करने की आवश्यकता पड़ेगी। इससे पूर्व सेना के उप सेना प्रमुख शरत चंद द्वारा संसदीय समिति के समक्ष दिए गए वक्तव्य एवं उसके बाद सरकार की खिंचाई किए जाने के बावजूद इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत, सरकार ने बयान दिया कि फंड की कोई कमी नहीं है जबकि सच्चाई इसके उलट थी।

इस परिदृश्य में  सशस्त्र बलों को खुद स्वदेशी संसाधनों (इनहाउस) पर विचार करना चाहिए और आवश्यक समायोजन करना चाहिए। सबसे बड़ा संगठन होने के नाते सेना को अगुवाई करने की जरूरत है। जहां इसे तत्काल अपग्रेड किए जाने तथा खरीद की आवश्यकता है, इन्हें प्राथमिकता देने की भी जरूरत होगी। चूंकि इसके पुनर्गठन का काम आगे बढ़ रहा है, इस पर विचार करने की आवश्यकता है कि उसे किस खतरे को तवज्जो देनी चाहिए, चीन के खतरे को या पाकिस्तान के।

किसी भी सूरत में छद्म युद्ध लड़ने के लिए तैनात टुकडि़यों की आवश्यकता हमेशा प्राथमिकता होनी चाहिए। स्नाइपर राइफल, बुलेट प्रूफ जैकेट एवं बुनियादी पैदल सेना राइफल सहित उपकरणों की खरीद की जानी चाहिए। तोपों का समावेश जारी रहेगा जबकि अपग्रेड और भविष्य के लड़ाकू वाहन अभी कुछ दूर की चीज हैं।

मेरे विचार से  सेना को पाक के खतरे को अधिक तवज्जो देनी चाहिए  क्योंकि अगर यह पारंपरिक रूप से उस पर अपनी मजबूत बढ़त को कायम नहीं रख पाती है तो उसे पाक के दुस्साहस से प्रभावित होना पड़ सकता है। इसलिए, वर्तमान में जारी टैंक रोधी मिसाइलों की खरीद की प्रक्रिया जारी रहनी चाहिए। इसके साथ-साथ  यह अपनी पुनर्गठित समेकित युद्ध समूह की धारणा का भी परीक्षण कर रहा है। इसमें कुछ कमी हो सकती है जिसे मान्यकरण की पुष्टि के बाद शुरू किया जाएगा। इसके बाद ये खरीद के लिए प्राथमिकता बन जाएंगे।

चीन की सीमा पर बुनियादी ढांचे के विकास, जिसके लिए अलग से फंड है, पर बल दिया जाना चाहिए। अन्य दो सेनाओं द्वारा भी इसी प्रकार का विश्लेषण किया जाना चाहिए जिससे कि वे बजट में हुई कमी के आधार पर अपने खर्च का बेहतर तरीके से उपयोग कर सकें। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति या चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी के स्थायी चेयरमैन, जैसाकि सशस्त्र बलों ने सरकार के समक्ष प्रस्ताव रखा है, के बिना यह निर्णय खुद  सेनाओं को ही लेना पड़ेगा।

पर्याप्त बजट का युग अब समाप्त होने पर है। सशस्त्र बलों को समय के साथ खुद को बदलना चाहिए और वर्तमान आवंटनों का अधिकतम उपयोग करने की योजना बनानी चाहिए। भारत में  सरकारें किसी संकट के बाद ही सैन्य मामलों को लेकर सचेत होती हैं। करगिल का मामला भी अब दो दशक पुराना हो चुका है। जब तक कोई अगला संकट सामने नहीं आता, यह जानते हुए कि सशस्त्र बलों कमियों के बावजूद देश की रक्षा कर लेंगी, सरकार द्वारा रक्षा क्षेत्र की उपेक्षा जारी रहेगी। अंत में  राजनीतिक दलों के लिए वोट राष्ट्रीय सुरक्षा की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हैं।  इसलिए सामाजिक योजनाओं पर अधिक आवंटन होता रहेगा जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनदेखी होती ही रहेगी।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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