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सीमा ही नहीं, आंतरिक विकास में भी योगदान है सेना का

मदद करते सेना के जवान

सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने हाल ही में एक सेमिनार में कहा कि सेना राष्ट्र निर्माण में एक उल्लेखनीय भूमिका अदा करती है। उन्होंने कहा कि रक्षा बजट का एक बड़ा हिस्सा सुदूर क्षेत्रों के विकास एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने में उपयोग में आता है। अधिकांश सीमावर्ती क्षेत्रों में, केवल सेना ही वहां रहने वाले स्थानीय निवासियों के करीब होती है, इसलिए वहीं उन्हें रोजगार, सुविधाएं एवं सुरक्षा मुहैया कराती है। राष्ट्र के विकास में सेना के योगदान की पूरी व्याख्या नहीं की जा सकती।





किसी राष्ट्र का विकास तभी हो सकता है जब उसके संस्थानों समेत, उसकी सुरक्षा सुनिश्चित होती है। स्वर्गीय राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने भारतीय सैन्य अकादमी के स्नातक कर रहे कैडेटों को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास कदम से कदम मिला कर आगे बढ़ते हैं।’ सशस्त्र बलों की मजबूत तैनाती सुनिश्चित करती है कि विदेशों से कम से कम खतरे आएं। वह खुद अराजनीतिक रहते हुए वह आंतरिक विकास में योगदान देती है। यही वजह है कि इस उपमहाद्वीप में केवल भारत की तरफ ही अधिकतम निवेश आकर्षित होते हैं और भारत का विकास अपने किसी भी पड़ोसी की तुलना में सबसे तेज गति से हुआ है।

आंतरिक रूप से, सेना की तैनाती देश के सबसे सुदूर क्षेत्रों में होती है। सेना वहां निरंतर बनी रह सके, इसके लिए कई प्रकार के संचार तंत्रों एवं माध्यमों का विकास किया जाना चाहिए जिनसे सेना के साथ-साथ क्षेत्र में रहने वाले लोगों को भी सहायता प्राप्त हो सके। सेना को यह सुनिश्चित करने की भी आवश्यकता है कि स्थानीय आबादी दुश्मनों से प्रभावित न हों, इसलिए यह उन्हें स्कूलों की स्थापना करने, स्थानीय विकास एवं स्वास्थ्य देखभाल समेत अतिरिक्त सुविधाएं मुहैया कराती है। यह सुदूर क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए ‘सद्भावना दौरों‘ का आयोजन भी करती है, उन्हें शेष भारत के विकास से अवगत करती है और उन्हें ऐसा गर्वपूर्ण नागरिक बनाती है जो हमेशा ही बेहतर भविष्य की उम्मीद कर सकते हैं।

केवल सेना द्वारा संचालित ‘सद्भावना विद्यालय‘ ही कश्मीर में अराजकता की पूरी अवधि के दौरान बिना रुके कार्यशील बने रहे। सेना सुदूर क्षेत्रों में जितनी सहायता और सुविधाएं प्रदान करती है, उनमें से ज्यादातर उसके अपने संसाधनों की बदौलत होती है और इसमें राज्यों का योगदान नगण्य होता है। क्षेत्र की अधिकांश स्थानीय उपजों और उत्पादों की खरीद सेना द्वारा की जाती है, जिससे स्थानीय निवासियों को राजस्व का एक नियमित स्रोत प्राप्त होता रहता है।

कई मामलों में विविध प्रकार की भूमिकाओं में वह स्थानीय आबादी की एकमात्र नियोक्ता यानी रोजगार देने वाली है। कई की नियुक्ति ऐसी चौकियों के रखरखाव के लिए पल्लेदारों के रूप में होती है, जो सड़क परिवहन से नहीं जुड़े हैं। इसके अतिरिक्त, छावनियों के रखरखाव एवं अन्य दायित्वों के लिए भी उनकी सेवाएं ली जाती हैं। उत्तर पूर्व के अधिकांश क्षेत्रों में सेना की टुकड़ियां नियमित रूप से लंबी गश्त पर निकलती हैं जिनके लिए कुली की भूमिका वहां के स्थानीय लोग ही निभाते हैं। इस प्रकार, सेना के साथ स्थानीय लोगों का जुड़ाव राज्य सरकार की तुलना में अधिक घनिष्ठ होता है।

ऐसे क्षेत्रों में, मुख्य रूप से जम्मू एवं कश्मीर में, जहां सीमाओं पर अधिक तनाव है, सेना ही स्थानीय आबादी को आश्रय देती है और घायल हो जाने की स्थिति में, चिकित्सकीय सहायता भी उपलब्ध कराती है। ऐसी भी खबरें आती हैं कि घायल ग्रामीणों को अस्पताल ले जाने के लिए सेना के हेलिकॉप्टरों का उपयोग किया गया। जम्मू एवं कश्मीर में भूकंप एवं बाढ़ तथा उत्तर पूर्व में बाढ़ तथा भूस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सबसे पहले सेना ही सहायता के लिए सामने आती है, स्थानीय आबादी को राहत मुहैया कराती है और उसके बाद पुनर्निर्माण में सहायता करती है।

जम्मू एवं कश्मीर में, सेना ने सुदूर क्षेत्रों में कई कार्यक्रम आरंभ किए हैं जिनमें बेशुमार सहभागिता दिख रही है। इसमें गांवों के बीच खेल प्रतिस्पर्धाएं, संगीत एवं ज्ञान साझा करने के कार्यक्रम तथा परामर्श समारोह शामिल हैं। यहां तक कि युवा वर्ग, जो शहरों में पत्थर फेंकने की गतिविधियों में संलिप्त हो सकते हैं, इनमें भारी संख्या में भाग लेते हैं और उत्साह के साथ शिरकत करते हैं। सेना द्वारा आयोजित किसी भी स्पर्धा में आज तक कभी भी राष्ट्रविरोधी नारे नहीं लगाए गए या सेना की आलोचना नहीं की गई।

उत्तर पूर्व के सुदूर क्षेत्रों में, किसी भी अन्य सरकारी एजेंसी की तुलना में सेना अधिक मददगार होती है और उनकी उपस्थिति अधिक दृष्टिगोचर होती है, इसलिए उन्हें स्थानीय आबादी का अधिक सम्मान और सद्भावना प्राप्त होती है। इस प्रकार, ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को एकसूत्र में बांधने में सेना की भूमिका उत्कृष्ट होती है जहां सीमा पार का कोई प्रभाव राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसने सुनिश्चित किया है कि क्षेत्र के निवासी मजबूत राष्ट्रीय बंधनों में बंधे रहे।

रक्षा बजट में एक राजस्व खंड भी होता है जिसमें सशस्त्र बलों की रोजमर्रा की आवश्यकताओं को बनाये रखने के लिए बड़े पैमाने पर खरीद भी शामिल होती है। यह हमेशा किसी युद्ध संबंधित भंडार या उपकरण नहीं होता। ऐसे स्टोर्स घरेलू बाजार से खरीदे जाते हैं जो राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को जोड़ती है। इसलिए, संक्षेप में कहें तो सशस्त्र बल उन्हें प्राप्त बजट का एक बड़ा हिस्सा वापस राष्ट्र को लौटा देता है।

सीमाओं पर अपने सशस्त्र बलों की मजबूत तैनाती के द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के अतिरिक्त भारतीय सेना राष्ट्र निर्माण और देश के सुदूर क्षेत्रों को एकीकृत करने के काम में भी जुड़ी रहती है। उसकी इसी भूमिका ने स्थानीय निवासियों के दिलों और दिमाग को जीतने में मदद की है। अपने बजट के एक बड़े हिस्से को वापस अर्थव्यवस्था में लगाने से यह सिद्ध है कि वह सरकार के लिए कोई ‘सफेद हाथी‘ नहीं है बल्कि राष्ट्र के विकास में उसका सक्रिय योगदान है।

लेखक का blog:  harshakakararticles.com है और उन्हें  @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं।

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