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अमेरिका की नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति और हमारा पड़ोस

पीएम मोदी ट्रंप के साथ

पिछले सप्ताह राष्ट्रपति ट्रम्प की सरकार ने अपनी नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) की घोषणा की। तब से यह रणनीति इस क्षेत्र में सुर्खियों में छाई रही है। एनएसएस वर्तमान एवं उभरते सुरक्षा खतरों एवं उसका मुकाबला करने के सरकार के विचारों को निर्धारित करती है। एनएसएस गोल्डवॉटर निकोलस कानून के आधार पर कांग्रेस द्वारा अधिदेशित है और प्रत्येक राष्ट्रपति के इसे वार्षिक रूप से जारी किए जाने की उम्मीद की जाती है। जब से अमेरिका ने अफगानिस्तान में अपनी रणनीति में बदलाव किया और अपनी सेनाओं की तैनाती में इजाफा किया, तभी से इस क्षेत्र का महत्व उनकी नजरों में बढ़ गया है। इसलिए, पाकिस्तान, जो मुख्य रूप से तालिबान एवं हक्कानी नेटवर्क का एक बड़ा समर्थक है और इस क्षेत्र में अमन बहाल करने की राह का एक बड़ा रोड़ा भी है, का एनएसएस में प्रमुखता से जगह पाना लाजिमी था।





अमेरिका में चीन को हमेशा से ही सैन्य एवं आर्थिक रूप से एक बड़े प्रतिस्पर्धी देश के रूप में देखा गया है। दक्षिण चीन सागर में इसकी आक्रामकताएं, देशों को उनके कर्जों पर ब्याज का उच्च स्तर, पाकिस्तान एवं उत्तर कोरिया जैसे समस्याग्रस्त देशों को बढ़ावा देना, जिन देशों के साथ इसकी सीमाएं लगती हैं उन्हें धमकाना तथा अफ्रीका में विस्तार के जरिये वर्तमान विश्व क्रम में बदलाव लाने की कोशिशें करना, जैसे कामों ने इसे अमेरिका के साथ सीधे संघर्ष की स्थिति में ला खड़ा किया है। इसका व्यापार असंतुलन भी चिंता का एक विषय है।

एनएसएस की फेहरिस्त के मुताबिक, चीन एवं पाकिस्तान के अलावा जिन देशों को अमेरिका एक बड़ा खतरा मानता है, उनमें रूस, उत्तर कोरिया एवं ईरान शामिल हैं। ईरान एवं उत्तर कोरिया ने तो अमेरिका के दावों का जवाब देने की भी जहमत नहीं उठाई। आपस में घनिष्ठ सहयोगी देश चीन एवं पाकिस्तान ने अमेरिका द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण की आलोचना की है। रूस ने भी अमेरिका पर शीत युद्ध के युग में धकेलने का आरोप लगाया है। दूसरी तरफ, भारत को ‘एक अग्रणी विश्व शक्ति एवं एक मजबूत रणनीतिक एवं रक्षा साझीदार‘ करार दिया है।

अमेरिका के लिए, दक्षिण एशिया एवं भारत-प्रशांत, जिसे वह भारत के पश्चिमी तट से अमेरिका के किनारों तक विस्तारित मानता है, गहन रूचि के क्षेत्र हैं। पाक से अपनी जमीन से आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने वाले आतंकी समूहों पर अंकुश लगाने की मांग करना और ‘प्रदर्शित करना कि वही उसकी नाभिकीय परिसंपत्तियों का जिम्मेदार संरक्षक है‘ से उनका नाराज होना तय था।

पाकिस्तान के लिए, अमेरिकी एनएसएस जिसमें भारत के साथ घनिष्ठ संबंध एवं ‘ प्रशांत क्षेत्र एवं सीमावर्ती क्षेत्र में भारत की नेतृत्वपूर्ण भूमिका का समर्थन करने की बात की गई है, से व्यग्र होना लाजिमी है। उसका इसका जिक्र करना कि वह ‘ चीन के बढ़ते प्रभाव से दक्षिण एशियाई देशों की संप्रभुता को बनाये रखने के ‘ उनके प्रयासों का समर्थन करता है, चीन को भड़काने के लिए पर्याप्त है। इन टिपण्णियों को जानबूझ कर एनएसएस में डाला गया है।

श्रीलंका, म्यांमार, पाकिस्तान एवं भविष्य में संभवतः नेपाल और बांग्लादेश के चीन के प्रभाव में और आ जाने की आशंका है। श्रीलंका ने 90 वर्ष की लीज पर हम्बनटोटा बंदरगाह को चीन को सुपुर्द कर दिया है जबकि म्यांमार अपनी पुनर्भुगतान समस्याओं को लेकर चीन के साथ बातचीत कर रहा है। नेपाल में चीन के समर्थन वाली सरकार आ चुकी है और उसके भी शीघ्र ही चीन के प्रभाव क्षेत्र में आ जाने की उम्मीद जताई जा रही है। चीन ने डोकलम संकट भूटान में भारत के प्रभाव को कम करने तथा उसके भारतीय खेमे से दूर करने के लिए ही पैदा किया है।

चीन ने पाकिस्तान में जितना अधिक निवेश किया है, और इसके नतीजतन पाकिस्तान के सामने पुनर्भुगतान से संबंधित जितनी कठिनाइयां आएंगी, उसे देखते हुए तय है कि पाकिस्तान जल्द ही चीन के ही एक राज्य के रूप में में तबदील हो जाएगा। इसी प्रकार अमेरिका अफ्रीका में चीन के बढ़ते प्रभाव से भी वाकिफ है। इस प्रकार, चीन एवं पाकिस्तान दोनों ही एनएसएस को एक वास्तविक स्वतंत्र अमेरिकी रणनीति की जगह एक भारत समर्थक नीति के रूप में देखता है।

पाकिस्तान यह महसूस करने में विफल रहा है कि वर्तमान में अफगानिस्तान अमेरिका के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ पर स्थित है। अमेरिका न तो बिना स्थिरता सुनिश्चित किए अपनी वापसी कर सकता है और न ही जब तक तालिबान और हक्कानी नेटवर्क को बातचीत के लिए विवश किया जाता है, इसके लिए दबाव ही डाल सकता है। इसके लिए जरुरी है कि पाक उसे सहयोग दे और उन्हें अभयारण्य मुहैया कराने पर रोकथाम लगाए। एनएसएस पाक को सुस्पष्ट रूप से अमेरिका की मांगों को मान लेने का एक संकेत है और अगर उसने इसका पालन नहीं किया तो राजनयिक और सैन्य दबाव डाले जाने के जरिये उसे इसके लिए मजबूर किया जाएगा।

इसलिए, जैसाकि एनएसएस में उल्लेख किया गया है‘ हम जोर देंगे कि पाक उसकी सरजमीं से संचालन करने वाले आतंकवादियां एवं उग्रवादियों के खिलाफ निर्णयात्मक कार्रवाई करे।‘ इन बयानों को अमेरिका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस के वक्तव्यों से और मजबूती मिली जिसमें उन्होंने कहा कि ट्रम्प ने पाकिस्तान को नोटिस दे दिया है जिससे वहां का राष्ट्रीय नेतृत्व काफी नाराज हो गया है।

पाक पर आतंकियों के बढ़ते नियंत्रण तथा कट्टरपंथियों और आतंकी समूहों को सेना के लगातार बढ़ते समर्थन को देखते हुए, स्थिरता और उसके नाभिकीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है। पश्चिमी देशों के लिए सबसे बड़ा डर यह है कि जिहादी कहीं नाभिकीय परिसंपत्तियों पर कब्जा न कर लें। ऐसा खौफ इसलिए भी है कि सेना कट्टरपंथियों और आतंकी समूहों को राजनीतिक वैधता प्रदान करने के लिए उन्हें सियासी अखाड़े में उतारने लगी है जिससे कि उन्हें 2018 के चुनावों में भाग लेने में सक्षम बनाया जा सके। इसलिए, एनएसएस में कहा गया है कि पाक को खुद को अपनी नाभिकीय परिसंपत्तियों का जिम्मेदार संरक्षक प्रदर्शित करने की जरुरत है।

अमेरिका इस तथ्य से वाकिफ है कि इस क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करने वाला वह एकमात्र देश नहीं है। इसलिए भारत,जिसका पाकिस्तान और चीन दोनों के साथ मतभेद है, उसका सहज सहयोगी है। भारत की बढ़ती सैन्य एवं आर्थिक ताकत, व्यापार रास्तों एवं भू रणनीतिक स्थानों के साथ उसकी निकटता के कारण, हिन्द महासागर क्षेत्र में उसे साझीदार बनाने से किसी भी देश की ताकत में कई गुना बढोतरी हो सकती है। यही वजह है कि अमेरिका, जापान एवं ऑस्ट्रेलिया ने ‘क्वाड‘ का निर्माण करने के लिए भारत के साथ हाथ मिला लिया है। इनके अभ्यासों पर चीन की करीबी नजर है जो इसे अपने खिलाफ किया गया अभ्यास मानता है।

जहां एनएसएस एक निर्देशकारी दस्तावेज बना रहेगा और इसके कार्यान्वयन में अंतर हो सकता है, इसमें अमेरिका की पसंदों, नापसंदों एवं चुनौतियों का वर्णन किया गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की लगातार आलोचना हो रही है। एक राजनयिक हथियार के रूप में आतंकी समूहों की तैनाती की उसकी नीति और कट्टरपंथी संगठनों को उसके समर्थन से अंतरराष्ट्रीय समुदाय उससे नाराज हो गया है। दूसरी तरफ, भारत एक बढ़ती महाशक्ति है, जिसके साथ संबंध बनाना लाभदायक साबित हो सकता है। भारतीय समर्थन हासिल करते रहने के लिए, एनएसएस ने कई अवसरों पर भारतीय सुर में ही बात की है।

इसका कार्यान्वयन कितनी मजबूती से किया जाता है, उसी से इसका सर्वश्रेष्ठ मूल्यांकन हो पाएगा। बहरहाल, इससे यह तथ्य तो पूरी तरह सामने आ गया है कि अमेरिका चीन एवं पाकिस्तान के साथ सकारात्मक रूप से घनिष्ठ संबंध नहीं बना पाएगा। आने वाले समय में उसे भारतीय समर्थन की और अधिक आवश्यकता होगी।

लेखक का blog: harshakakararticles.com है और उन्हें @kakar_harsha पर फॉलो किया जा सकता है।

 

 

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