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सुप्रीम कमांडर को पूर्व सैनिकों की खुली चिट्ठी…

रिटायर्ड फौजी
प्रतीकात्मक फोटो

पिछले सप्ताह 150 से अधिक वरिष्ठ पूर्व सैनिकों ने राष्ट्रपति (सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर) तथा चुनाव आयोग को वर्तमान में चल रहे आम चुनावों के दौरान सेना के राजनीतिकरण के खिलाफ एक खुला पत्र लिखा है। मैं इस पत्र का एक हस्ताक्षरकर्ता हूं और मेरा नाम उन नामों की सूची में 31वें नंबर पर उल्लिखित है जिन्होंने इस पत्र का समर्थन किया है। शुरू में इस पत्र को ई-मेल के द्वारा भेजा गया था और यह उनके लिए स्वैच्छिक था जो इसका समर्थन करना चाहते थे।





इस पत्र में सेना के राजनीतिकरण के कुछ हाल के उदाहरण शामिल हैं लेकिन सामान्य रूप से यही दावा किया गया है कि ऐसा सभी राजनीतिक दलों द्वारा किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सशस्त्र बलों को ‘मोदी की सेना’ बताया जाना या बीजेपी नेता मनोज तिवारी द्वारा एक लड़ाकू वर्दी पहनना सेना का राजनीतिकरण है। राजनीतिकरण के कुछ दूसरे उदाहरणों में केजरीवाल, एचडी कुमारस्वामी, फारुक अब्दुल्ला द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणियां तथा उर्मिला मातोडकर द्वारा मुंबई में अपने चुनाव अभियान के दौरान विंग कमांडर अभिनंदन की तस्वीर का उपयोग शामिल हैं।

देश के सशस्त्र बल हमेशा से ही अराजनीतिक रहे हैं और लोकतंत्र की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए यह अनिवार्य है। पूरे उपमहाद्वीप में यह एकमात्र अराजनीतिक बल है। अपनी अराजनीतिक और धर्मनिरपेक्ष सोच के कारण ही वे देश में सर्वाधिक सम्मानित और श्रद्धेय संस्थान है। सरकार में चाहे कोई बदलाव हो, सैन्य प्रमुख अपना कार्यकाल पूरा करते हैं। सेवानिवृत्त होने वाले सेना प्रमुख की जगह लेने के लिए किसी सेना प्रमुख की नियुक्ति अंतरिम अवधि में सरकार में आए बदलाव के बावजूद हो जाती है।

अराजनीतिक एवं धर्मनिरपेक्ष होने के अतिरिक्त वे एक प्रोफेशनल बल बने रहते हैं जिसने हमेशा ही विजय सुनिश्चित करने के लिए अपनी कुर्बानी दी है। बल का यही प्रोफेशनल रवैया उसका अंदरूनी गुण है और ऐसा आजादी के समय से ही रहा है। इस प्रोफेशनल रवैये का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए।

सशस्त्र बल संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं और राष्ट्रपति उनके सुप्रीम कमांडर होते हैं। वे राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी होते हैं और परिश्रम तथा ईमानदारी से सत्तासीन सरकार और राजनीतिक दल की सेवा करते हैं। उन्हें राजनीति के अखाड़े में खींचना या उनके प्रोफेशनल गुण तथा शानदार प्रदर्शन के आधार पर वोट मांगना उनके अराजनीतिक विचार और चुनाव में नैतिक आचार संहिता के भी खिलाफ है। चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार के आरंभ में ही सभी राजनीतिक दलों को वैसे सभी पोस्टर हटाने को मजबूर कर दिया था जिनमें अभिनंदन एवं पुलवामा के शहीदों का उल्लेख था। हालांकि यह काम तो कर दिया गया था लेकिन जुबानी राजनीतिकरण बदस्तूर जारी है।

बीजेपी के लिए सीमा पार से पैदा होने वाले आतंकवाद के खिलाफ अपनी मजबूत सोच और पाकिस्तान तथा म्यांमार दोनों ही देशों में आतंकी शिविरों के खिलाफ सर्जिकल स्ट्राइक लांच करने अपने फैसले को प्रदर्शित करना उपयुक्त है। आखिर, उसने ऐसा कदम उठाया जिस पर पिछले चार दशक के दौरान भारत की किसी भी सरकार ने विचार भी नहीं किया था। यह अपने आप में उल्लेखनीय है और इसके लिए वह श्रेय तथा सराहना की हकदार है।

सशस्त्र बलों द्वारा स्ट्राइक को अंजाम देना उनके अपने प्रोफेशनल रवैये तथा क्षमता का प्रतीक है। इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी। सेना को यह दायित्व दिया गया था और उसने यह दायित्व बखूबी निभाया।  सशस्त्र बलों ने हमेशा, चाहे 1965 हो, 1971 हो, नाथु ला या करगिल की लड़ाई क्यों न रही हो, इसी प्रोफेशनल रवैये और बहादुरी का परिचय दिया है, भले कोई भी सरकार सत्ता में रही हो। इसलिए उनकी पेशेवर क्षमता का श्रेय लेना गलत है और इससे बचा जाना चाहिए। निर्णय लेना और सेना की पेशेवर क्षमता को एक ही साथ मिला कर प्रस्तुत करना ही इसका राजनीतिकरण है।

राजनीतिक दलों के इन्हीं कृत्यों की वजह से पूर्व सैनिकों की भावनाएं आहत हुई हैं। किसी भी सेवारत सैनिक, जो हर सरकार के तहत समान रूप से बढ़िया काम करता है, की कोई सार्वजनिक आवाज नहीं होती। सेना के अराजनीतिक विचारों को बरकरार रखने के लिए उस पर कई प्रकार के प्रतिबंध थोपे जाते हैं। केवल पूर्व सैनिक समुदाय ही है जो हमेशा सेवारत जवानों के संपर्क में रहते हैं और उनकी आवाज बन सकते हैं। इसी आवाज ने उनकी चिंताओं को स्वर दिया है।

राष्ट्रीय राजनीति में शामिल कोई सेना किसी वास्तविक लोकतंत्र की तस्वीर पेश नहीं करती। सैनिकों को वोट देने की स्वतंत्रता है और वे अपने व्यक्तिगत राजनीतिक विचारों के पक्ष में वोट देंगे। वोट पाने की चाहत में उनकी पेशेवर सोच के दोहन से राष्ट्रीय स्तर पर परिपक्वता प्रदर्शित नहीं होती। इसी के साथ साथ, मजबूत निर्णय लेने की क्षमता प्रदर्शित करने तथा राष्ट्र के पक्ष में कदम उठाना भी श्रेय की हकदार है जिसका दावा वापस सत्ता में आने के प्रयोजन से वोट मांगने के लिए किया जाना चाहिए और राष्ट्र को इसे स्वीकार भी करना चाहिए। मुझे उम्मीद है कि राजनीतिक दल निर्णय लेने एवं पेशेवर सोच के बीच का अंतर समझते हैं और वे परिपक्व तरीके से आचरण करेंगे।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है। ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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